संसद के अंदर ठप कामकाज, बाहर सड़कों पर सियासी तूफान... 25 दिनों तक चले मानसून सत्र का पूरा हिसाब-किताब
इस बार संसद का मानसून सत्र भीतर कम विधायी कार्य और बाहर भारी राजनीतिक हंगामे के बीच समाप्त हुआ। NEET ...और पढ़ें
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संसद भवन (सोशल मीया)
HighLights
संसद की उत्पादकता कम रही, लोकसभा 19% ही चली।
NEET विवाद, पेपर लीक, मंत्री का इस्तीफा प्रमुख मुद्दे बने।
सरकार ने हंगामे के बीच 12 महत्वपूर्ण विधेयक पारित कराए।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। इस बार संसद का मानसून सत्र कई मायनों में बेहद अनूठा और विरोधाभास के नाम रहा। ऐसा लगा मानो 25 दिनों तक संसद की कार्यवाही दो अलग-अलग दुनिया में चल रही हो। एक तरफ संसद के भीतर बार-बार हंगामा, नारेबाजी और बैठकों का स्थगित होना जारी रहा, वहीं दूसरी तरफ संसद के बाहर और परिसरों में राजनीति पूरे उफान पर थी।
कहीं छात्र सड़कों पर उतरे, तो कहीं विपक्षी नेताओं ने अनोखे प्रदर्शन किए। ऐसे में सवाल ये खड़ा हो रहा कि आखिर इस बार संसद के मानसून सत्र के 25 दिनों की कार्यवाही में क्या-क्या हुआ? आइए हम आपको बताते हैं।
पहले जानिए संसद के भीतर कैसी रही स्थिति?
सदन की अंदर हाल अगर संख्याओं के लिहाज से देखें तो संसद की उत्पादकता बहुत कम रही। लोकसभा अपने निर्धारित समय का महज 19% ही चल पाई।, जबकि राज्यसभा का कामकाज करीब 39% समय तक ही हो सका।
इतना ही नहीं प्रश्नकाल बुरी तरह प्रभावित हुआ, जहां 1% से भी कम समय का उपयोग हो पाया। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने भी इस बात को स्वीकार किया कि सरकार के एजेंडे के तहत कानून तो पास हुए, लेकिन बहस के मामले में यह सत्र अच्छा नहीं रहा।
कौन-कौन से प्रमुख बिल पास हुए?
अब अगर सदन में पास किए गए विधेयकों पर नजर डालें तो हंगामे और विपक्षी नारेबाजी के बीच सरकार ने आवाज मत के जरिए कई महत्वपूर्ण बिल पास करवाए। सत्र के दौरान लोकसभा में 11 और राज्यसभा में 2 नए बिल पेश किए गए। दोनों सदनों से कुल 12 बिल पास हुए।
सुप्रीम कोर्ट, पेपर लीक से लेकर वंदे मातरम् तक
सदन में सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन अध्यादेश, 2026 और आयकर (संशोधन) अध्यादेश, 2026 को भी दोनों सदनों की मंजूरी मिल गई। पेपर लीक जैसी घटनाओं पर लगाम लगाने के लिए पब्लिक एग्जामिनेशन (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) संशोधन विधेयक, 2026 कानून लाया गया। इसमें समयबद्ध जांच और तीन महीने के भीतर ट्रायल जैसी कड़ी व्यवस्था की गई है।
इसके अलावा, वंदे मातरम को 1971 के अधिनियम के दायरे में लाने वाला बिल, जन्म-मृत्यु पंजीकरण संशोधन बिल, एमएसएमई विकास संशोधन बिल और केरल का नाम बदलकर 'केरलम' करने से जुड़ा बिल भी चर्चा में रहा। गौर करने वाली बात यह रही कि इस बार के मानसून सत्र के दौरान क्या सत्ता पक्ष और क्या विपक्ष। दोनों तरफ से 'Gen Z' की शब्दावली (जैसे 'clock it', 'FOMO, 'delulu') का इस्तेमाल कर युवाओं को साधने की कोशिश की।
संसद के बाहर का हाल भी जानिए
सत्र की शुरुआत ही NEET परीक्षा में कथित अनियमितताओं को लेकर जंतर-मंतर पर हुए विशाल छात्र आंदोलन की पृष्ठभूमि में हुई। वैज्ञानिक और कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के अनशन और फिर पुलिस कार्रवाई ने आग में घी का काम किया।
जब छात्र संसद की तरफ मार्च कर रहे थे, तो पुलिस और सुरक्षा बलों द्वारा लाठीचार्ज, आंसू गैस और पैलेट गन का इस्तेमाल किया गया, जिसमें 60 से अधिक छात्र घायल हो गए। इस पुलिस कार्रवाई ने तुरंत एक बड़ा राजनीतिक रूप ले लिया, क्योंकि सुरक्षा बल सीधे गृह मंत्रालय के अधीन आते हैं।
राहुल गांधी का शाह और प्रधान पर किया तीखा हमला
अब इस पूरे विरोध प्रदर्शन में राहुल गांधी की बात करें तो तो छात्र आंदोलन और पेपर लीक के मुद्दे पर राजनीति का केंद्र बदलता गया। शुरुआती दबाव शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान पर था, जिन्होंने 25 जुलाई को अपने पद से इस्तीफा दे दिया। यह इस सत्र के सबसे बड़े राजनीतिक घटनाक्रमों में से एक रहा।
इसके बाद लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर तीखा हमला बोला। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या गृह मंत्री के आदेश पर छात्रों पर बल प्रयोग हुआ? राहुल गांधी ने मांग की कि या तो गृह मंत्री जिम्मेदारी लें या अपना पद छोड़ें।
झारखंड का पेंच और 'झूठा' करार देने का पलटवार
दूसरा ओर परीक्षाओं में गड़बड़ी का यह मुद्दा सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं रहा, बल्कि झारखंड (जहां हेमंत सोरेन के नेतृत्व में विपक्षी गठबंधन की सरकार है) तक पहुंच गया। झारखंड में जेपीएससी (JPSC) और जेएसएससी (JSSC) परीक्षाओं को लेकर छात्रों ने विधानसभा का घेराव किया।
केंद्र की सत्ताधारी भाजपा ने इस मौके का फायदा उठाकर राहुल गांधी पर पलटवार किया। इस्तीफा दे चुके पूर्व शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने राहुल गांधी को आदतन झूठ करार देते हुए कहा कि कांग्रेस नेता बिना तथ्यों के निराधार आरोप लगा रहे हैं।
राम मंदिर के नाम पर विरोध प्रदर्शन
संसद परिसर के भीतर भी राजनीतिक प्रदर्शनों की कमी नहीं रही। सत्र के दौरान अयोध्या में राम मंदिर में कथित तौर पर दान चोरी के मुद्दे को लेकर विपक्ष ने अनोखा अंदाज अपनाया। निर्दलीय सांसद पप्पू यादव एक पुजारी के वेश में भगवान राम की तस्वीर और दानपेटी लेकर मकर द्वार पर बैठ गए।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा और अन्य विपक्षी सांसदों ने 'अमित शाह सदन से गायब क्यों?' लिखे बैनर के साथ प्रदर्शन किया और दानपेटी में सांकेतिक पैसे डालकर सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए।
कैसे तय हुआ इस बार के सत्र की सियासी दिशा?
गौरतलब है कि यह मानसून सत्र इस बात का बेहतरीन उदाहरण बन गया कि कैसे संसद के भीतर विधायी कामकाज और बाहर की सड़कों पर चल रहे राजनीतिक आंदोलनों के बीच एक गहरा विरोधाभास पैदा हो सकता है। एक तरफ जहां सरकार ने भारी हंगाम के बीच अपने जरूरी बिल पास करा लिए, वहीं दूसरी तरफ NEET विवाद, पुलिस कार्रवाई, मंत्री की विदाई और राम मंदिर जैसे मुद्दों ने पूरे सत्र की सियासी दिशा तय की।
