नई दिल्ली, जेएनएन। प्रिवेंशन ऑफ मनी लांड्रिंग एक्ट (पीएमएलए) को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। इस कानून को असंवैधानिक बताते हुए कहा गया है कि इसके क्रिमिनल प्रोसीजर कोड (सीआरपीसी) में किसी संज्ञेय अपराध की जांच और ट्रायल के बारे में दी गई प्रक्रिया का पालन नहीं होता है। कोर्ट ने कानून को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका पीएमएलए के तहत आरोपित दिल्ली के रहने वाले बिमल जैन ने दाखिल की है। इसमें केंद्र सरकार के अलावा प्रवर्तन निदेशालय को पक्षकार बनाया गया है। कोर्ट ने नोटिस जारी करने के साथ ही याचिकाकर्ता के खिलाफ किसी तरह की दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगा दी है।

इससे पहले जैन के वकील ऋषि मल्होत्रा ने पीएमएलए के प्रावधानों को असंवैधानिक ठहराए जाने की मांग करते हुए कहा कि इस कानून की धारा-45 कहती है कि यह अपराध संज्ञेय अपराध होगा। ऐसे में मनी लांड्रिंग कानून के तहत दर्ज मामलों में सीआरपीसी के चैप्टर-12 में दी गई प्रक्रिया का पालन होना चाहिए, जो इन मामलों में नहीं किया जाता है।

दरअसल सीआरपीसी के चैप्टर-12 में संज्ञेय अपराध में एफआइआर दर्ज होने से लेकर जांच और चार्जशीट दाखिल करने आदि की प्रक्रिया दी गई है। संज्ञेय अपराध में अगर किसी को गिरफ्तार किया जाता है तो उसे नियम के मुताबिक 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाना चाहिए जबकि पीएमएलए के तहत ऐसा नहीं होता है। उसमें गिरफ्तार करने के बाद मजिस्ट्रेट की कोई भूमिका ही नहीं है। सिर्फ कंप्लेन (पीएमएलए में चार्जशीट की जगह कंप्लेन दाखिल होती है) दाखिल करने के वक्त मजिस्ट्रेट की भूमिका आती है। कोर्ट ने पिछले सप्ताह याचिका पर दलीलें सुनने के बाद मामले में नोटिस जारी किया और इस याचिका को भी इसी मसले पर पहले से लंबित याचिकाओं के साथ संलग्न करने का आदेश दिया। 

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