नई दिल्ली, प्रो. उमा सिंह। वर्तमान में बीजिंग की सबसे बड़ी चिंता शी चिनफिंग की इस अनौपचारिक यात्रा को पाकिस्तान को सशंकित किए बिना सफल बनाने की चुनौती है। पहले चीन कश्मीर को एक ऐतिहासिक मसला बताता रहा है जिसे भारत और पाकिस्तान की आपसी बातचीत से समाधान का हिमायती रहा। लेकिन पांच अगस्त को अनुच्छेद 370 हटाने के बाद से उसके सुर पाकिस्तान के समर्थन में चले गए।

मसले का अंतरराष्ट्रीयकरण करने के लिए उसने इसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भी उठाया। फिर अचानक चीन के रुख में लचक आई। आठ अगस्त को चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा, ‘हम भारत और पाकिस्तान से सभी मसलों पर बातचीत करने की अपेक्षा करते हैं इनमें कश्मीर मसला भी शामिल है। यही दोनों देशों सहित समूचे विश्व की साझी इच्छा है।’ 

समर्थन जुटाने चीन गए इमरान

इसके बाद इमरान खान कश्मीर पर समर्थन जुटाने चीन गए। कश्मीर पर भारत को किसी की मध्यस्थता स्वीकार नहीं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कश्मीर मसले को उठाने के बाद चीन की बीआरआइ योजना के प्रति भारत का रुख सख्त हो गया। चीन का पाकिस्तान में अकूत धन निवेश किए जाने को लेकर खुद चीन में उसके रिटर्न को लेकर आशंका खड़ी होने लगी है। चीन- पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरीडोर के तहत किए गए चीनी निवेश की दिक्कतें और बढ़ सकती हैं यदि फाइनेंसियल एक्शन टास्क फोर्स पाकिस्तान को आने वाले दिनों में प्रतिबंधित कर देती है। 38 हजार वर्ग किमी वाले अक्साई चिन पर चीन गैरकानूनी कब्जा कर रखा है। 

शिमला समझौते को नहीं मानता चीन

चीन, तिब्बत और ब्रिटिश भारत के बीच 1914 में हुए शिमला समझौते को वह नहीं मानता है। समझौते के अनुसार लद्दाख जम्मू और कश्मीर का हिस्सा है। चीन इस समझौते को खारिज करने की दलील देता है कि उसे चीनी लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाली सरकार ने नहीं किया था। चीन लद्दाख को विवादित क्षेत्र मानता है जहां दोनों देशों की सीमाएं अभी भी नहीं तय हैं। उसका यह रुख अक्साई चिन पर उसके जबरदस्ती कब्जे को सही ठहराने के लिए है। इसके अलावा शक्सगाम घाटी में गुलाम कश्मीर का 5800 वर्ग किमी क्षेत्र पाकिस्तान ने चीन को दे रखा है जिसका नाम बदलकर ट्रांस-काराकोरम ट्रैक्ट कर दिया गया है।

 मूलरूप से यह हुंजा-गिलगित क्षेत्र का हिस्सा था जो जम्मू-कश्मीर रियासत से संबद्ध था। अनुच्छेद 370 हटाने के कदम को चीन ने भारत का घरेलू कानून बताया जो चीन पर लागू नहीं होगा। जिसका सीधा सा मतलब है कि उसने अक्साई चिन को उसके दायरे से बाहर ही रखा है जिसे भारतीय संसद में जोर देकर कहा गया कि अक्साई चिन समेत सभी पूरा जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। इसके दस दिन बाद ही अपनी नई नीति के तहत कश्मीर पर उसने खुलेआम पाकिस्तान को समर्थन का रुख दिखाया।

कुछ दिन तक पाकिस्तान और चीन ने साधी चुप्पी

कश्मीर पर अपने बयानों के कुछ दिन तक पाकिस्तान और चीन दुनिया की प्रतिक्रिया देखने के लिए चुप्पी साधे रहे जो कि उनके समर्थन में नहीं रही। कश्मीर के मामले को चीन द्वारा तूल देने के पीछे एक वजह यह भी रही कि उसी दौरान हांगकांग में चीन के खिलाफ चल रहे व्यापक स्तर के प्रदर्शन ने दुनिया का ध्यान खींचा था। चीन उस ध्यान को भंग करना चाहता था। अकेली वैश्विक ताकत बनने की चीन अपनी मंशा के चलते कुछ भी करने को तैयार दिखता है।

पाकिस्तान को मोहरा बनाकर ये करना चाहता है चीन

पाकिस्तान को मदद करने के लिए चीन अपने ही रुख में विरोधाभास अगर पैदा करता है तो इसके पीछे पाकिस्तान की सामरिक स्थिति है। पाकिस्तान को मोहरा बनाकर वह अरब सागर तक पहुंच बना सकता है जिससे पश्चिम एशिया और चीन के बीच दूरी बहुत कम हो जाती है। चीन यह भी जानता है कि उसका यह सपना तब तक साकार नहीं होगा जब तक कि भारत ऐसा की मदद नहीं मिलेगी। क्योंकि इसके लिए पाकिस्तान और गुलाम कश्मीर में शांति और स्थिरता बहुत जरूरी है। 

कश्मीर के हालात भारत के लिए बहुत महत्व रखते हैं, लेकिन चीन इसे अपने बड़े रुख में महज बाधा मानता है। भारत-पाकिस्तान के बीच परमाणु जंग की आशंका को उचित नहीं मानता। चीन के साथ भारत का शक्ति असंतुलन जगजाहिर है, लिहाजा इस बात को खारिज नहीं किया जा सकता है कि भारत के प्रति इस दौरे में शी कोई लीक से हटकर नरमी दिखाएंगे। नई दिल्ली को चाहिए कि वह भावनात्मक और गैर यथार्थवादी अपेक्षाओं को दरकिनार कर चीन की चुनौती का सामना करे।  

लेखिका पाकिस्तान विशेषज्ञ हैं।

Posted By: Ayushi Tyagi

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