माला दीक्षित, नई दिल्ली। कानून की विसंगति और व्याख्या कभी-कभी अजीब स्थिति पैदा कर देती है। इसका एक उदाहरण यह केस है जिसमें शादी के वक्त दूल्हा 17 वर्ष का नाबालिग और दुल्हन 18 वर्ष से ऊपर की बालिग थी, लेकिन हाईकोर्ट के आदेश पर बाल विवाह का केस दर्ज हुआ दूल्हे पर जो खुद कानून की निगाह में बच्चा था।

दूल्हे पर दर्ज केस रद

सुप्रीम कोर्ट ने दूल्हे पर दर्ज केस रद करते हुए कहा कि हाईकोर्ट ने आदेश देकर गंभीर गल्ती की है, क्योंकि शादी के वक्त लड़के की उम्र 17 वर्ष थी जो कि 18 वर्ष से कम है इसलिए उस पर बाल विवाह कानून की धारा 9 के प्रावधान लागू नहीं होंगे। इसके अलावा कोर्ट ने यह भी कहा है कि दूल्हे के पास विकल्प है अगर वह चाहे तो बाल विवाह कानून की धारा 3 के तहत अपनी शादी रद करा सकता है।

बाल विवाह कानून की धारा 9 की कानूनी विसंगति

सुप्रीम कोर्ट ने इसके साथ ही बाल विवाह कानून की धारा 9 की कानूनी विसंगति को उजागर करते हुए उसकी नयी व्याख्या भी की है। यह फैसला न्यायमूर्ति एमएम शांतनगौडर और अनिरुद्ध बोस की पीठ ने पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली दूल्हे की अपील स्वीकार करते हुए सुनाया है।

दूल्हे पर बाल विवाह कानून की धारा 9 के प्रावधान नहीं होंगे लागू

बाल विवाह कानून की धारा 9 बालिग पुरुष के नाबालिग से शादी करने पर सजा का प्रावधान करती है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि हाईकोर्ट ने लड़के के स्कूल प्रमाणपत्र में दी गई आयु पर भरोसा करके धारा 9 में केस दर्ज करने का आदेश दिया है, लेकिन स्कूल प्रमाणपत्र के मुताबिक शादी के वक्त लड़का 17 वर्ष का था यानि वह 18 से कम का था, इसलिए इस मामले में धारा 9 (बालिग पुरुष के बाल विवाह करने पर सजा) के प्रावधान लागू नहीं होंगे।

धारा 2 (ए)- 21 वर्ष से कम का लड़का और 18 वर्ष से कम की लड़की बच्चे समझे जाएंगे

कोर्ट ने कहा कि धारा 9 का अपराध समझने के लिए कानून की अवधारणा और उद्देश्य समझना होगा। इसकी धारा 2 (ए) कहती है कि 21 वर्ष से कम का लड़का और 18 वर्ष से कम की लड़की बच्चे समझे जाएंगे। धारा 2 (बी) कहती है कि बाल विवाह का मतलब है कि शादी करने वाले दोनों में से किसी का भी बच्चा होना। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इसका मतलब है कि अगर पति 18 से 21 के बीच का भी होता है तो भी बाल विवाह माना जाएगा।

कोर्ट ने कहा कि यहां शादी के वक्त लड़की बालिग थी। कानून बालिग लड़की के नाबालिग से शादी करने पर सजा का प्रावधान नहीं करता। ऐसे में तो अर्थ निकलता है कि अगर लड़का 18 से 21 के बीच का है और वह बालिग लड़की से शादी करता है तो, लड़की को सजा नहीं होगी लेकिन लड़के को सजा होगी जबकि वह खुद बच्चा है। कोर्ट ने कहा कि कानून की यह व्याख्या कानून के उद्देश्य के खिलाफ है। निसंदेह यह कानून समाज में व्याप्त बाल विवाह रोकने के लिए है। उद्देश्य बाल वधुओं पर बुरे असर को रोकना है।

धारा 9 की व्याख्या

कोर्ट ने धारा 9 की व्याख्या करते हुए कहा है कि इस धारा में 18 वर्ष से अधिक के पुरुष के बाल विवाह करने की जगह 18 वर्ष से अधिक के पुरुष के बच्चे (नाबालिग) से विवाह करना पढ़ा जाए। साथ ही कोर्ट ने कहा कि कहा कि वह 18 से 21 वर्ष के पुरुष और बालिग महिला के बीच हुई शादी की वैधानिकता पर कोई टिप्पणी नहीं कर रहे, लेकिन ऐसे मामलों में लड़के के पास कानून की धारा 3 के तहत शादी को रद कराने का विकल्प होगा।

क्या है मामला

परिवार की सहमति के बगैर प्रेम विवाह करने वाले दंपति ने 2010 में पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट में अर्जी देकर सुरक्षा मांगी। कोर्ट ने सुरक्षा का आदेश दे दिया। करीब छह महीने बाद लड़की के पिता ने हाईकोर्ट में अर्जी दाखिल कर आरोप लगाया कि लड़के ने पुलिस सुरक्षा मांगने के लिए कोर्ट में शादी के वक्त अपनी आयु 23 वर्ष बताई है जबकि स्कूल प्रमाणपत्र के मुताबिक वह शादी के वक्त 17 साल का था। हाईकोर्ट ने इस पर दंपति को सुरक्षा देने का अपना आदेश वापस ले लिया और लड़के के खिलाफ बाल विवाह कानून में एफआइआर दर्ज करने का आदेश दिया। लड़के की ओर से हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम आदेश में पहले ही हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी थी। नवंबर के पहले सप्ताह में याचिका स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट का आदेश रद कर दिया।

Posted By: Bhupendra Singh

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