नई दिल्ली [जागरण स्पेशल] Menstrual Hygiene Day: मासिक धर्म... जरा धीरे से बोलो यह सबके सामने बोलने वाली बात नहीं है। इसके बारे में किसी से बात भी नहीं करना ठीक है। कुछ ऐसी ही कहानी है हर घर की, जब पहली बार किसी लड़की को मासिक धर्म होते है, तो उसे यहीं बातें सिखाई जाती है। वहीं, इस शब्द को सुनते ही कई लोगों थोड़ा असहज महसूस करने लगते है। ना केवल पुरुष बल्कि, कई महिलाएं चाहकर भी मासिक धर्म के बारे में बातें नहीं कर पाती। जबकि मासिक धर्म एक ऐसी प्राकृतिक प्रक्रिया है जिसकी वजह से जीवन की उत्पति हुई है। आज भले ही हमारा समाज आधुनिकता की ओर बढ़ रहा हो लेकिन, समाज की सोच आज भी कमजोर और पिछड़ी हुई है। आज भी इसे एक बीमारी के तौर पर ही देखा जाता है। इसी सोच को बदलने के लिए  Menstrual Hygiene Day मनाया जाता है। हर साल इसका एक थीम भी रखा जाता है। इस बार का थीम है 'इट्स टाइम फॉर एक्शन' (It's Time For Action)। चलिए आगे बढ़ते है...

क्या आप जानते है, मासिक धर्म के दौरान एक महिलाएं के शरीर में कई प्रकार के बदलाव आते है। कई बार यह बदलाव ऐसा होते है जिन्हें महिलाएं खुद भी समझ नहीं पाती है और चाहकर भी उसके बारे में किसी से साझा नहीं करती है। जब पहली बार लड़कियों को पिरियड्स आते है तो वह अपनी मां से भी इस बारे में ठीक से बात नहीं करती है। यह तो हम कई सालों से सुनते ही आ रहे है कि कई ग्रामीण इलाकों में आज भी महिलाएं कपड़े का इस्तेमाल करती है। वहीं कई महिलाएं सैनेट्ररी पैड के इस्तेमाल तो करती है लेकिन उससे जुड़ी बहुत से बातों से अंजान है। 

हालांकि, पहले के समय में महिलाएं सूती कपड़े का इस्तेमाल करती थी। फिर समय बदला और सैनेटरी नैपकिन का इस्तेमाल बढ़ा। आज हर घर में अधिकतर लड़कियां सैनेटरी नैपकिन का इस्तेमाल करती हैं। कई मामलों में यह आरामदायक रहता है। एक रिसर्च के मुताबिक एक शहरी महिला पूरी जिंदगी में करीब 17 हजार सैनेटरी नैपकिन यानी 125 किलोग्राम सैनेटरी नैपकिन का इस्तेमाल करती है।

सैनेटरी नैपकिन पर्यावरण के लिए खतरनाक 


एक सैनेटरी नैपकिन को अगर इस्तेमाल करके ऐसे ही खुले में फेंक दिया जाता है तो उसे नष्ट होने में 800 साल तक लग सकते हैं और अगर उसे मिट्टी में दबाया जाता है तो भी उसे नष्ट होने में कम से कम 100 साल लग जाते हैं। इस तरह यह पर्यावरण के लिए भी एक बहुत बड़ा खतरा भी है। आपको बता दें कि यह स्थिति सिर्फ सैनेटरी नैपकिन को लेकर ही नहीं है, बल्कि, बच्चों और बुजुर्गों के डायपर के मामले में भी ऐसा ही होता है।

बीमारियों का घर सैनेटरी नेपकिन 
 सैनेटरी नैपकिन इस्तेमाल करने में जितना लगता है उतना ही यह  बीमारियों को न्योता भी देता है। दरअसल, सैनेटरी नैपकिन में डायोक्सिन नाम के एक पदार्थ का इस्‍तेमाल किया जाता है। डायोक्सिन का उपयोग नैपकिन को सफेद रखने के लिए किया जाता है। हालांकि इसकी मात्रा कम होती है लेकिन फिर भी नुकसान पहुंचाता है। इसके चलते ओवेरियन कैंसर, हार्मोनल डिसफंक्‍शन, डायबिटीज और थायरॉयड की समस्‍या हो सकती है। 

साथ ही जब नैपकिन बनाया जाता है तब उसपर कृत्रिम फ्रेगरेंस छिड़का जाता है, जिससे एलर्जी और त्वचा को नुकसान होने का खतरा रहता है। लंबे समय तक नैपकिन के इस्‍तेमाल से वेजाइना में स्‍टेफिलोकोकस ऑरे‍यस बै‍क्‍टीरिया बन जाते हैं। इससे डायरिया, बुखार और ब्‍लड प्रेशर जैसी बीमारियों का खतरा रहता है।

आर्गेनिक क्लॉथ पैड्स पर्यावरण और आपके लिए भी सुरक्षित 
 

बाजार में अब आपको  ऑर्गेनिक क्‍लॉथ पैड्स भी मिल जाएंगे। ये रूई और जूट या बांस से बने होते हैं। यह इस्तेमाल करने में भी आरामदायक रहता है और उपयोग किए गए पैड्स को धोकर फिर से इस्‍तेमाल किया जा सकता है। साथ ही ये पर्यावरण को भी नुकसान नहीं पहुंचाते।

मेंस्‍ट्रुअल कप


 

मेंस्‍ट्रुअल कप के बारे में अभी लोग बहुत कम जानते हैं। इसका इस्तेमाल भी कम किया जाता है लेकिन महिलाओं और लड़कियों के लिए मेंस्‍ट्रुअल कप काफी उपयोगी साबित हो सकते हैं। यह सिलिकन से बना होता है। अच्‍छी क्‍वालिटी के कप की कीमत भी ज्यादा नहीं होती है एक अच्छी कंपनी का मेंस्‍ट्रुअल कप आपको 300 से 500 रुपये तक में मिल जाएगा। वहीं, इसे एक बार खरीदने के बाद आप करीब 10 साल तक इसका इस्तेमाल कर सकती है। मेंस्‍ट्रुअल कप इन्फेक्शन से बचाने का सबसे बेहतर तरीका है।

टैम्पोन
 

मासिक धर्म से निपटने का एक अन्य तरीका है टैम्पोन। यह कपास या रेयान से बना होता है और जिसे मासिक धर्म के दौरान मासिक स्राव को सोखने के लिए योनि के अंदर डाला जाता है। एक टैम्पोन योनि के अंदर सुरक्षित तरीके से फिट होता है जहां बहुत कम संवेदी तंत्रिकाएं होती हैं। टैम्पोन आकार में सिलेंडर या सीरिंज की तरह होता है जिसे बिल्कुल आसानी से योनि में डाला (insert) और निकाला जा सकता है।

टैम्पोन कॉटन, रेयान या इन दोनों को मिलाकर बनाया जाता है। यह पीरियड के दौरान योनि के खून को पूरी तरह सोख लेता है। टैम्पोन अलग-अलग साइज में बाजारों और दवा की दूकानों पर उपलब्ध है। हालांकि, टैम्पोन को लेकर कई तरह की 

लाइट टैम्पोन: (lite tampon) यदि आप पहली बार टैम्पोन का इस्तेमाल कर रही है तो आपके लिए लाइट टैम्पोन अच्छा रहेगा।

रेगुलर टैम्पोन: रेगुलर टैम्पोन में लाइट टैम्पोन (lite tampon) की अपेक्षा अधिक मात्रा में और अधिक देर तक ब्लड को अवशोषित करने की क्षमता होती है। लेकिन जब पीरियड में खून कम आता है या पीरियड खत्म होने वाला हो तो इसे इस्तेमाल करना समझदारी नहीं है।]

सुपर टैम्पोन: (Super tampons)मासिक धर्म के पहले या दूसरे दिन ज्यादा ब्लिडिंग होती है। सुपर टैम्पोन पहले और दूसरे दिन निकलने वाले ज्यादा खून को अवशोषित (absorbed) करने के लिए उपयोग किया जाता है। 

सुपर प्लस टैम्पोन (Super plus tampons) कई महिलाओं को इस दौरान बहुत ही ज्यादा ब्लि़डिंग होती है। इसके लिए आप सुपर प्लस टैम्पोन का इस्तेमाल करें। 

एक जान मानी मनोचिकित्सक डॉक्टर प्रणिता गौड़ का कहना है कि पहले के समय में लोग हाइजीन को लेकर इतने जागरुक नहीं थे। वह मासिक धर्म को घृणा की नजरों से देखते थे। इसी वजह से लड़कियों को बंद कमरे रखा जाता था। उन्हें मंदिर या किचन में जाने तक नहीं दिया जाता था।

डॉ प्रणिता गौर का कहना है कि अगर समाज मासिक धर्म से जुड़ी सोच से उबरना चाहता है तो इसकी शुरुआत हमें अपने घरों से करनी होगी। हमें अपने बच्चों को शुरू से ही एक लड़की के शरीर में होने वाले बॉयोजिकल बदलावों के बारे में जानकारी देनी होगी। उन्होंने कहा कि ये समझना बहुत जरूरी है कि पीरियड्स कुछ नहीं बस लड़कियों के शरीर में होने वाले जैविक बदलावों में से एक हैं और यह बहुत जरूरी है।

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Posted By: Ayushi Tyagi

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