जौनपुर [सतीश सिंह]। हे, री मैं तो प्रेम दीवानी, मेरो दरद न जाणै कोय.... अब तो दरस दे दो कुंज बिहारी.... जैसे भक्तिरस में सराबोर पदों की रचनाकार, मन में कृष्ण को अपना पति मानकर, उनकी भक्ति की पराकाष्ठा तक पहुंचने वाली, प्राचीन काल की कवयित्री मीराबाई के पदों और भजनों को अब उर्दू अल्फाज व मिठास के साथ पढा जा सकेगा।

अंबेडकर नगर के जलालपुर की सरजमीं पर करीमपुर के नगपुर में जन्मे हाशिम रजा 'जलालाबादी' ने गंगा जमुनी तहजीब को संजोने वाले पद्मश्री अनवर जलालपुरी और यश भारती नैयर जलालपुरी की कड़ी को आगे बढ़ाते हुए प्राचीन काल की सूर, तुलसी, कबीर की कड़ी की कवियित्री 'कान्हा की जोगन' मीराबाई के पदों एवम भजनों को अपनी किताब' मीराबाई उर्दू शायरी में (नगमा-ए-इश्क-ओ-वफ़ा) लिख डाला।

मीरा की तरह फकीराना अंदाज को बयां करती उनकी यह शायरी' फकीर हूँ, मैं फकीराना शान काफी है... खुदा ने जो भी अता की वह आन काफी है...! यह शानदार महल मुबारक हो तुझको, मेरे लिए खुला आसमान काफी है' में मीरा की अश्क दिखाई देती है। मीराबाई के उर्दू शायरी के लिए उन्हें रिवायत फाउंडेशन की तरफ से मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी के उत्सव में यादे इकबाल के दौरान 'गंगा जमुनी तहजीब सम्मान' और उर्दू रत्न से नवाजा गया।

इस किताब से प्रसिद्धि के साथ कवि कुमार विश्वास द्वारा भी शुभकामना दी गई। भगवान कृष्ण की दीवानी मीरा के भजन उनकी प्रभु के प्रति दीवानगी का दर्पण है। 'मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई' जैसी पंक्तियां उनकी भक्ति को दर्शाती हैं। इस भक्ति वाली रचना को अब उर्दू में शायरी के रूप में गुनगुनाया जा सकेगा। वार्ता के दौरान उन्होंने बताया कि मीराबाई के पदों और भजनों की उनकी किताब का विमोचन 17 जून को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर दिल्ली में होगा। यह तकरीबन 250 पेज की किताब है।

हाशिम रजा बताते हैं मीराबाई की मर्मस्पर्शी पंक्तियां उन्हें बचपन से बहुत भाती थीं। इस लिए तीन साल कड़ी मेहनत करके उनका उर्दू शायरी में अनुवाद किया। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से अध्यापन छोड़ अब दिल्ली में मीराबाई फाउंडेशन संस्था के अध्यक्ष के रूप में लेखन में तल्लीन हाशिम ने बताया कि मीराबाई के पदों को 1510 शेर के रूप में अनुवाद किया है। उनके 209 पदों व भजनों को कई ग्रंथों व किताबों से खोज कर तीन साल तक कड़ी मेहनत कर अपनी किताब लिखा। एक सप्ताह पूर्व प्रकाशित मीराबाई उर्दू शायरी उर्दू और हिंदी दोनो संस्करणों में अमेजन पर शीघ्र उपलब्ध हो जाएगी।

गंगा जमुनी तहजीब के भी अलंबरदार

शायरी, गजल, जश्न-ए-रेख्ता में अलग पहचान रखने वाले 32 वर्षीय हाशिम ने अनौपचारिक वार्ता में बताया कि बचपन से अपने कस्बे में अजान और भजन की धुन साथ सुनने की आदत रही। हमारे यहाँ सभी सम्प्रदाय के लोगों में मिलजुल कर साथ रहने की मानसिकता है। इस एक नज्म सुनाया' नफरतों का न कोई मजहब है, नफरतों का न कोई इतरफ़ा है, नफरतों का न कोई मसलत है, नफरतों का न कोई सजरा है, नफरत जंगलों के निजाम हैं, नफरत बुझदिलों का काम है, नफरत पहले दिन से गुलाम है, नफरत क्यों जमाने मे आम है.. उनकी यह पंक्तियां, साम्प्रदायिक सौहार्द और गंगा जमुनी तहजीब को बढ़ावा देती है। उन्होंने बताया कि हमारे यहाँ हम हिदू, मुस्लिम भाई ईद हो या मुहर्रम, दीपावली हो होली सभी लोग आपसी सौहार्द और प्रेम से मनाते हैं।

मीराबाई को माना अच्छा शायर

शायरी को विरासत में पाने वाले हाशिम ने इलेक्ट्रिकल इंजीनीयरिंग में एमटेक किया है। कई राष्ट्रीय, अंतराष्ट्रीय सम्मेलनों में शोध पत्र पढ़कर पहचान बनाई है। कक्षा 6 में उर्दू के प्रश्नपत्र में मशहूर शायर पर निबंध लेखन के दौरान मीराबाई पर निबंध लिखकर गुरुजनों को गंगा जमुनी तहजीब का परिचय दे दिया। इस दौरान उनके अंग्रेजी के शिक्षक ने भविष्य में बड़े शायर होने की बात कही। उन्होंने ने कहा कि गिरधर गोपाल के प्रेम की दीवानी महलों में रहने वाली मीराबाई से बड़ा कोई शायर नही। वे जहाँ गईं, स्थानीय भाषा में रचना कर दिया। उन्होंने रचनाओं में 14 भाषा की झलक दी है, जिसमें ब्रज, अवधी, भोजपुरी, उर्दू, फ़ारसी, अरबी, गुजराती जबान का प्रयोग करके हिदू-मुस्लिम एकता का मिश्रण किया है।

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Posted By: Amit Singh