जिस बगावत से बनी टीएमसी, अब उसी चुनौती से जूझ रहीं ममता बनर्जी
ममता बनर्जी, जिन्होंने कांग्रेस से बगावत कर तृणमूल कांग्रेस बनाई थी, अब अपनी ही पार्टी में विद्रोह और चुनाव चिह्न विवाद का सामना कर रही हैं।

HighLights
ममता बनर्जी ने 1998 में कांग्रेस से अलग होकर TMC बनाई।
TMC आंतरिक कलह और चुनाव चिह्न विवाद से जूझ रही है।
भाजपा के खिलाफ ममता अब कांग्रेस का समर्थन ले रही हैं।
डिजिटल डेस्क, कोलकाता। पश्चिम बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी की यात्रा एक तरह से पूरे चक्र में लौटती दिखाई दे रही है। वर्ष 1998 में कांग्रेस नेतृत्व से लंबे समय से चले आ रहे मतभेदों के बाद ममता बनर्जी ने पार्टी से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस का गठन किया था। उनका मानना था कि कांग्रेस पश्चिम बंगाल में दशकों से शासन कर रहे वाम मोर्चे को पर्याप्त चुनौती नहीं दे रही है।
इसके बाद ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस को राज्य की प्रमुख राजनीतिक ताकत के रूप में स्थापित किया और 2011 में वाम मोर्चे के 34 वर्ष लंबे शासन का अंत कर राज्य में सरकार बनाई। वह लगातार 15 वर्ष तक मुख्यमंत्री रहीं।
अब राजनीतिक परिस्थितियां बदल गई हैं। मई में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 200 से अधिक सीटें हासिल कर पहली बार पश्चिम बंगाल में सरकार बनाई, जबकि तृणमूल कांग्रेस 100 से कम सीटों पर सिमट गई। सत्ता से बाहर होने के बाद पार्टी के भीतर भी असंतोष और विभाजन की स्थिति सामने आई।
पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर विवाद
तृणमूल कांग्रेस में हुए विभाजन के बाद पार्टी के भीतर के ही कुछ नेता ममता बनर्जी के नेतृत्व और नियंत्रण को चुनौती दे रहे हैं। विवाद अब पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न तक पहुंच गया है।
निर्वाचन आयोग ने विवाद के निपटारे तक तृणमूल कांग्रेस के मूल नाम और उसके प्रसिद्ध 'जोड़ा घास फूल' चुनाव चिह्न को अस्थायी रूप से फ्रीज कर दिया है। आयोग को यह तय करना है कि पार्टी के वास्तविक दावे का अधिकार किस गुट के पास है।
इस बीच एक दिलचस्प राजनीतिक स्थिति भी बनी है। जिस कांग्रेस से अलग होकर ममता बनर्जी ने करीब 28 वर्ष पहले अपनी अलग पार्टी बनाई थी, आज उसी कांग्रेस के समर्थन की उन्हें जरूरत पड़ रही है। भाजपा के राजनीतिक अभियान के बीच ममता बनर्जी के लिए कांग्रेस का समर्थन महत्वपूर्ण हो गया है।
इस तरह ममता बनर्जी की राजनीतिक यात्रा में एक उल्लेखनीय विरोधाभास सामने आया है। जिस विद्रोही तेवर के साथ उन्होंने कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस बनाई थी, आज उनकी अपनी पार्टी में उठे विद्रोह ने उनके नेतृत्व और संगठनात्मक नियंत्रण के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है।
ममता बनर्जी की राजनीतिक यात्रा
1970 का दशक: कांग्रेस से राजनीतिक सफर की शुरुआत की और छात्र-युवा राजनीति में सक्रिय हुईं।
1984: जादवपुर लोकसभा सीट से दिग्गज वामपंथी नेता सोमनाथ चटर्जी को हराकर पहली बार सांसद बनीं।
1991: कलकत्ता दक्षिण से लोकसभा में वापसी की और 1996, 1998, 1999, 2004 व 2009 में भी जीत दर्ज की।
1990 का दशक: पश्चिम बंगाल की वाम सरकार के खिलाफ सड़क पर आंदोलन को अपनी राजनीति का प्रमुख हथियार बनाया।
1998: कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस (TMC) की स्थापना की।
2007: सिंगुर और नंदीग्राम आंदोलनों के जरिए वाम मोर्चा सरकार के खिलाफ बड़ा जनाधार बनाया।
2011: 34 साल के वाम शासन को खत्म कर पहली बार पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनीं।
2021: नंदीग्राम से चुनाव लड़ीं, लेकिन सुवेंदु अधिकारी से करीब 2,000 वोटों से हार गईं; हालांकि TMC ने राज्य में सरकार बनाई।
2026: भाजपा के सत्ता में आने के बाद सत्ता से बाहर हुईं। नंदीग्राम उपचुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार को समर्थन देकर कांग्रेस को 'बहन पार्टी' और 'स्वाभाविक गठबंधन' बताया।
कांग्रेस से कड़वाहट
पश्चिम बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी और कांग्रेस के रिश्ते लंबे समय तक तल्ख रहे हैं। मुख्यमंत्री के रूप में अपने 15 साल के कार्यकाल के दौरान ममता ने राज्य में कांग्रेस के राजनीतिक अस्तित्व को खास तवज्जो नहीं दी। कांग्रेस और वाम दल दोनों ही उनके लिए प्रमुख राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी रहे। ममता अक्सर कांग्रेस और वाम दलों पर भाजपा की 'बी टीम' होने का आरोप लगाती रही हैं।
हालांकि, इस साल मई में सत्ता गंवाने के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति में समीकरण बदलते दिखाई दे रहे हैं। भाजपा के सत्ता में आने के बाद ममता ने नंदीग्राम विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार को समर्थन देने का एलान किया है। छह अक्टूबर को होने वाले इस उपचुनाव में कांग्रेस के मिलन प्रधान मैदान में हैं।
चुनाव आयोग के मुद्दे पर कांग्रेस ने दिया ममता का साथ
ममता और कांग्रेस के रिश्तों में बदलाव की एक वजह चुनाव आयोग के खिलाफ दोनों दलों का साथ आना भी है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने चुनाव आयोग के खिलाफ ममता के आरोपों और उनकी लड़ाई को मजबूती से समर्थन दिया है।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि पश्चिम बंगाल में दोनों दलों के बीच तत्काल कोई बड़ा चुनावी गठबंधन बनने जा रहा है। राज्य कांग्रेस की इकाई अभी भी ममता बनर्जी की पार्टी के साथ गठबंधन के पक्ष में नहीं है। वर्षों तक तृणमूल कांग्रेस के राजनीतिक दबाव का सामना कर चुके प्रदेश कांग्रेस नेताओं का रुख इस मामले में स्पष्ट बताया गया है।
सत्ता बदलते ही बदले राजनीतिक समीकरण
ममता बनर्जी सत्ता से बाहर होने के बाद लगातार भाजपा पर उनकी पार्टी को कमजोर करने और राजनीतिक निशाना बनाने के आरोप लगाती रही हैं। लेकिन पश्चिम बंगाल की राजनीति का इतिहास बताता है कि सत्ता में आने के बाद तृणमूल कांग्रेस पर भी विपक्षी दलों ने इसी तरह के आरोप लगाए थे।
2011 में ममता ने 34 साल लंबे वाम मोर्चे के शासन को खत्म कर सत्ता हासिल की थी। इसके बाद वाम दलों और कांग्रेस ने तृणमूल कांग्रेस पर राजनीतिक दबाव बनाने और दल-बदल के जरिए विरोधियों को कमजोर करने के आरोप लगाए थे।
आज परिस्थितियां भले ही अलग हों, लेकिन राजनीतिक भूमिकाओं में बदलाव जरूर दिखाई देता है। ममता जिस तरह के आरोप भाजपा पर लगा रही हैं, उसी तरह के आरोप कभी उनके विरोधी दल तृणमूल कांग्रेस पर लगाया करते थे।
कांग्रेस से शुरू हुआ था ममता का राजनीतिक सफर
ममता बनर्जी का राजनीतिक सफर कांग्रेस से ही शुरू हुआ था। उन्होंने 1970 के दशक में कांग्रेस की राजनीति में कदम रखा। आपातकाल के दौर में जयप्रकाश नारायण के खिलाफ उनके विरोध प्रदर्शन ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां दिलाईं।
इसके बाद वह कांग्रेस में तेजी से आगे बढ़ीं। 1984 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने जादवपुर सीट से दिग्गज कम्युनिस्ट नेता सोमनाथ चटर्जी को हराकर बड़ा राजनीतिक उलटफेर किया। उस समय वह देश की सबसे कम उम्र की सांसदों में शामिल थीं।
1989 में उन्हें हार मिली, लेकिन 1991 में उन्होंने कलकत्ता दक्षिण सीट से जोरदार वापसी की। इसके बाद 1996, 1998, 1999, 2004 और 2009 के लोकसभा चुनावों में भी उन्होंने यह सीट अपने नाम की।
कांग्रेस से मतभेद और तृणमूल कांग्रेस का गठन
1990 के दशक में कांग्रेस नेतृत्व के साथ ममता के मतभेद लगातार बढ़ते गए। उनका मानना था कि पश्चिम बंगाल की वाम मोर्चा सरकार के खिलाफ कांग्रेस पर्याप्त आक्रामक तरीके से संघर्ष नहीं कर रही है। ममता की राजनीति का बड़ा आधार सड़क पर आंदोलन और प्रदर्शन रहा। 1993 में पश्चिम बंगाल युवा कांग्रेस की अध्यक्ष रहते हुए उन्होंने मतदाता पहचान पत्र की मांग को लेकर राइटर्स बिल्डिंग तक मार्च निकाला था। इसका उद्देश्य कथित चुनावी धांधली को रोकने के लिए मतदाता पहचान पत्र की मांग करना था। प्रदर्शन के दौरान पुलिस फायरिंग में 13 कांग्रेस कार्यकर्ताओं की मौत हुई थी।
1997 तक कांग्रेस नेतृत्व के साथ उनके मतभेद निर्णायक मोड़ पर पहुंच गए। इसके बाद 1998 में ममता ने कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस का गठन किया। आगे चलकर सिंगुर और नंदीग्राम के आंदोलनों ने उनकी आंदोलनकारी राजनीति को ऐसी राजनीतिक ताकत में बदल दिया, जिसने 2011 में पश्चिम बंगाल की सत्ता से वाम मोर्चे को बाहर कर दिया।
नंदीग्राम ने ममता को बनाया भी और झटका भी दिया
नंदीग्राम ममता बनर्जी के राजनीतिक सफर में हमेशा खास रहा है। 2007 में भूमि अधिग्रहण के खिलाफ नंदीग्राम आंदोलन ने उन्हें वाम मोर्चे के खिलाफ सबसे मजबूत चुनौती के रूप में स्थापित किया। चार साल बाद 2011 में वह मुख्यमंत्री बनीं। लेकिन नंदीग्राम ने उन्हें व्यक्तिगत चुनावी झटका भी दिया।
2021 के विधानसभा चुनाव में ममता ने अपने पूर्व सहयोगी सुवेंदु अधिकारी के खिलाफ नंदीग्राम से चुनाव लड़ने का फैसला किया। सुवेंदु बाद में भाजपा में शामिल हो गए थे और नंदीग्राम उनका मजबूत राजनीतिक आधार माना जाता था। ममता इस सीट पर करीब 2000 वोटों से चुनाव हार गईं, हालांकि उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने राज्य में भारी बहुमत के साथ सरकार बनाई।
2026 में फिर नंदीग्राम की ओर लौटी चुनौती
2026 में राजनीतिक परिस्थितियां पूरी तरह बदल गईं। इस बार सुवेंदु अधिकारी ने ममता के मजबूत माने जाने वाले भवानीपुर क्षेत्र से भी चुनाव लड़ा और नंदीग्राम में अपना प्रभाव बरकरार रखा। उन्होंने भवानीपुर सीट भी जीती और नंदीग्राम सीट छोड़ दी, जिसके बाद वहां उपचुनाव की जरूरत पड़ी। लेकिन उपचुनाव शुरू होने से पहले ही ममता बनर्जी को बड़ा झटका लगा।
नंदीग्राम उपचुनाव के लिए तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार ने मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी से मुलाकात के बाद अपना नाम वापस ले लिया। इससे तृणमूल कांग्रेस के सामने अपने उम्मीदवार का संकट खड़ा हो गया। इसके बाद ममता बनर्जी ने कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान को समर्थन देने की घोषणा कर दी।
ममता के राजनीतिक सफर का आईना बना नंदीग्राम
नंदीग्राम ने ममता बनर्जी की राजनीति के लगभग हर महत्वपूर्ण दौर को देखा है। यही वह जगह रही जिसने उन्हें वाम मोर्चे के खिलाफ बड़ी राजनीतिक ताकत बनने में मदद की। इसी सीट पर उन्हें 2021 में व्यक्तिगत चुनावी हार का सामना करना पड़ा और अब सत्ता से बाहर होने के बाद यही सीट उनके सामने नई राजनीतिक चुनौती के रूप में खड़ी है।
कांग्रेस को 'बहन पार्टी' और 'स्वाभाविक गठबंधन' बताने से ममता के पुराने राजनीतिक रुख में बदलाव के संकेत जरूर मिले हैं। हालांकि, पश्चिम बंगाल कांग्रेस की मौजूदा स्थिति यह बताती है कि दोनों दलों के बीच व्यापक राजनीतिक गठबंधन की राह अभी आसान नहीं है।
