नई दिल्ली [जागरण स्पेशल]। जीडीपी यानी सकल घरेलू उत्पाद के मामले में भारत दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। इसके बावजूद कुपोषण की समस्या देश को जकड़े हुए है। इसकी वजह से देश की बड़ी आबादी खराब स्वास्थ्य से जूझ रही है, जिसका असर देश की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा है।

औद्योगिक संस्था एसोचैम और कंसंल्टेंसी फर्म ईवाय ने इस साल जनवरी में कुपोषण के आर्थिक प्रभावों के बारे में संयुक्त रिपोर्ट पेश की थी। इसके मुताबिक कुपोषण की वजह से देश की जीडीपी को तकरीबन चार फीसद का नुकसान होता है। यह नुकसान लोगों की उत्पादकता घटने और कुपोषण से होने वाली बीमारियों के इलाज में लगने वाली राशि के चलते होता है। अगर लोगों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराया जा सके तो उन्हें इस आर्थिक नुकसान से बचाया जा सकता है।

गंभीर हालात

देश में 90 फीसद बच्चों को संतुलित और पौष्टिक आहार नहीं मिलता है। नतीजतन इन बच्चों का सही शारीरिक और मानसिक विकास नहीं हो पाता। यह बच्चे जब देश की कामकाजी आबादी में जुड़ते हैं तो उत्पादकता के मानकों पर कम रह जाते हैं। इससे उनकी आय भी कम होती है और देश की अर्थव्यवस्था पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

गरीबी का कुचक्र

अमीर परिवारों में पैदा होने वाले बच्चों की तुलना में गरीब परिवारों के बच्चों के कुपोषित होने की संभावना 2.8 फीसद अधिक होती है। ये बच्चे अधिक बीमार पड़ते हैं जिससे इनके इलाज में अधिक धन खर्च होता है। इसके चलते परिवार पौष्टिक आहार पर धन खर्च नहीं कर पाता। लिहाजा पीढ़ी दर पीढी गरीबी का दुष्चक्र अनवरत चलता रहता है।

इलाज के खर्च का बोझ

बचपन में पौष्टिक आहार की कमी आगे चलकर हृदय रोग, डायबिटीज, मोटापा और हाइपरटेंशन जैसी गंभीर बीमारियों का कारण बनती है। इन बीमारियों के इलाज में लगने वाली बड़ी राशि भी परिवार और देश की अर्थव्यवस्था पर प्रभाव डालती है।

सरकार की बढ़ती जिम्मेदारी

अर्थव्यवस्था पर पडने वाले बोझ को कम करने के लिए देश के प्रत्येक व्यक्ति तक पौष्टिक खाद्यान्न पहुंचाना सरकार की बड़ी जिम्मेदारी है। लिहाजा इस साल बजट में सरकार ने खाद्यान्न व पोषण सुरक्षा सब्सिडी के मद में 1700 अरब रुपये का आवंटन किया।  

Posted By: Sanjay Pokhriyal