नई दिल्‍ली [जागरण स्‍पेशल]। देश में कुपोषण की गंभीर स्थिति को बताने के लिए आंकड़ों की कमी नहीं है। बुलंद भारत की इस बदरंग तस्वीर की कई वजहें हैं। इनमें सबसे बड़ी वजह लोगों का पौष्टिक खुराक न लेना है। सुविधा संपन्न और वंचित तबकों को समान रूप से यह वजह प्रभावित कर रही है। कभी हमारे आहार का जरूरी हिस्सा रहे मोटे अनाज आज उपेक्षित हैं। औसतन अन्य अनाजों की तुलना में ज्यादा पौष्टिक इन मोटे अनाजों के सेवन से हम अपना और अपनों का सुपोषण सुनिश्चित कर सकते हैं।

जरूरत है बड़ी
महंगाई के दौर में गरीबों को पेट भरने के लिए पौष्टिक भोजन के रूप में मोटे अनाजों की आपूर्ति। गौरतलब है कि 26 सबसे गरीब अफ्रीकी देशों से भी ज्यादा गरीब लोग केवल आठ भारतीय राज्यों (बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्यप्रदेश, उड़ीसा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल) में रहते हैं। 26 दक्षिण अफ्रीकी देशों में कुल गरीबों की संख्या 41 करोड़ है जबकि केवल इन आठ भारतीय प्रदेशों में 42.1 करोड़ गरीब आबादी निवास कर रही है।

मोटा अनाज
घास कुल (ग्रैमिनी) के पौधे जिनको उनके बीज के लिए उगाया जाता है। अनाज कहलाते हैं। एक परिपक्व अनाज के दाने के तीन भाग होते हैं। भ्रूण या जर्म, स्टार्च युक्त इंडोस्पर्म और पेरी कार्प या वाह्य आवरण। कुछ अनाज के दानों की वाह्य झिल्ली रेशेदार छिलकों से कसी होती है, जिनको मंड़ाई से भी सामान्यत: नहीं निकाला जा सकता है। इन अनाजों को मोटा अनाज कहते हैं। जैसे चना, ज्वार, बाजरा, मक्का, कोदो, मडुवा, सांवा, रागी, कुटकी, कंगनी आदि।

अब पौष्टिकता हो रही प्रमाणित
देहाती भोजन समझकर जिन मोटे अनाजों को रसोई से बाहर किया जा चुका है, अब वैज्ञानिक शोध से बार-बार उनकी पौष्टिकता प्रमाणित हो रही है। भारतीय खाद्य एवं चारा विभाग की फसल विज्ञानी डा. उमा रघुनाथन के मुताबिक धान और गेहूं की अपेक्षा सावां, कोदो जैसे मोटे अनाजों की पौष्टिकता अधिक है। इस संबंध में डा. उमा का भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की पत्रिका में शोधपत्र प्रकाशित हो चुका है।

गुणों की खान
मोटे अनाज में पल्प अधिक होता है। यह आंतों में चिपकने की बजाय आसानी से आगे बढ़ता है। इससे पेट पर कब्ज का कब्जा नहीं हो पाता। मोटा अनाज सुपाच्य है। हाजमा ठीक रखता है। मोटापे को हावी नहीं होने देता। तासीर के अनुसार भी सेवन किया जा सकता है। पहले माताएं शिशुओं को ज्वार और मक्के के आटे का घोल पिलाती थीं। यह उनके लिए सुपोषक होता था।

इनको भी परखें
जई: यह आसानी से पचने वाले फाइबर और कॉम्पलेक्स कार्बोहाइडेट्स का अच्छा स्रोत है। लो सैच्यूरेटेड फैट के साथ लेने पर हृदय संबंधी बीमारियों के खतरे को कम करता है। यह एलडीएल (लो डेसिंटी लिपोप्रोटीन) की क्लियरेंस बढ़ाता है। इसमें मौजूद फोलिक एसिड बढ़ती उम्र वाले बच्चों के लिए बहुत उपयोगी होता है। यह एंटीकैंसर भी होता है। इसमें कैल्शियम, जिंक, मैग्नीज, लोहा और विटामिन-बी व ई भरपूर मात्रा में होते हैं। यह डिसलिपिडेमिया और डायबिटीज पीड़ितों के लिए फायदेमंद है।

जौ: इस अनाज में सबसे ज्यादा अल्कोहल पाया जाता है। यह पच जाने वाले फाइबर का भी अच्छा स्रोत है। यह ब्लड कोलेस्ट्रोल को कम करके ब्लड ग्लूकोज को बढ़ाता है। मैग्नीशियम का भी अच्छा स्रोत और एंटीऑक्सीडेंट है। अल्कोहल की प्रचुर मात्रा से यह मूत्रवर्धक का काम करता है। यह हाइपरटेंशन से पीड़ितों के लिए फायदेमंद है।

बाजरा: यह प्रोटीन का भंडार है। बाजरे में मैथाइन, ट्राइप्टोफान और इनलिसाइन बड़ी मात्रा में पाया जाता है। यह थायमीन अथवा विटामिन-बी का अच्छा स्नोत है और आयरन तथा कैल्शियम का भी भंडार है।

ज्वार: यह भी एक तरह से जाड़ों में पसंद किया जाने वाला अनाज है। इसमें बहुत कम वसा होती है और ये कार्बोहाइडे्रट का जबरदस्त भंडार है। इसमें भी आयरन, कैल्शियम का उपयोगी भंडार होता है।

रागी: कैल्शियम का जबरदस्त स्रोत, इसलिए ऑस्टेपेनिया और ऑस्टेपोरेसिस से ग्रस्त लोगों के लिए फायदेमंद। यह मेनोपॉज के बाद महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए भी उपयोगी लेक्टोज की समस्या से पीड़ितों के लिए लाभकारी। इसीलिए रागी का प्रयोग छोटे बच्चों के भोजन में भी होता है।

बाजारीकरण से ब‍िगड़ी स्थिति
आजादी के बाद बदली कृषि-नीति ने भारतीयों को गेहूं और चावल जैसी फसलों पर निर्भर बना दिया। बाजारीकरण के बढ़ते प्रभाव से लोगों का मोटे अनाजों से मोहभंग होता चला गया। हरित क्रांति के दौर में जिस एकफसली खेती को बढ़ावा मिला उनमें धान और गेहूं को केंद्रीय भूमिका मिली। लिहाजा कुल कृषि योग्य भूमि में मोटे अनाजों की पैदावार कम होती गई। 1966 से 2006 के पिछले चार दशकों में चावल का उत्पादन 3.8 करोड़ से बढ़कर 8.6 करोड़ टन और गेहूं का उत्पादन 1.5 करोड़ टन से बढ़कर सात करोड़ टन हो गया जबकि मोटे अनाजों का उत्पादन 1.85 करोड़ टन से घटकर 1.8 करोड़ टन रह गया। 

Posted By: Krishna Bihari Singh

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