[डॉ. अरविंद कुमार]। जब फेफड़ों के किसी भाग में कोशिकाओं की अनियंत्रित व असामान्य वृद्धि होने लगती है, तो इस स्थिति को फेफड़े का कैंसर कहते हैं। फेफड़े के कैंसर का शुरुआती दौर में पता नहीं चलता और यह अंदर ही अंदर बढ़ता जाता है। वास्तव में, फेफड़े का कैंसर फेफड़े के बाहर भी बढ़ जाता है और इसके लक्षण भी अक्सर पता नहीं चलते हैं। कैंसर एक ऐसी बीमारी है, जिसका पूरी तरह से इलाज अब भी नहीं मिल पाया है। शरीर के अलग-अलग हिस्सों में होने वाला कैंसर अक्सर जानलेवा साबित होता है। फेफड़े का कैंसर एक गंभीर मर्ज है, लेकिन आधुनिक मेडिकल साइंस में हुई प्रगति के कारण अब इस कैंसर से छुटकारा संभव है...

कैंसर के प्रकार
1. स्माल सेल लंग कैंसर (एससीएलसी): यह सबसे ज्यादा तेजी से बढ़ने वाला फेफड़े का कैंसर है। यह कैंसर धूम्रपान के कारण होता है। एससीएलसी शरीर के विभिन्न हिस्सों में फैलता है और अक्सर जब यह ज्यादा फैल चुका होता है, तब ही इसका पता चलता है।

2.नॉन-स्मॉल सेल लंग कैंसर (एनएससीएलसी): यह ऐसा कैंसर है, जिसे तीन प्रकारों में विभक्त किया जा सकता है। इनके नाम ट्यूमर में मौजूद सेल्स के आधार पर होते हैं। जैसे एडिनोकार्सिनोमा, स्क्वेमस सेल कार्सिनोमा और लार्ज सेल कार्सिनोमा।

लक्षणों को जानें

- खांसी जो लगातार बनी रहती है।
- बलगम के रंग और मात्रा में बदलाव आना।
- खांसी के साथ खून निकलना।
- सांस फूलना।
- वजन कम होना।
- सीने में बार-बार संक्रमण होना और सीने में लगातार दर्द का बने रहना।

एक बड़ी चुनौती
देश में फेफड़े के कैंसर की पहचान शुरुआती दौर में कर लेना एक बड़ी चुनौती है। ऐसा इसलिए, क्योंकि देश में टी.बी.के मामले बहुत अधिक हैं। फेफड़े के कैंसर के अधिकांश लक्षण फेफड़े की टी.बी.से मिलते हैं। अधिकांश मामलों में जो मरीज फेफड़े के कैंसर के लक्षणों के बारे में बताता है, उसे बिना किसी परीक्षण के टी.बी. का मरीज बता दिया जाता है। इसलिए फेफड़े के कैंसर के प्रति जागरूक होना बहुत जरूरी है और इसका पता करने के लिए उचित परीक्षण करना चाहिए।

बचाव
फेफड़े के कैंसर से बचने के लिए किसी भी तरह के धूम्रपान से दूर रहना आवश्यक है। सुबह के वक्त टहलें और जहां तक संभव हो प्रदूषण वाले माहौल से बचें। दोपहिया वाहन सवार व्यक्ति वाहनों से निकलने वाले प्रदूषण से बचने के लिए मास्क का इस्तेमाल कर सकते हैं। प्राणायाम करने से फेफड़े सशक्त होते हैं।

इलाज में स्क्रीनिंग की भूमिका
विभिन्न विधियों में एकमात्र विधि जो फेफड़े के कैंसर से मौतों को रोकने में उपयोगी साबित हुई है, वह है, लो डोज कंप्यूटेड टोमोग्राफिक स्क्रीनिंग (एलडीसीटी)। एलडीसीटी से फेफड़े के कैंसर का पता लग जाने के बाद लंग कैंसर से होने वाली मौतें 15 से 20 फीसदी कम की जा सकती हैं। इसके अलावा कोई व्यक्ति जिसकी आयु 55 वर्ष से अधिक है और वह 25 वर्ष से ज्यादा समय से धूम्रपान कर रहा हो तो इन मरीजों का सीटी स्कैन किया जाना चाहिए।

इलाज के बारे में
फेफड़े के कैंसर का इलाज इस बात पर निर्भर करता है कि वह कौन से प्रकार का है और वह किस स्टेज पर है। नॉन स्माल सेल लंग कैंसर का इलाज स्माल सेल लंग कैंसर से अलग है। यदि फेफड़े के कैंसर की डायग्नोसिस जल्दी यानी स्टेज1, स्टेज 2 और स्टेज 3, पर हो तो सर्जरी से इलाज हो सकता है। कुछ मामलों में सर्जरी और कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी से इलाज हो सकता है। लेकिन यदि बीमारी स्टेज 4 में है यानी वह शरीर के अन्य हिस्सों में फैल चुकी है तो इलाज का विकल्प कीमोथेरेपी या फिर टार्गेटेड थेरेपी या रेडियोथेरेपी रह जाता है।

सर्जिकल विकल्प: सर्जरी से ट्यूमर को निकाल दिया जाता है। यह फेफड़े के कैंसर का कारगर इलाज है, जिसे ओपन कीहोल विधि से अंजाम दिया जा सकता है।

ओपन विधि: सर्जन छाती को ओपन करता है ताकि वह फेफड़े तक पहुंच सके। छाती में पसलियों के बीच से काटकर सर्जरी की जाती है, ताकि फेफड़े के कैंसर वाले टिश्यूज हटाए जा सके। वीडियो-असिस्टेड थोरेसिक सर्जरी यह छोटे छेद द्वारा की जाने वाली तकनीक है। इसमें कैमरे का उपयोग करते हुए 5 मिमी से 10 मिमी के तीन छेद किए जाते हैं। इसमें सर्जन फेफड़े के कैंसर के टिश्यू को हटाता है। वीएटीएस में तेजी से रिकवरी होती है और फेफड़े के कैंसर में की जाने वाली ओपन सर्जरी के मुकाबले दर्द भी कम होता है। ऐसा इसलिए, क्योंकि इसमें ज्यादा चीरफाड़ नहीं है। वीएटीएस का उपयोग लंग टिशू की बॉयोप्सी में भी किया जाता है ताकि फेफड़े के कैंसर का पता चल सके।

रोबोटिक असिस्टेड थोरेसिक

सर्जरी: रोबोटिक सर्जरी में भी कम से कम चीर-फाड़ की जाती है। ऐसे उपकरण हैं, जो शरीर के काफी भीतर तक जाते हैं, जिससे सर्जरी को कारगर ढंग से अंजाम दिया जाता है। इसमें रिकवरी जल्दी होती है।
[चेस्ट कैंसर विशेषज्ञ, सर गंगाराम हॉस्पिटल,
नई दिल्ली] 

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