इंदौर (अमित जलधारी)। महज डेढ़ साल में इंदौर ने देश का सर्वश्रेष्ठ, अत्याधुनिक व सुव्यवस्थित ट्रेंचिंग ग्राउंड विकसित कर दिखाया, जो अन्य शहरों के लिए अनुकरणीय उदाहरण है। पिछले साल देश के सबसे स्वच्छ शहर का ताज पाने वाले इंदौर के नाम हाल ही एक उपलब्धि और जुड़ गई, जब उसके ट्रेंचिंग ग्राउंड (जहां कचरा एकत्र किया जाता है) को पर्यावरणीय सुरक्षा पैमानों पर खरा उतरने, गुणवत्ता प्रबंधन और स्वास्थ्य व सुरक्षा प्रबंधों के लिए तीन आइएसओ (इंटरनेशनल ऑर्गेनाइजेशन फॉर स्टेंडर्डाइजेशन) प्रमाण पत्र मिले। इस मामले में यह देश का पहला ट्रेंचिंग ग्राउंड बन गया है।

इन पांच इंतजामों ने बनाया नंबर एक शहर के पास देवगुराड़िया इलाके में 146 एकड़ में फैले ग्राउंड पर गत डेढ़ साल के भीतर पांच बड़े इंतजाम किए गए। जिनके बूते शहर से हर दिन निकलने वाले करीब 1100 टन कचरे का प्रबंधन बेहतर तरीके से किया जा रहा है।

आधारभूत सुविधाओं को व्यवस्थित किया गया: सबसे पहले ट्रेंचिंग ग्राउंड की आधारभूत सुविधाओं जैसे प्लांट, मशीनरी, सड़क और बिल्डिंग आदि को व्यवस्थित किया गया। पहले सूखा कचरा गीले कचरे में मिलकर आता था। सूखे कचरे के कागज, रद्दी, गीले कचरे की नमी को सोख लेते थे, जिससे सूखा कचरा भारी हो जाता था और उसे बेचना मुश्किल हो जाता था। अब यह समस्या खत्म हो गई है। इसके अलावा शहर से निकलने वाले मलबे और वेस्ट मटेरियल से ईंट-पेवर ब्लॉक बनाने का प्लांट भी करीब ढाई करोड़ की लागत से स्थापित किया गया है।

अब रोज आने वाले कचरे का 100 फीसदी निपटान

ग्राउंड पर दो मटेरियल रिकवरी सेंटर शुरू किए गए, जहां रोज 450 टन सूखे कचरे का निपटान होता है। हाई और लो डेंसिटी पॉलिथीन को ग्राउंड पर लगी दो यूनिटों में साफ कर रीसाइकिल किया जाता है। प्लास्टिक के कचरे से रॉ मटेरियल तैयार किया जाता है।

खत्म हो रहा कचरे का पहाड़

ट्रेंचिंग ग्राउंड में पड़ा पुराना 12-15 लाख मीट्रिक टन कचरे का धीरे-धीरे निपटान किया जा रहा है। पुराने कचरे की मिट्टी के इस्तेमाल से ग्राउंड पर आठ बगीचे बनाए गए हैं। बदबू खत्म करने को बायो कल्चर जैविक पदार्थ डाला जा रहा है जो कचरे को कंपोस्ट में बदलने की प्रक्रिया भी तेज करते हैं।

कचरा बीनने वालों को दिया काम

हर वार्ड में कचरा बीनने वाले 500 लोगों को ट्रेंचिंग ग्राउंड पर काम दिया गया। उनके मेडिकल चेकअप और जरूरी टीकों का भी इंतजाम भी किया गया है।

सभी प्रक्रियाओं को स्थायी बनाने का प्रयास

अगले कुछ महीने में मजदूरों से लिया जाने वाला काम स्वचालित मशीनों से कराया जाएगा। वेस्ट टू एनर्जी प्लांट लगाने की भी योजना है ताकि कचरे से बिजली पैदा की जा सके। नगम निगम के सलाहकार अरशद वारसी बताते हैं कि भीतरी उपायों के साथ बाहरी सूरत बदलने के लिए चारों ओर बांस लगाए गए हैं, जो बड़े होकर ग्राउंड को परदे की तरह ढंक लेंगे और खूबसूरत भी दिखेंगे। पौधारोपण से भूजल साफ करने में मदद मिलेगी, साथ ही क्षेत्र में ऑक्सीजन भी बढ़ेगी। 

इसलिए बना स्वच्छता का सिरमौर 

शहर में 3000 से ज्यादा लिटरबिन लगाए गए हैं। गीले के लिए अलग और सूखे कचरे के लिए अलग।

दिन में दो बार होती है सड़कों की सफाई। रात में 12 मशीनों की मदद से रोज 500 किमीलंबाई में सड़कें साफ की जाती हैं। डोर टू डोर कचरा कलेक्शन के लिए 525 गाड़ियां दौड़ रही हैं, जिनमें सूखे और गीले कचरे व यूज्ड सैनेटरी पेड और डाइपर के लिए अलग-अलग कंपार्टमेंट हैं।

पब्लिक ट्रांसपोर्ट के वाहनों में लिटरबिन लगाना अनिवार्य कर दिया गया है।

गंदगी फैलाने पर वालों पर एक लाख रुपए तक जबकि थूकने वालों, खुले में शौच या पेशाब करने वालों के ऊपर 100 से 500 रुपए तक का जुर्माना लगाया जा रहा है।

शहर में 172 पब्लिक और 125 कम्युनिटी टॉयलेट, 232 मूत्रालय बनाए गए हैं।

नया सिस्टम बनने के बाद उसके संचालन पर सालाना 130 से 135 करोड़ रुपए खर्च हो रहे हैं। इनमें अकेले 90 करोड़ रुपए तो 6500 सफाईकर्मियों की तनख्वाह के हैं। 

Posted By: Sanjay Pokhriyal