शिवा अवस्थी, चित्रकूट। आपातकाल की बात जुबां पर आते ही 73 वर्षीय कृष्णा प्रसाद त्रिपाठी आज भी सिहर उठते हैं। बीमारी से जूझ रहे त्रिपाठी के जेहन में पुरानी यादें ताजा होते ही आंखें नम हो जाती हैं। आपातकाल के दौरान पुलिस और प्रशासन की खिलाफत के बदले उनके घर पर ऐसा कहर ढहाया गया कि उनकी दुनिया ही बदल गई। पिता चल बसे तो मकान धराशायी हो गया। गर्भवती पत्नी को खासी प्रताड़ना झेलनी पड़ी। हालांकि, तत्कालीन प्रशासन द्वारा जनता और उनके प्रतिनिधियों का उत्पीड़न करने के खिलाफ आवाज उठाने पर उनका दमन होने के बावजूद लोकतंत्र की रक्षा कर पाने की संतुष्टि उनके चेहरे पर साफ दिखती है।

चित्रकूट की मऊ तहसील अंतर्गत ग्राम मवई कला निवासी लोकतंत्र के प्रहरी आपातकाल के दिन याद करते हैं तो कुछ पल के लिए ठहरकर यादों में खो जाते हैं। फिर एक-एक दिन याद कर लंबी सांस खींचते हुए कहते हैं कि मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की शाखा लगाता था। इसी दौरान 25 जून 1975 को आपातकाल की घोषणा हुई। कुछ समय तक पुलिस से लुकाछिपी चलती रही। राजापुर के उद्घटा निवासी रामप्रकाश द्विवेदी समेत दूसरों के साथ मिलकर अपना काम करता रहा।

एक साल बाद 25 जून 1976 को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। जेल जाने के बाद प्रशासन व पुलिस की खिलाफत करने के कारण घर पर जमकर कहर ढहाया गया। इससे काफी नुकसान हुआ। जेल जाने के बाद लगातार उत्पीड़न व दमन की कार्रवाई से समस्याओं में घिरे पिता रामदेव त्रिपाठी का निधन हो गया। कोई सहारा नहीं मिलने पर गर्भवती पत्नी की हालत खराब हो गई। इस बीच मौका पाकर लोगों ने मेरा ईंट का भट्ठा लूट लिया। उस समय उसकी कीमत करीब एक लाख रुपये रही होगी। बारिश के दौरान मेरे कच्चे मकान का आधे से ज्यादा हिस्सा ढह गया। कई जानवर मर गए। 11 फरवरी 1977 तक जेल में रहा। 12 फरवरी को जेल से छूटने के बाद घर पहुंचा तो सब कुछ बदल चुका था। इसके बाद तीन बेटों कुलदीप, जलेंद्र व भुवनेंद्र की परवरिश की। बेटी सरोज की शादी करने में काफी मशक्कत करनी पड़ी।

जेल में मिलती थी यातना

कृष्णा प्रसाद बताते हैं कि बांदा जेल में उनको सुबह से आटा गूंधने, साफ सफाई समेत दूसरे कामों में लगा दिया जाता था। कई बार मजबूरी बताने पर लाठी-डंडों से पिटाई भी की जाती थी। उनके शरीर पर कई जगह चोट के निशान अब भी मौजूद हैं, जो इमरजेंसी की याद दिलाते रहते हैं।

बात करने से कतराए परिचित

कृण्णा प्रसाद बताते हैं कि जेल से छूटकर आने पर काफी समय तक लोगों ने मुझसे बातचीत नहीं की। पुलिसिया कहर के कारण खुद के फंसने के डर से लोगों ने दूरी बनाए रखी। वर्तमान में वह अस्वस्थ होने के बाद भी कहते हैं कि जन विरोधी नीतियों का हमेशा विरोध करने के लिए तत्पर रहना चाहिए।

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Posted By: Sanjay Pokhriyal