नई दिल्ली, जेएनएन। भारत-अमेरिका के विदेश और रक्षा मंत्रियों की अगुआई में होने वाली टू प्लस टू वार्ता (2 plus 2 dialogue) में भारत और चीन के बीच एलएसी पर चल रहा सैन्य विवाद एक अहम मुद्दा होगा। यह पहला मौका होगा जब भारत और अमेरिका के बीच होने वाली वार्ता में भारत की सीमा सुरक्षा से जु़ड़े मुद्दे प्रमुखता से उठेंगे। एलएसी पर पिछले पांच महीने से जो स्थिति है उसको लेकर अमेरिका पहले भी अपनी चिंता जता चुका है। टू प्लस टू वार्ता के बाद जारी होने वाले संयुक्त बयान के जरिये भी चीन को संदेश दिए जाने की उम्मीद है।

जानकारों की मानें तो टू प्लस टू वार्ता के ठीक एक हफ्ते बाद अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव हैं, ऐसे में संयुक्त बयान में चीन की विस्तारवादी नीतियों का परोक्ष तौर पर जिक्र किया जा सकता है। वैसे भी अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में चीन विरोधी भावनाएं उफान पर हैं। विदेश मंत्री माइक पोंपिओ और रक्षा मंत्री मार्क एस्पर का रवैया चीन को लेकर खासा तल्ख है। पोंपिओ ने हाल ही में कहा था कि भारत चीन की विस्तारवादी नीतियों से काफी परेशान है।

दोनों तरफ से तनाव घटाने की कोशिश

अमेरिकी विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक नियंत्रण रेखा की स्थिति को लेकर निश्चित तौर पर बातचीत होगी। भारतीय पक्ष ने भी इस बात के संकेत दिए हैं कि सभी द्विपक्षीय मुद्दों के अलावा क्षेत्रीय व वैश्विक मुद्दों पर भी विस्तार से विमर्श किया जाएगा। टू प्लस टू वार्ता के तहत दूसरा सबसे अहम मुद्दा समुद्री क्षेत्र में सामरिक सहयोग बढ़ाना है। दिसंबर, 2019 में दूसरी टू प्लस टू वार्ता में भारतीय नौ सेना और अमेरिकी नेवी की यूएस इंडो पैसिफिक कमांड, सेंट्रल कमांड और अफ्रीका कमांड के बीच सहयोग के रोडमैप को मंजूरी दी गई थी और कहा गया था कि इसी तरह का सहयोग वायु सेना व थल सेना के बीच भी स्थापित किया जाएगा।

हिंद-प्रशांत क्षेत्र को लेकर भी संयुक्त बयान

माना जा रहा है कि दोनों पक्षों हिंद-प्रशांत क्षेत्र को लेकर भी संयुक्त घोषणा में चीन को अहम संकेत दे सकते हैं। पिछले वर्ष की बैठक के बाद जारी संयुक्त बयान में इस मुद्दे को खासा स्थान दिया गया था। इसमें कहा गया था कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र व इसके बाहर शांति व संपन्नता के लिए भारत व अमेरिका के बीच करीबी सहयोग बेहद जरूरी है। इसके अलावा अगले महीने जापान-अमेरिका-भारत-ऑस्ट्रेलिया की नौ सेनाओं के बीच होने वाले सैन्य अभ्यास से जु़ड़े कुछ मुद्दों पर भी बात होगी। पिछली बार हिंद--प्रशांत व दक्षिण एशिया में कनेक्टिविटी परियोजनाओं को आगे ब़़ढाने की सहमति बनी थी।

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