नई दिल्‍ली जागरण स्‍पेशल। नए साल की खुमारी अभी लोगों के सिर से उतरी नहीं है। 31 दिसंबर को देर रात तक दुनिया के कई शहरों में नए साल का जश्‍न मनाया गया। डांस, म्‍यूजिक और मस्‍ती के साथ-साथ रंग-बिरंगी आतिशबाजी ने इस जश्‍न की रंगत को कई गुणा बढ़ा दिया था। आखिर ये जश्‍न होता भी क्‍यों नहीं, 1 जनवरी से लोगों के लिए नया साल जो था। लेकिन क्‍या कभी आपने सोचा है कि आखिर कब से और क्‍यों 1 जनवरी का ही दिन नए साल के लिए क्‍यों तय हुआ। इसके पीछे की वजह क्‍या थी। यह कुछ ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब बहुत लोगों के पास नहीं है। आपको जानकर हैरानी होगी कि जिस नव वर्ष का स्‍वागत हम 1 जनवरी से करते हैं वो कभी 25 मार्च और 25 दिसंबर को हुआ करता था। ऐसा करीब 500 वर्ष पहले होता था।   

45 ईसा पूर्व नए साल की तारीख को बदल दिया गया। इसके पीछे रोमन राजा नूमा पोंपिलुस का दिमाग था। उन्‍होंने पृथ्वी और सूर्य की गणना के आधार पर एक केलेंडर जारी किया था। उनका यह केलेंडर आज के केलेंडर से अलग था। इसमें एक वर्ष दस माह का था और साल के दिनों की संख्‍या भी 310 थी। इतना ही नहीं इस केलेंडर में एक सप्‍ताह आठ दिनों का होता था। नूमा ने मार्च की जगह साल की शुरुआत जनवरी से की थी जो रोमन देवता जैनुस के नाम पर था। जैनुस दो मुंह वाले रोमन के देवता थे। रोमन साम्राज्‍य में मार्च का महीना मार्स देवता के नाम पर था। लेकिन क्‍योंकि मार्स युद्ध के देवता थे इसलिए नूमा ने साल की शुरुआत युद्ध से न कर जैनुस या जनवरी से की थी। हालांकि 153 ईसा पूर्व तक 1 जनवरी को आधिकारिक रूप से नए साल का पहला दिन घोषित नहीं किया गया।

45 ईसा पूर्व रोम के शासक जूलियस सीजर ने एक नया कैलेंडर जारी किया। इस केलेंडर का भी आधार सूर्य और पृथ्‍वी की गणना था।  इस कैलेंडर का नाम जूलियन केलेंडर था। इस केलेंडर में 12 माह थे। सीजर के ही खगोलविदों ने अपनी गणना में पाया था कि पृथ्‍वी सूर्य की परिक्रमा करने में 365 दिन और छह घंटे लेती है। इसी गणना के मद्देनजर सीजर ने दिनों की संख्‍या को 310 से बढ़ाकर 365 कर दिया था। सीजर ने ही हर चार साल बाद फरवरी के महीने को 29 दिनों का किया था, जिसको हम लीप ईयर कहते हैं। इसके बाद जब जूलियस सीजर की हत्‍या हुई तो उनके सम्‍मान में साल के सातवें माह को क्विनटिलिस का नाम दिया गया जिसको जुलाई कहा जाता है। इसी तरह से आठवें महीने को सेक्सटिलिस या अगस्‍त का नाम दिया गया था। सीजर के शासन काल में जहां तक भी उसकी हुकूमत थी वहां पर साल की शुरुआत 1 जनवरी से हो गई थी। 

5वी शताब्दी तक रोमन साम्राज्य बेहद सीमित हो चुका था। इसके पतन के साथ-साथ ईसाई धर्म का प्रचार-प्रसार खूब हुआ। ये लोग अपने नए साल की शुरुआत दोबारा 25 मार्च या 25 दिसंबर से ही करना चाहते थे। 25 दिसंबर को नए साल की शुरुआत करने के पीछे ईसा मसीह का जन्म था, जो इसी दिन पैदा हुए थे। वहीं कुछ 25 मार्च को नए साल की शुरुआत के रूप में मनाना चाहते थे।  

आठवीं शताब्दी में सेंट बीड नाम के एक धर्माचार्य ने जूलियन केलेंडर में खामी बताई और कहा कि पृथ्‍वी सूर्य की परिक्रमा 365 दिन 5 घंटे 48 मिनट 46 सेकंड में करती है।  रोजर बीकन ने 13वीं शताब्दी में इस थ्योरी को स्थापित भी किया। लेकिन इसमें भी एक परेशानी थी। जूलियन केलेंडर गणना के हिसाब से हर 400 वर्षों में वर्ष 3 दिन पीछे हो रहा था। ऐसे में 16वीं सदी आते-आते समय लगभग 10 दिन पीछे हो चुका था। इस गड़बड़ी को सही करने के लिए  1580 के दशक में रोमन चर्च के पोप ग्रेगरी 13वें ने इस पर काम किया। इसमें उनका सहयोग ज्योतिषी एलाय सियस लिलियस ने दिया। इन्‍होंने गणना के लिए 325 ईस्वी में हुए नाइस धर्म सम्मेलन के समय की गणना को आधार बनाया था। इससे पता चला कि 1582 और 325 में 10 दिन का अंतर आ चुका था। इसको सही करने के लिए इन्‍होंने साल में 10 दिन बढ़ा दिए और 5 अक्टूबर से सीधे 15 अक्टूबर की तारीख रख दी गई थी। इसकी गणना के हिसाब से 

केलेंडर बना उसको 1582 में इटली, फ्रांस, स्पेन और पुर्तगाल ने अपनाया। 1972 तक इसी केलेंडर को जर्मनी, स्विट्जरलैंड, हॉलैंड, पोलैंड , हंगरी, डेनमार्क, ब्रिटिश साम्राज्य, रूस, जापान अपना लिया था। जहां तक भारत की बात है तो ब्रिटिश औपनिवेश होने की वजह से 1752 में भारत ने भी इसी केलेंडर को अपना लिया था। हालांकि इसके बाद आज भी कई राज्‍यों का अपना केलेंडर भी है, जिसपर वह जश्‍न मनाते हैं। जैसे केरल और तमिलनाडु में नए वर्ष की शुरुआत विषु के साथ होती है। वहीं मराठी गुडी पड़वा पर नए साल की शुरुआत मानते हैं। इसके अलावा गुजराती दीवाली पर नया साल मनाते हैं। हिंदू कैलेंडर में चैत्र महीने की पहली तारीख यानि चैत्र प्रतिपदा को नया साल मनाया जाता है। 

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Edited By: Kamal Verma