नई दिल्ली, ऑनलाइन डेस्क/एजेंसियां। केंद्र सरकार ने जम्मू और कश्मीर राज्य का विशेष दर्जा खत्म कर दिया साथ ही अनुच्छेद 35ए और अनुच्छेद 370 को भी खत्म कर दिया। इनको खत्म किए जाने के बाद सरकार ने अपनी नीतियों को सख्त करके इसका पालन कराया, जिन नेताओं के इसके विरोध में खड़े होने की उम्मीद थी उनको नजरबंद कर दिया गया। साथ ही नेताओं से सहयोग की अपील की गई। अब स्थितियां सामान्य हो गई हैं, नेताओं को आने-जाने की छुट मिल गई है, वो बैठकें कर रहे हैं। कुछ दिन पहले एक बार फिर कश्मीर में नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी की बैठक हुई जिसमें एक बार फिर इस मुद्दे को उठाने की रणनीति बनाई गई है।

क्या है "गुपकार" गठबंधन 

कश्मीर ने गुपकार गठबंधन को अभूतपूर्व गठबंधन बताया जाता है। दरअसल यहां की 6 प्रमुख पार्टियों ने मिलकर अगस्त 2019 में एक मुहिम तैयार की थी, इसमें सभी का सहयोग भी होना था। उस समय जब इस अभियान की घोषणा की गई थी तब इसका लक्ष्य पूर्ववर्ती जम्मू और कश्मीर राज्य के विशेष दर्जे और अनुच्छेद 35 ए और अनुच्छेद 370 को बचाना और राज्य के विभाजन को रोकना था।  

एक बात ये भी हुई कि जिस दिन इन दलों ने गुपकार गठबंधन की घोषणा की उसके अगले ही दिन सरकार ने अपनी घोषणा कर दी। इसके बाद भी अब इन पार्टियों ने अपनी 2019 की गुपकार घोषणा को बरकरार रखा है और इस गठबंधन को नाम दिया है "पीपल्स अलायंस फॉर गुपकार डेक्लेरेशन." एनसी और पीडीपी के अलावा इसमें सीपीआई(एम), पीपल्स कांफ्रेंस (पीसी), जेकेपीएम और एएनसी शामिल हैं।

अभियान की घोषणा करते हुए जम्मू और कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला ने कहा कि हमारी लड़ाई एक संवैधानिक लड़ाई है, हम चाहते हैं कि भारत सरकार जम्मू और कश्मीर के लोगों को उनके वो अधिकार वापस लौटा दे जो उनके पास पांच अगस्त 2019 से पहले थे। अब्दुल्ला ने यह भी कहा कि जम्मू, कश्मीर और लद्दाख से जो छीन लिया गया था हम उसे फिर से लौटाए जाने के लिए संघर्ष करेंगे। 2019 की 'गुपकार घोषणा' वाली बैठक की तरह यह बैठक भी अब्दुल्ला के श्रीनगर के गुपकार इलाके में उनके घर पर हुई। 

क्यों रखा गया गुपकार नाम  

जम्मू और कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला श्रीनगर के गुपकार इलाके में रहते हैं। उन्होंने ही प्रमुख रूप से इस तरह का एक गठबंधन बनाने की बात सभी दलों के सामने रखी, उसके बाद सभी दल तैयार हुए, फिर ये बात हुई कि ऐसी मीटिंग कहां रखी जाए तब उसके लिए भी अब्दुल्ला ने अपना घर पर रखने का सुझाव दिया। अब चूंकि सभी दलों को एक साथ लाने और साझा मीटिंग करने का सुझाव अब्दुल्ला के श्रीनगर के गुपकार इलाके में तय किया गया इस वजह से इस मीटिंग का नाम ही गुपकार मीटिंग पड़ गया, तभी से इसे गुपकार मीटिंग या गठबंधन के नाम से जाना जाता है। 

एक साल में हो गई बड़े बदलाव 

इस एक साल में जम्मू और कश्मीर में जो बदलाव आए हैं वो प्रशासनिक तौर पर पूरी तरह से लागू हो चुके हैं। ऐसे में अब यह किसी तरह से संभव नहीं लगता कि ये राजनीतिक पार्टियां किसी भी तरह से पुरानी व्यवस्था को बहाल कर पाएंगी। एक बात ये भी कही जा रही है कि इऩ पार्टियों की मीटिंग तो हो गई मगर इसमें किसी तरह की कार्य योजना के बारे में नहीं तय किया जा सका।

जनता से ये भी नहीं कहा गया कि वो किस तरह की योजना के साथ जम्मू कश्मीर के विशेष दर्जे को वापस दिलाने के लिए केंद्र सरकार से बात करेंगी। एक बात ये जरूर निकलकर सामने आई है कि इन पार्टियों के नेता अंदरूनी तौर पर अब जम्मू कश्मीर और लद्दाख इलाकों में जनता के बीच जाकर उनसे संवाद स्थापित करके उनकी राय जरूर जानना चाह रहे हैं जिससे वो अपनी रणनीति में इनकी भागीदारी सुनिश्चित कर सकें। 

टिकेगा नहीं मगर राजनीति का देगा मौका 

एक बात ये भी कही जा रही है कि इस अभियान के तहत ये राजनीतिक दल एक साथ आएंगे और एक लक्ष्य के लिए अपने मतभेदों को भूलाकर एक साथ काम करेंगे मगर ये भी तय मना जा रहा है कि ये अभियान अधिक समय तक टिकेगा नहीं, मगर राजनीतिक दलों को एक साथ आने का मौका जरूर देगा। इससे ये बात भी पता चल जाएगी कि भविष्य में ये दल किस तरह से गठबंधन बनाकर काम कर सकेंगे।  

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