नई दिल्ली सुधीर कुमार। हाल में संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी वैश्विक खुशहाली सूचकांक-2021 में फिनलैंड को लगातार चौथी बार पहला स्थान प्राप्त हुआ है। 149 देशों के सूचकांक में भारत एक रैंक के सुधार के साथ 139वें पायदान पर है। खुशहाली सूचकांक में किसी राष्ट्र की जीवन-प्रत्याशा, प्रति व्यक्ति जीडीपी, लोक विश्वास से जुड़े विषय जैसे वहां की सरकार भ्रष्टाचार मुक्त है या नहीं, वहां का व्यापार कैसा है तथा विभिन्न सामाजिक कारक शामिल किए जाते हैं। कोरोना ने पूरी दुनिया में परेशानी बिखेरने का काम किया है। बावजूद इसके भारत पिछले साल की तुलना में इस साल के सूचकांक में एक पायदान ऊपर चढ़ा है। यह अच्छी बात है।

मौटे तौर पर दखें तो इस सूचकांक में भौगोलिक रूप से छोटे तथा लघु अर्थव्यवस्था वाले देश ज्यादा खुशहाल नजर आ रहे हैं। अमेरिका, चीन, जापान और भारत जैसी मजबूत अर्थव्यवस्था वाले देश शीर्ष दस खुशहाल राष्ट्रों में अपना स्थान बना पाने में असफल रहे हैं। आज जब विश्व के अधिकांश देश आर्थिक प्रगति को ही देश के विकास का प्रमुख आधार मान रहे हैं, तब फिनलैंड, डेनमार्क, स्विट्जरलैंड, स्वीडन, नार्वे जैसे देशों ने विश्व समाज को विकास की परंपरागत परिभाषा को बदलने का संदेश भी दिया है। आर्थिक उन्नति को ही देश के विकास का एकमात्र पैमाना नहीं मानना चाहिए। नागरिकों की प्रसन्नता को ही सरकार की असली उपलब्धि समझा जाए। यही खुशहाली सूचकांक का मूल है।

आजादी के बाद भारत को एक कमजोर अर्थव्यवस्था विरासत में मिली, लेकिन उदारीकरण के बाद भारत में आर्थिक संपन्नता बढ़ी है। मुक्त व्यापार की नीति अपनाकर भारतीय अर्थव्यवस्था को विश्व के अनेक देशों के समक्ष पूर्णरूपेण खोल दिए जाने से हमारी अर्थव्यवस्था का आकार भी दिन-ब-दिन बढ़ा है। हालांकि विडंबना है कि आज आर्थिक उपलब्धियां हासिल करने की लोगों में होड़ लगी है, लेकिन कहीं न कहीं हमारी यही महत्वाकांक्षा अंततोगत्वा दुखों को आमंत्रण भी दे रही है। हम दिन-रात यही सोचते हैं कि अधिक-से-अधिक धनार्जन कैसे किया जाए? लेकिन यह सोचते-सोचते हम कब अपने परिवार और समाज से दूर चले जाते हैं, इसका हमें ध्यान ही नहीं रहता!

भले ही हालचाल पूछने के क्रम में हम सामने वाले व्यक्ति को बड़ी आसानी से ‘सब बढ़िया है’ कह देते हैं, लेकिन इसके साथ ही हम अपने गम और दुखों को सरलता से बनावटी मुस्कान के साथ छुपा भी लिया करते हैं। देश में बीमारियों के बढ़ने का कारण भी लोगों का खुश न होना है। छोटी-छोटी बातों पर लोगों को लड़ते देखा जा सकता है। लोग कुंठित हो रहे हैं। मानवीय इच्छाओं का गुलाम होने से हमें बचना होगा। खुशियां हमारे आस-पास ही मौजूद होती हैं। ध्यान रहे, जिंदगी की आपाधापी में उसे खोजने का क्रम कहीं टूट न जाए!

(लेखक बीएचयू में अध्येता हैं)

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