नई दिल्ली [जागरण स्पेशल]। भारतीय राजनीति में आज का दिन बेहद खास है। दरअसल 44 साल पहले आज ही के दिन इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी के खिलाफ एक ऐसा फैसला सुनाया था, जो देश में आपातकाल की वजह बन गया। इस तरह से आज की तारीख ने भारतीय राजनीति की दिशा बदलकर रख दी थी।

12 जून 1975, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उस वक्त के संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार राजनारायण की याचिका पर इंदिरा गांधी के खिलाफ एक अहम फैसला सुनाया था। वह वर्ष 1971 के चुनाव में रायबरेली सीट से इंदिरा गांधी के खिलाफ चुनाव लड़े थे। इस चुनाव में वे हार गए थे। हालांकि, उन्हें चुनाव में अपनी जीत का इतना भरोसा था कि नतीजे घोषित होने से पहले ही उनके समर्थकों ने जश्न मनाना शुरू कर दिया था। नतीजे उनके खिलाफ आए। नतीजों में वह चुनाव हार गए और इंदिरा गांधी को विजयी घोषित किया गया था।

इस चुनावी नतीजे के खिलाफ राजनारायण ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की। करीब पांच साल तक चले इस मुकदमे के बाद 12 जून 1975 को हाईकोर्ट ने राजनारायण के पक्ष में फैसला सुनाया और इंदिरा गांधी की कुर्सी को हिलाकर रख दिया। ये पहला मौका था जब किसी हाईकोर्ट ने मौजूदा प्रधानमंत्री के खिलाफ फैसला सुनाया था। हाईकोर्ट के जज जगमोहन लाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी को चुनावों में धांधली करने का दोषी पाते हुए उनके रायबरेली से सांसद के रूप में चुनाव को अवैध घोषित कर दिया।

हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी की जीत को अवैध करार दिया
इतना ही नहीं हाईकोर्ट ने अगले छह साल तक इंदिरा गांधी के किसी भी तरह का चुनाव लड़ने पर भी प्रतिबंध लगा दिया था। ऐसे में इंदिरा गांधी राज्यसभा भी नहीं जा सकती थीं। लिहाजा, उनके पास प्रधानमंत्री पद छोड़ने के सिवाय कोई और रास्ता नहीं बचा था। इस फैसले के 13 दिन बाद ही इंदिरा गांधी ने 25 जून 1975 की मध्य रात्रि से देश में आपातकाल लागू कर दिया था। जानकारों के अनुसार, देश में आपातकाल लागू होने की मुख्य वजह हाईकोर्ट का ये फैसला ही था। आपातकाल के जरिए इंदिरा गांधी ने सभी विपक्षी नेताओं को जेल में ढूंस दिया। इसमें हाईकोर्ट से केस जीतने वाले राजनारायण भी शामिल थे।

जब रायबरेली से हारी थीं इंदिरा गांधी
इसके बाद 23 जनवरी 1977 को इंदिरा गांधी ने आम चुनाव की घोषणा करने के साथ राजनीतिक बंदियों को रिहा करने का आदेश दिया था। दो दिन बाद राजनारायण को भी हिसार जेल से छोड़ दिया गया था। जेल से छूटते ही वह इंदिरा गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ने के लिए रायबरेली पहुंच गए थे। इस चुनाव में उन्होंने एक बड़े राजनीतिक परिवर्तन की शुरुआत की। उन्होंने इंदिरा गांधी और कांग्रेस का गढ़ माने जाने वाली रायबरेली लोकसभा सीट पर इंदिरा गांधी को 55202 मतों से हरा दिया था।

संजय गांधी ने इंदिरा को दिया था ये सुझाव
कोर्ट के आदेश के बाद कांग्रेस पार्टी में इंदिरा के विकल्प को लेकर काफी चर्चा हुई। कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष डीके बरुआ ने उस वक्त इंदिरा गांधी को सुझाव दिया था कि वह (इंदिरा गांधी) पार्टी अध्यक्ष बन जाएं और वह (डीके बरुआ) प्रधानमंत्री बन जाएंगे। बताया जाता है कि जिस वक्त प्रधानमंत्री आवास पर इन मुद्दों को लेकर बैठक चल रही थी, वहां इंदिरा के पुत्र संजय गांधी पहुंच गए। वह अपनी मां को किनारे ले जाकर कुछ बात करने लगे। माना जाता है कि संजय गांधी ने ही इंदिरा को इस्तीफा न देने और पार्टी में किसी पर विश्वास न करने की सलाह दी थी।

सुप्रीम कोर्ट से भी इंदिरा गांधी को नहीं मिली थी राहत
इंदिरा गांधी उनके तर्कों से सहमत हो गईं। उन्होंने इस्तीफा देने की जगह हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का निर्णय लिया। हाईकोर्ट के फैसले के 11 दिन बाद 23 जून 1975 को इंदिरा गांधी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट याचिका दायर कर हाईकोर्ट के फैसले पर पूरी तरह से रोक लगाने की मांग की। सुप्रीम कोर्ट के अवकाश पीठ जज जस्टिस वीआर कृष्णा अय्यर ने अगले दिन (24 जून 1975) याचिका पर सुनवाई करते हुए फैसला सुनाया। उन्होंने अपने फैसले में कहा कि वे इस फैसले पर पूरी तरह से रोक नहीं लगाएंगे। सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें प्रधानमंत्री बने रहने की अनुमति दे दी, लेकिन कहा कि वे अंतिम फैसला आने तक सांसद के रूप में मतदान नहीं कर सकतीं। सुप्रीम कोर्ट ने बतौर सांसद इंदिरा गांधी के वेतन और भत्ते लेने पर भी रोक को जारी रखा था।

25 जून को दिल्ली में जेपी की रैली
एक तरफ इंदिरा गांधी कोर्ट में लड़ रहीं थी, दूसरी तरफ विपक्ष उन्हें घेरने में जुटा हुआ था। गुजरात और बिहार में छात्रों के आंदोलन के बाद देश का विपक्ष कांग्रेस के खिलाफ एकजुट हो चुका था। लोकनायक कहे जाने वाले जयप्रकाश नारायण (जेपी) पूरी विपक्ष की अगुआई कर रहे थे। वह लगातार बिहार और केंद्र की कांग्रेस सरकार पर हमलावर थे। कोर्ट के फैसले ने विपक्ष को केंद्र सरकार और इंदिरा गांधी पर हमला करने का और मौका दे दिया। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अगले दिन, 25 जून 1975 को दिल्ली के रामलीला मैदान में जेपी ने एक रैली की। जेपी ने इंदिरा गांधी को स्वार्थी और महात्मा गांधी के आदर्शों से भटका हुआ बताते हुए उनका इस्तीफा मांगा। इसी रैली में जेपी ने रामधारी सिंह दिनकर की एक कविता के अंश ‘सिंघासन खाली करो कि जनता आती है’ को नारे के तौर पर इस्तेमाल किया, जो काफी प्रसिद्ध रहा। उन्होंने सेना और पुलिस का आह्वान करते हुए कहा था कि अब समय आ गया कि वह सरकार से असहयोग करें।

आपातकाल में जेपी के बयान को बनाया आधार
इंदिरा गांधी ने 26 जून 1975 की सुबह राष्ट्र के नाम संदेश दिया। इसमें उन्होंने कहा, ‘आपातकाल जरूरी हो गया था, एक जना सेना को विद्रोह के लिए भड़का रहा है। इसलिए देश की एकता और अखंडता के लिए ये फैसला लेना जरूरी हो गया था।’ साफ है कि इंदिरा गांधी ने आपातकाल के लिए विपक्ष के नेता जेपी के बयान को आधार बनाया था।

अपने खिलाफ साजिश बता विरोधियों को भेजा था जेल
25 जून 1977 की रात आपातकाल लागू करने के बाद इंदिरा गांधी ने देश के नाम दिए संदेश में पूरे प्रकरण को अपने खिलाफ साजिश बताया था। अपने संदेश में उन्‍होंने कहा था कि जब से मैंने आम आदमी और देश की महिलाओं के फायदे के लिए कुछ प्रगतिशील कदम उठाए हैं, तभी से मेरे खिलाफ गहरी साजिश रची जा रही है। आपातकाल लागू होने के बाद, इंदिरा गांधी ने अपने तमाम विरोधियों को जेल में डलवा दिया था। इनमें जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी, जार्ज फर्नांडिस जैसे उस दौर के कई बड़े नेता भी शामिल रहे थे।

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Posted By: Amit Singh