नई दिल्‍ली (ऑनलाइन डेस्‍क)। ईरान ने अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जी एजेंसी को एक समझौते के तहत उसके परमाणु कार्यक्रम तक सीमित पहुंच की इजाजत दे दी है। ईरान का ये फैसला कई मायनों में अहम है। दरअसल, इससे पहले ईरान ने इस अंतरराष्‍ट्रीय एजेंसी के जांचकर्ताओं को सहयोग न करने की घोषणा की थी, जिसके बाद तेहरान और एजेंसी के बीच एक अस्‍थायी समझौता किया हुआ था। ईरान की मौजूदा स्‍वीकृति इसी समझौते का परिणाम है।

आपको यहां पर ये भी बता दें कि ईरान की संसद में पिछले वर्ष के अंत में एक कानून पारित किया था। इसमें कहा गया था कि यदि तत्‍कालीन राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप उनके ऊपर लगे प्रतिबंध नहीं हटाते हैं तो अंतरराष्‍ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसियों के निरीक्षण को आंशिक रूप से स्‍थगित किया जाएगा। इस फैसले को 23 फरवरी से लागू किया जाना था।

विशेषज्ञ मानते हैं कि इसके लागू होने से पहले ही दोनों के बीच एक बिंदु पर सहमति का बनना कहीं न कहीं ईरान की तरफ से भविष्‍य में खटास दूर करने के सकारात्‍मक प्रयास हो सकते हैं। ईरान ने कहा है कि एजेंसी के जांचकर्ताओं की संख्‍या में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा। एजेंसी की जांच तीन माह तक चलेगी।

इससे पहले अगस्‍त 2020 में भी ईरान ने अपने यहां दो संदिग्ध परमाणु ठिकानों के निरीक्षण की इजाजत इस अंतरराष्‍ट्रीय एजेंसी को दी थी। उस वक्‍त ईरान का कहना था कि उसके पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है इसलिए ऐसा करने में उसको कोई हिचक नहीं है। वर्तमान में जो समझौता हुआ है उसके बाबत एजेंसी के महानिदेशक रफाएल मारियानो ग्रॉस्सी का कहना है कि दोनों के बीच बनी सहमति की लगातार समीक्षा होती रहेगी। यदि एजेंसी इसको स्‍थगित करना चाहेगी तो वो ऐसा कर सकेगी।

गौरतलब है कि ईरान को लेकर अंतरराष्‍ट्रीय जगत में हमेशा ही उठापठक होती रही है। ऐसा भी नहीं है कि इस बार जिस तरह की इजाजत ईरान ने दी है वैसे पहले नहीं दी गई। इसके बाद भी ये फैसला ईरान को उस परमाणु संधि की तरफ ले जा सकता है जो उसकी और अमेरिका के बीच हुई थी। इसमें संयुक्‍त राष्‍ट्र सुरक्षा परिषद के स्‍थायी सदस्‍य भी शामिल हुए थे।

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एके पाशा का मानना है कि दोनों देशों के बीच संधि दोबारा होने की उम्‍मीद काफी है। उनका ये भी कहना है कि ईरान हमेशा से ही इस पूरे क्षेत्र में दबदबा बनाने की कोशिश करता रहा है। उसका परमाणु कार्यक्रम भी इसका ही नतीजा है। लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों की वजह से उसको कई तरह की समस्‍याओं से जूझना पड़ रहा है। अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर अपने परमाणु कार्यक्रमों में वो लचीला रुख अपनाकर इनसे कुछ हद तक निजाद पा सकता है।

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