नई दिल्‍ली (ऑनलाइन डेस्‍क)। जापान में सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहे शिंजो अबे ने अपनी बीमारी की वजह इस्‍तीफा दे दिया है। इसका एलान उन्‍होंने पहले ही कर दिया था। अब वहां पर दूसरा पीएम चुना जाएगा। क्‍या आपको शिंजो जिस बीमारी से काफी समय से जूझ रहे थे वो कौन सी है। यदि नहीं तो हम आपको उसके बारे में बता देते हैं। दरअसल, वो अल्सरेटिव कोलाइटिस से पीडि़त हैं। ये बीमारी आंतों में सूजन से जुड़ी है, जिसको अंग्रेजी में आईबीडी (Inflammatory bowel disease symptoms) कहते हैं।

अल्सरेटिव कोलाइटिस में बड़ी आंत की अंदरूनी परत में सूजन और जलन होने लगती है से कई छोटे-छोटे छाले बनने लगते है। इनमें सूजन के कारण पेट-संबंधी परेशानियां होने लगती है जोकि पाचन तंत्र पर बुरा असर डालती है। सही समय पर इलाज न कराने पर खतरे का कारण भी बन सकती है। इस बीमारी में शरीर का प्रतिरक्षी तंत्र (immune system) असाधारण रूप से काम करने लगता है। बाहरी कीटाणुओं की बजाय वह बड़ी आंत के ऊपर ही आक्रमण करने लगता है जिससे बड़ी आंत में सूजन और जलन हो जाती है। अल्सरेटिव कोलाइटिस क्रोन या क्रोंस की बीमारी के ही समान होती है। इस बीमारी का उपचार ऑटोइम्यून बीमारी के तौर पर किया जाता है। इसमें देखा जाता है कि आखिर बड़ी आंत में आई ये सूजन कितनी है और इसे आंत कितनी प्रभावित है।

पेट में दर्द का होना, बलगम के साथ खूनी दस्त होना, थकान और कमजोरी, भूख न लगना और लगातार वजन का कम होना, एनीमिया (सांस में परेशानी, अनियमित दिल की धड़कन, थकान एवं पीली त्वचा), ज्‍यादा तेज बुखार, टेनेसमस इस बीमारी के प्रमुख लक्षणों में गिने जाते हैं।

यह रोग ऑटोइम्यून विकारों के साथ जुड़ा है, जिसमें आनुवांशिक और पर्यावरणीय कारण भी शामिल हैं। आनुवंशिक कारक अल्सरेटिव कोलाइटिस के विकास के साथ जुड़े हैं,। वहीं पर्यावरणीय कारणों में वायु प्रदुषण शामिल हैं।

इस बीमीरी से से पीडि़त व्‍यक्ति की डॉक्‍टर से सलाह लेनी चाहिए। इसमें अधिक मात्रा में कार्बोहाइड्रेट और वसा से युक्त आहार का सेवन अच्‍छा माना जाता है। इसके अलावा आसपास साफ सफाई रहने से भी शरीर में खुद इस बीमारी के प्रति एंटीबॉडीज बनने लगती हैं।

जहां तक अल्सरेटिव कोलाइटिस के निदान की बात है तो ये विभिन्न प्रकार के परीक्षणों के बाद तय किया जाता है। इसके तहत सिग्मोओडोस्कोपी टेस्‍ट करना होता है। इसमें निदान के लिए आंत में सूजन के स्तर एवं विस्तारण का टेस्‍ट किया जाता है। इसमें एक छोटे पाइप के आगे कैमरा होता है जिसको मलाशय में डालकर सूजन का पता लगाया जाता है। इसके अलावा कोलनोस्कोपी से भी इसकी टेस्टिंग होती हैं। ये एक लंबी एवं अधिक लचीली ट्यूब होती है, जिसे कॉलोस्कोस्को कहा जाता है, जिससे पूरे कोलन की जांच की जा सकती है।

ये भी पढ़ें:-

10 माह तक सही नाजियों की यातना, फिर भी नहीं किया कोई खुलासा, ऐसी थी बहादुर 'नूर' 
जानें हर्ड इम्‍यूनिटी और वैक्‍सीन पर क्‍या कहती हैं WHO की चीफ साइंटिस्‍ट डॉक्‍टर सौम्‍या     

जीतेगा भारत हारेगा कोरोन

डाउनलोड करें जागरण एप और न्यूज़ जगत की सभी खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस