नई दिल्‍ली [जागरण स्‍पेशल]। लद्दाख में 45 मीटर ऊंचे टेलिस्‍कोप को स्‍थापित करने के बाद अंतरिक्ष और इससे जुड़ी दिलचस्‍प घटनाओं को करीब से जानने में काफी मदद मिलेगी। यह टेलिस्‍कोप लेह से करीब 200 किमी दूर हानले में स्‍थापित किया गया है। इंडियन एस्‍ट्रोनॉमिकल ऑब्‍जरवेटरी, हानले में यह टेलिस्‍कोप स्‍थापित किया गया है। अंतरिक्ष में रूचि रखने वालों के लिए हानले पहले से ही खास जगह रहा है। दरअसल, यहां पर भारत ने 2018 में पहला रोबोटिक टेलिस्‍कोप स्‍थापित किया गया था। करीब 19 हजार मीटर की ऊंचाई पर स्थित लद्दाख अंतरिक्ष के जानकारों के लिए इसलिए भी खास है क्‍योंकि यहां से अंतरिक्ष के जो नजारे दिखाई देते हैं वहां आमतौर पर देश के दूसरे भागों से नहीं दिखाई देते हैं। 

खास है हानले

हानले इस लिहाज से भी खास है क्‍योंकि यहां पर अंतरिक्ष में होने वाले ट्रांसिएंट इवेंट को ऑब्‍जर्व किया जा सकता है। ट्रांसिएंट इवेंट अंतरिक्ष में होने वाली वह छोटी लेकिन अहम घटना होती है जिसमें कुछ पल के लिए ऊर्जा का शॉर्ट लाइव बर्स्‍ट होता है। अंतरिक्ष पर नजर रखने वालों के लिए यह घटना बेहद खास होती है। इस टेलिस्‍कोप पर करीब 3.5 करोड़ रुपये का खर्च आया था जिसमें बेंगलुरू का इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ एस्‍ट्रॉफिजिक्‍स, आईआईटी मुंबई शामिल था। वर्तमान में जो टेलिस्‍कोप स्‍थापित किया गया है उसको भाभा परमाणु अंसुधान केंद्र (बीएआरसी) में तैयार किया गया है। इसके डिजाइन को बीएआरसी के साथ मिलकर तीन अन्य एजेंसियों ने तैयार किया है।

चीन का विशालकाय टेलिस्‍कोप 

आपको बता दें कि कुछ समय पहले ही चीन ने दक्षिण-पश्चिम में स्थित गुइझोऊ प्रांत में टेलिस्‍कोप स्‍थापित किया है जो दुनिया का सबसे बड़ा फाइल्‍ड रेडियो टेलिस्‍कोप (filled radio telescope) है। इसके अलावा यह दुनिया का दूसरे नंबर का सिंगल एपरेचर टेलिस्‍कोप भी है। इसका नाम फास्‍ट- फाइव हंड्रेड मीटर एपरेचर स्‍फेरिकल रेडियो टेलिस्‍कोप (FAST- Five-hundred-meter Aperture Spherical Radio Telescope) है। यह अब तक करीब 44 तेजी से घूमने वाला न्यूट्रॉन या तारों की खोज कर चुका है जिन्‍हें पल्‍सर कहा जाता है। पल्‍‍‍‍सर रेडियो वेव इलेक्‍ट्रोमेग्‍नेटिक रेडिएशन उत्सर्जित करता है। इस टेलिस्‍कोप का आकार 30 फुटबॉल ग्राउंड के बराबर है। इसको बनने में करीब 5 वर्ष का समय लगा था।  

स्‍पेन में लगा टेलिस्‍कोप

अंतरिक्ष की बात चली है तो आपको यहां पर ये भी बता दें कि दुनिया के कई देशों में विशालकाय टेलिस्‍कोप लगे हुए हैं जो अंतरिक्ष में हुई छोटी घटना को भी ऑब्‍जर्व कर लेते हैं। इसी फहरिस्‍त में स्‍पेन में लगा दुनिया के सबसे बड़े टेलिस्‍कोप में से एक ग्रान टेलिस्‍कोपियो केनारियाज है। यह स्‍पेन के केनरी आइसलैंड पर स्‍थापित किया गया है। इसको डिजाइन और डेवलेप करने में करीब एक हजार लोगों और सौ कंपनियों का योगदान रहा है। इसको बनकर तैयार होने में दस साल लगे थे। 24 जुलाई 2009 को इसका आधिकारिक तौर पर उदघाटन किया गया था।  

स्‍पेन का केक-1 और केक-2

स्‍पेन के बाद इस लिस्‍ट में अमेरिका में हवाई के मोना की स्थित केक-1 और केक-2 का आता है। इसकी शुरुआत 1993 और 1996 में हुई थी। यह दोनों ही करबी 33 फीट चौड़े हैं। इसके डिजाइन को तैयार करने की शुरुआत 1977 में अमेरिका में दो यूनिवर्सिटी ने शुरू की थी। इसके नामकरण को लेकर एक दिलचस्‍प कहानी भी है। दरअसल, इसको बनाने की लागत काफी अधिक थी। इसको देखते हुए हॉवर्ड बी केक ने केक-1 प्रोजेक्‍ट के लिए 70 मिलियन डॉलर का योगदान दिया था। केक 1 की शुरुआत जहां 1985 में हुई थी। केक-2 की शुरुआत भी उनके ही दिए योगदान से हुई थी।  इसमें नासा के अलावा यूनिवर्सिटी ऑफ केलीफॉर्निया और कालटेक शामिल हैं। इसका प्रशासन केलीफॉर्निया एसोसिएशन फॉर रिसर्च इन एस्‍ट्रॉनामी करती है। 

दक्षिण अफ्रीका का साल्‍ट

दक्षिण अफ्रीका के उत्‍तरी कैप में साल्‍ट  (South African Large Telescope) नाम से एक टेलिस्‍कोप लगा हुआ है। यह सदर्न हेमिस्‍फायर में लगा सबसे बड़ा टेलिस्‍कोप है जो करीब 362 इंच चौड़ा है। इसके लिए जर्मनी, पोलैंड, ब्रिटेन, न्‍यूजीलैंड, भारत, दक्षिण अफ्रीका और अमेरिका ने योगदान दिया है। यह नॉर्दन हेमिस्‍फायर की तस्‍वीरों को कैप्‍चर करता है। 

लार्जेस्‍ट बायनाकूलर टेलिस्‍कोप

अमेरिका के एरिजोना में माउंट ग्राहम ऑब्‍जरवेटरी में सबसे बड़ा बायनाकूलर टेलिस्‍कोप लगा हुआ है। 330 इंच  की चौड़ाई वाले इस टेलिस्‍कोप से दूर अंतरिक्ष में झांक सकता है। इस टेलिस्‍कोप को स्‍थापित करने की जगह को लेकर काफी तीखी बहस चली थी। सेन कार्लोस अपाचे ने इसके लिए माउंट ग्राहम को चुना था, जबकि दूसरे लोग इसको कहीं अन्‍य जगह पर स्‍थापित करना चाहते थे। पर्यावरणविद अपाचे के कहीं न कहीं खिलाफ थे। लेकिन विरोध और विवाद के बीच अमेरिकी संसद ने इसके लिए माउंट ग्राहम के नाम पर ही मुहर लगा दी थी। यह एक ज्‍वाइंट प्रोजेक्‍ट था जिसमें इटली के एस्‍ट्रोफिजिक्‍स से जुड़े इंस्टिट्यूट, एरीजोना यूनिवर्सिटी, यूनिवर्सिटी ऑफ नॉर्टे डेम, मिसूरी यूनिवर्सिटी, वर्जीनिया यूनिवर्सिटी, द जर्मन मैक्‍स प्‍लांक इंस्टिट्यूट फॉर एस्‍ट्रोनॉमी शामिल है। 

 

Posted By: Kamal Verma

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