नई दिल्‍ली [जागरण स्‍पेशल]। भारत और पाकिस्‍तान कई बार युद्ध में उलझ चुके हैं। हर बार युद्ध की वजह जम्‍मू कश्‍मीर ही रही है। 1965 में भी इसी मसले पर दोनों देशों में युद्ध हुआ था। 1 सितंबर 1965 को पाकिस्‍तान ने कश्‍मीर पर कब्‍जे के लिए ऑपरेशन ग्रेंड स्‍लेम चलाया था। इसको तत्‍कालीन तानाशाह और राष्‍ट्रपति जनरल अयूब खान की सहमति मिली थी। लेकिन, भारत ने समय रहते सही निर्णय लेते हुए उसकी इस नापाक साजिश को नाकाम कर दिया था।

ये था ऑपरेशन
पाकिस्‍तान की सेना ने ऑपरेशन ग्रेंड स्‍लेम के तहत कश्‍मीर को हथियाने का पूरा खाका तैयार किया था। इसके तहत पाकिस्‍तान सेना को अखनूर ब्रिज पर हमला कर उस पर कब्‍जा करना था। यह पुल भारतीय सेना के लिए किसी लाइफ लाइन की ही तरह था। लेकिन यह पुल बेहद कमजोर भी था। यही वजह थी कि इससे केवल जवानों की पैदल टुकडि़यां तो दूसरीतरफ जा सकती थीं, लेकिन भारी वाहन या टैंक इससे नहीं गुजर सकता था। इससे होकर पाकिस्‍तान सेना आगे बढ़ सकती थी। वहीं पाकिस्‍तान सेना इस पर कब्‍जा कर जम्‍मू को साधना चाहती थी। 

लोगों को भड़काकर साथ मिलाना था पाक आर्मी का मकसद
इस प्‍लान के तहत पाकिस्‍तान आर्मी को कश्‍मीर में दाखिल होकर वहां के लोगों को भारतीय सेना के खिलाफ भड़काना और अपने साथ मिलाना था। पाकिस्‍तान को उम्‍मीद थी कि उसकी यह कोशिश रंग लाएगी और जम्‍मू कश्‍मीर के लोग भारत के खिलाफ जंग का एलान कर देंगे। इस सोच की वजह ये भी थी कि पाकिस्‍तान कच्‍छ के रण में छेड़ी गई लड़ाई मेंअपनी बढ़त बना रहा था।

जबरदस्‍त हमला
यह ऑपरेशन भले ही 1 सितंबर से शुरू हुआ था लेकिन इसकी तैयारियों के तहत पाकिस्‍तान ने अगस्‍त के पहले सप्‍ताह में ही काम करना शुरू कर दिया था। पाकिस्‍तान आर्मी के जवान अलग-अलग टुकडि़यों में थे और भारतीय सीमा में घुसपैठ कर रहे थे। जब तक भारत को पाकिस्‍तान की तरफ से हो रही घुसपैठ की जानकारी हुई तब तक पाकिस्‍तान आर्मी के काफी जवान कश्‍मीर में दा‍खिल हो चुके थे। जानकारी मिलने के बाद भारत ने जम्‍मू कश्‍मीर में अतिरिक्‍त जवानों को भेजा। दूसरी तरफ भारतीय सेना ने जानकारी मिलने के तुरंत बाद पाकिस्‍तान के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। पाकिस्‍तान सेना के ठिकानों पर ताबड़तोड़ हमले किए गए। पाकिस्‍तानआर्मी के जवानों की सप्‍लाई लाइन को खत्‍म करने के मकसद भी कई हमले किए गए।

पाक आर्मी की थी अखनूर पुलपर निगाह
1 सितंबर 1965 को पाकिस्‍तान ने ऑपरेशन ग्रेंड स्‍लेम की शुरुआत सुबह पांच बजे कीथी। इस दौरान जो हमला किया गया वह काफी जबरदस्‍त था। लेकिन भारतीय जवानों ने हौसला नहीं हारा और भारी गोलाबारी के बीच आगे बढ़ने का फैसला लिया गया। भारत की सबसे बड़ी कमजोरी थी कि वह अपने टैंक एएमएक्‍स-13 को आगे नहीं बढा सकता था क्‍योंकि अखनूर का पुल उनके लिहाज से काफी कमजोर था। वहीं दूसरी तरफ मौजूद पाकिस्‍तान के एम-47और एम-48 पेटन टैंक के सामने भारत के टैंक कमजोर साबित हो रहे थे। यही वजह थी कि पाकिस्‍तान के हमले के आगे भारत अभी तक रक्षात्‍मक रवैया अपनाए हुए थे।

याहिया खान को कमान 
पाकिस्‍तान की सेना तय समय पर हमला करने से चूक गई थी। ऐसे मे 12वी इंफेंट्री डिवीजन के मेजर जनरल अख्‍तर हुसैन मलिक की जगह यहां पर याहया खान को तैनात किया गया था। इस ऑपरेशन को अंजाम देने की पूरी जिम्‍मेदारी इनके ही ऊपर थी। लेकिन इस दौरान भारत को वक्‍त मिल गया और भारत की 191 ब्रिगेड ने रातों रात छंब से पीछे हट कर तवी नदी के पूर्व में अखनूर की तरफ पोजीशन ले ली थी। 3 सितंबर को भारत ने पाकिस्‍तान के खिलाफ लड़ाकू विमानों से जबरदस्‍त बमबारी की।

भारत ने खोला दूसरा मोर्चा
भारत को अब तक इस बात का अंदाजा हो चुका था कि पाकिस्‍तान का क्‍या प्‍लान है। 6 सितंबर को भारत ने पाकिस्‍तान के खतरनाक प्‍लान को भांपते हुए युद्ध का एक और मोर्चा पंजाब में खोल दिया था। पाकिस्‍तान को अब इस बात का खतरा लगने लगा था कि भारतीय सेना सीमा पार कर काफी अंदर तक घुस जाएंगी। इस खतरे को भांपते हुए पाकिस्‍तान ने कश्‍मीर से अपनी फौज को समेट लिया और दूसरे मोर्चे पर घिर गया। भारत के इस फैसले ने कश्‍मीर में न सिर्फ पाकिस्‍तान के नापाक इरादे को मिट्टी में मिला दिया था बल्कि पाकिस्‍तान को हर मोर्चे पर करारी हार भी दिलाई थी।

Posted By: Kamal Verma

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