नई दिल्ली, जागरण डेस्क। करतारपुर कॉरिडोर कल (शनिवार) से तीर्थयात्रियों के लिए खोल दिया जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  पैसेंजर टर्मिनल का उद्घाटन करेंगे, लेकिन उससे पहले ही  डेरा बाबा नानक जहां से करतारपुर कॉरिडोर के जरिए गुरुद्वारा साहिब जाने के लिए जिस पैसेंजर टर्मिनल का पीएम मोदी उद्घाटन करने वाले थे वहां बरसात का पानी भर गया है। साथ ही जो कंट्रोल रूम बनाया गया था, उसमें भी पानी भर चुका है। 

कब रखी गई थी नींव 

26 सितंबर 2018 को करतारपुर कॉरिडोर की नींव गुरदासपुर में रखी गई थी। ठीक इसके दो दिन बाद 28 नवंबर को पाकिस्तान ने सीमा के दूसरी तरफ नींव का पत्थर रखा था। हालांकि, कई बार दोनों देशों के बीच इसे लेकर विवाद भी हुए हैं। आगे बढ़ने से पहले आपको सबसे पहले बता देते हैं कि हाल के दिनों में करतारपुर कॉरिडोर को लेकर हाल के दिनों में क्या-क्या नए विवाद हुए हैं जो अभी भी अनसुलझें है।

करतारपुर को लेकर विवाद 

हाल के दिनों में करतारपुर को लेकर काफी विवाद देखने को मिले हैं। करतापुर कॉरिडोर के उद्धाटन से ठीक पहले 7 नवंबर को पाकिस्तान सेना का प्रवक्ता आसिफ गफ्फूर ने कहा था कि भारतीय तीर्थयात्रियों को करतारपुर कॉरिडोर का उपयोग करने के लिए पासपोर्ट की जरुरत होगी। हालांकि, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने इससे पहले कहा था कि भारतीयों तीर्थयात्रियों को महज वैध आईडी की आवश्यकता होगी। 

भारत ने पाकिस्तान को किया आतंकवाद पर सचेत 

हाल ही में पाकिस्तान ने करतारपुर कॉरिडोर के उद्घाटन के लिए एक वीडियो जारी किया था। पाकिस्तान ने इस वीडियो में आतंकवादी जरनैल सिंह भिंडरवाले समेत कई और खालिस्तानी समर्थक आतंकवादियों की तस्वीर शामिल की है। इस वीडियो की वजह से पाकिस्तान का रवैया संदेह पैदा हो रहा है इसलिए ही भारत सरकार ने सभी सुरक्षा एजेंसियों को चौकना रहने के लिए कहा है। 

पहले सर्विस चार्ज हटाया अब दोबारा किया बहाल

पाकिस्तान लगातार अपने वादों से पीछे हट रहा है। पहले पाकिस्तान की ओर से कहा गया था कि वह करतारपुर कॉरिडोर आने वाले श्रद्धालुओं से सर्विस शुल्क नहीं वसूलेगा, लेकिन अब फिर भ्रम पैदा करते हुए एलान किया है कि वह श्रद्धालुओं से 20 डॉलर शुल्क यानी (1420 रुपये) वसूलेगा।

क्यों खास है करतारपुर साहिब

करतारपुर साहिब का इतिहास करीब 500 साल से भी पुराना है। मान्यता है कि 1522 में  सिखों के गुरु नानक देव ने इसकी स्थापना की थी। उन्होंने अपने जीवन के अंतिम वर्ष यहीं बिताए थे। करतारपुर गुरूद्वारा पाकिस्तान के नारोवाल जिले में रावी नदी के पास है। वहीं लाहौर से इसकी दूरी 120 किलोमीटर है। बात करें भारत की तो यह भारत से अंतरराष्ट्रीय सीमा से चार किलोमीटर दूर है। 

पटियाला के महाराजा ने करवाया था पुननिर्माण

रावी नदी में आई बाढ़ के बाद गुरुदवारा को काफी नुकसान हुआ था। पटियाला के महाराजा भूपिंदर सिंह ने 1920 से 1929 के बीच  इसका पुननिर्माण करवाया था। इस समय इसे निर्माण में 1.36 लाख रुपये से ज्यादा खर्चा आया था। 

यहां जानें कब क्या हुआ 

14 अगस्त 1947 में जब भारत का विभाजन हुआ था। तब 1947 में ही  बाउंड्री कमीशन बनाया गया जिसका चैयरमैन नियुक्त किया गया। रेडक्लिफ ने करतारपुर को पाकिस्तान को दे दिया। जिस वक्त देश का विभाजान हो रहा था तब 1941 में गुरदासपुर जिला दो हिस्सों में बंट गया था। तभी गुरुद्वारा करतारपुर साहिब पाकिस्तान के नारोवाल जिले का हिस्सा बन गया। 

1971 में दोनों देशों के बीच युद्ध हुआ तब रावी नदी पर बना पुल जो पाकिस्तान के नारोवाल और भारत के गुरदासपुर को जुड़ता था, वह तबाह हो गया। इसके बाद साल 2000 में पाकिस्तान ने  करतारपुर साहिब के लिए वीजा मुक्त यात्रा करतारपुर साहिब के लिए वीजा मुक्त यात्रा का एलान किया। हालांकि, तब तक इस कॉरिडोर का निर्माण नहीं किया गया था। पहली बार पाकिस्तान ने भारतीय तीर्थयात्रियों के जत्थे को 2001 में करतारपुर साहिब जाने की अनुमति दी थी। 2018-17 अगस्त को प्रधानमंत्री इमरान खान ने जब पाकिस्तान की सत्ता संभाली थी तब पाक सेना के प्रमुख जावेद बाजवा ने नवजोत सिंह सिद्धू से बातचीत की और मार्ग को खोलने की बात कही।  

Posted By: Ayushi Tyagi

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