नई दिल्‍ली (जेएनएन)। वैश्विक दबाव के कारण पाकिस्तान की जेल से रिहा किए गए बाबा जान गुलाम कश्मीर के आम आदमी की दमदार आवाज हैं। बाबा जान की दमदार शख्सियत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उनकी रिहाई के लिए वर्ष 2017 में दुनिया के नौ देशों के 18 सांसदों ने आवाज उठाई थी। ऐसी ही एक अपील पर 49 देशों की 426 हस्तियों ने हस्ताक्षर किए थे। संयुक्त राष्ट्र में भीउनकी गिरफ्तारी का मुद्दा उठा था। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग भी लगातार पाकिस्तान को चेता रहा था।

हुंजा के पानी की कहानी

वर्ष 2010 में हुंजा घाटी में भूस्खलन की वजह से हुंजा नदी का पानी रुक गया था। इससे क्षेत्र में बाढ़ आ गईऔर 23 गांव डूब गए। हजारों लोगों के साथ बाबा जान ने मुआवजे के लिए प्रदर्शन किया। कुछ लोगों को मुआवजा मिला, लेकिन काफी को नहीं मिल पाया। बाबा जान ने फिर आंदोलन शुरू किया। पुलिस व आंदोलनकारियों में संघर्ष हो गया। थाने फूंक दिए गए। इसके बाद बाबा जान को गिरफ्तार कर लिया गया।

90 साल की सजा

पाकिस्तान की अदालत ने देशद्रोह व अन्य आरोपों में बाबा जान को 90 साल की सजा सुनाई थी। हालांकि, गिलगिट बाल्टिस्तान समेत गुलाम कश्मीर में इसके खिलाफ लगातार आंदोलन हो रहे थे। मीडिया सूत्र बताते हैं कि उनकी रिहाई के लिए पाकिस्तानी सरकार महीने भर पहले ही राजी हो गई थी।

उठाया दमन का मुद्दा

बाबा जान ने सरकार व सेना की मिलीभगत से गिलगिट-बाल्टिस्तान समेत गुलाम कश्मीर के लोगों पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ पूरी दुनिया का ध्यान खींचा था। वह आवामी वर्कर्स पार्टी की फेडरल कमेटी के सदस्य हैं और उपाध्यक्ष रह चुके हैं। उनका और उनके समर्थकों का मानना है गिलगिट बाल्टिस्तान समेत गुलाम कश्मीर पाकिस्तान का हिस्सा नहीं है। इसलिए, वहां पाकिस्तान का कानून लागू नहीं होता।

चीनी कंपनी का विरोध

बाबा जान ने गुलाम कश्मीर में चीनी कंपनियों के बढ़ते दखल का भी जोरदार विरोध किया। उन्होंने हुंजा घाटी के नसीराबाद में चीनी कंपनी को अवैध तरीके से संगमरमर खदान के आवंटन का भी विरोध किया। इसके लिए उन पर मुकदमा भी दर्ज हुआ। 

 

Edited By: Kamal Verma