नीलू रंजन, नई दिल्ली। पाकिस्तान के साथ लगती पश्चिमोत्तर सीमा पर सक्रिय तालिबानी आतंकियों के जम्मू-कश्मीर पहुंचने की आशंका सच साबित होने लगी है। खुफिया ब्यूरो की रिपोर्ट ने केरन सेक्टर में बड़े पैमाने पर घुसपैठ करने वाले आतंकियों में कई देशों से आए तालिबान लड़ाके शामिल होने की पुष्टि कर दी है। 26 सितंबर को घुसपैठ करने वाले आतंकियों को खदेड़ने में सेना को 10 दिन लग गए थे। आइबी ने इस घुसपैठ के बारे में दो दिन पहले ही सुरक्षा एजेंसियों को आगाह कर दिया था।

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आइबी के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक आम तौर पर कश्मीर में पाकिस्तानी पंजाब, गुलाम कश्मीर या फिर घाटी के स्थानीय आतंकी ही होते हैं और वे पंजाबी या कश्मीरी में बात करते हैं। लेकिन केरन सेक्टर में घुसपैठ करने वाले आतंकियों की बातचीत जब आइबी अधिकारियों ने सुनी तो उनके होश उड़ गए। ये आतंकी ऐसी भाषा में बात कर रहे थे, जो उनकी समझ से परे थे। बातचीत की भाषा के आधार पर आइबी का निष्कर्ष है कि इन आतंकियों में कुछ इराकी, सीरियाई और अफगानी मूल के हो सकते हैं। बातचीत सुनने के बाद आइबी ने 24 सितंबर को सुरक्षा एजेंसियों को आतंकियों के मंसूबों के बारे में आगाह कर दिया था। खास बात यह है कि केरन सेक्टर में घुसपैठ के दिन ही कठुआ में सीमा पार से आए तीन आतंकियों ने पुलिस थाने और सैन्य कैंप पर हमला कर 12 लोगों को मार गिराया था। सुरक्षा एजेंसियों ने इस हमले के पीछे भी तालिबान लड़ाकों का हाथ होने की आशंका जताई थी।

घाटी में तालिबान लड़ाकों की दस्तक ने गृह मंत्रालय की चिंता बढ़ा दी है। गृह मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि 1980 के दशक से अब तक कश्मीर में विदेशी लड़ाकों की सीधी भागीदारी कभी नहीं रही। 90 के दशक के छिटपुट घटनाओं में विदेशी लड़ाकों के होने की बात सामने जरूर आई थी। सुरक्षा एजेंसियां लंबे से अफगानिस्तान से अमेरिकी फौजों के लौटने के बाद तालिबान में शामिल विदेशी लड़ाकों के कश्मीर का रुख करने की आशंका जता रहे थे। केरन और जम्मू के हमले ने इस आशंका पुष्टि कर दी है। तालिबान लड़ाकों के आने के बाद घाटी में पिछले तीन साल के दौरान लौटी शांति भंग हो सकती है।

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