नई दिल्‍ली [निशि भाट]। चुनाव प्रचार में नेताओं और कार्यकर्ताओं को स्वास्थ्य से संबंधित कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। प्रचार के दौरान खुद को स्वस्थ और फिट रखना सबसे बड़ी चुनौती होती है। पहले चरण का चुनाव जिन जगहों पर खत्म हो गया है वहां के कार्यकर्ता और नेताओं ने तसल्ली से अपनी चुनावी दिनचर्या के बारे में चर्चा की। नोएडा की एक कार्यकत्र्री ने बताया कि नेताजी को टिकट मिलने से पहले ही हमने अपना काम शुरू कर दिया था। इसके लिए महिलाओं के समूह को एकत्र करना, उन्हें अभियान में शामिल करना, काउंसलिंग आदि से लेकर मतदान के लिए किसी का नाम सूची से गायब न हो जाएं आदि सभी बहुत सारे कामों की जिम्मेदारी थी। सुबह की शुरुआत कुछ यूं होती थी कि एक गिलास छाछ और मठ्ठी खाकर घर से निकलना पड़ता था।

जाहिर सी बात है कि चुनावी क्षेत्र में तली- भुनी चीजें तो आसानी से मिल जाती हैं लेकिन उसका खामियाजा बाद में पेट गड़बड़ होने पर भुगतना पड़ता है। इसलिए कोशिश यही रहती थी कि घर से ही कुछ ऐसे स्वास्थ्यवर्धक खाद्य पदार्थ लेकर चला जाए। कुछ ही कार्यकर्ता ऐसे होते हैं जो नेताजी की गाड़ी में साथ चलते हैं, बाकी कार्यकर्ता रोज पांच से छह किलोमीटर पैदल चलते हैं। हालांकि गाड़ी में नींबू पानी और मिनरल पानी की व्यवस्था रहती है, पर गांवों में मतदाताओं से मिलने पर कई बार मजबूरी में उनके घरों का पानी और खाना भी लेना पड़ता है।

हाई ब्लड प्रेशर 

हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज की समस्या नेताओं को अधिक होती है। इसलिए धूप और गर्मी में चुनाव प्रचार के लिए उन्हें विशेष हिदायत दी जाती है। डायबिटीज है त कसी भी सूरत में दो से तीन घंटे के अंतराल पर कुछ खाते रहने की सलाह दी जाती है। इसके साथ ही हफ्ते में एक बार स्वास्थ्य की जांच जरूर की जाती है।

चूंकि अधिकांश नेता धूप में बाहर निकलने के आदी नहीं होते, इसलिए इन्हें सनबर्न और इलेक्ट्रोलाइट इंबैलेंस की शिकायत अधिक होती है।

कम न हो ग्लूकोज का स्तर

दो या तीन घंटे तक लगातार धूप का संपर्क ऊर्जा के स्तर को खत्म या कम करने लगता है। यही वजह है कि अधिकतर लोग धूप में बेहोश हो जाते हैं। जो कुछ भी हम खाते हैं वह शरीर के अंदर जाकर ग्लूकोज बन जाता है। ग्लूकोज के रूप में शरीर को चलाने के लिए जरूरी ऊर्जा को ‘इलेक्ट्रोलाइट’ कहा जाता है। तरल रूप में शरीर में पहुंचने वाले पदार्थ जैसे सोडियम पोटैशियम, नमक, मैग्नीशियम और बायकार्बोनेट के जरिए ही रक्त में प्लाज्मा बनता है, जिसके न बनने की सूरत में ब्लड प्रेशर कम हो जाता है।

धूप में बेहोश होने की स्थिति में खून की सीरम केमिस्ट्री जांच से इलेक्ट्रोलाइट इंबैलेंस का पता लगाया जाता है। यही कारण है कि चिकित्सा विशेषज्ञ नेताओं को धूप में सादा पानी पीने की जगह नींबू पानी, पोटैशियम युक्त या नमक युक्त पानी लेने की सलाह देते हैं। अधिकतर नेता चुनाव से पहले ही आहार विशेषज्ञों की सलाह पर अपने डाइट चार्ट तैयार करा चुके हैं,जिसे उन्होंने अपनी दिनचर्या में शामिल कर लिया है।

दिल से जुड़ी पेट की सेहत

कहीं चुनाव प्रचार थम गया तो कहीं टिकट ही नहीं मिला, किसी का टिकट कट गया तो कोई रेस में पीछे रह गया। चुनावी सरगर्मी की हर खबर नेताओं के दिल पर असर करती है। यही एक ऐसा समय है जबकि दिग्गजों की धड़कनें भी आलाकमान के फैसलों पर हिचकोले खाती है। सफदरजंग अस्पताल के यूरोलॉजिस्ट डॉ. अनूप कुमार कहते हैं कि फिल्म ‘पीकू’ में एक लाइन सही कही गई है, इमोशन से मोशन का सीधा संबंध होता है। इसको चिकित्सकीय भाषा में ‘बाउल इरिटेशन’ भी कहा जाता है। नेताओं में भी यह परेशानी देखी जाती है। फैसला पक्ष में आने से भी दिल की धड़कन बढ़ती है और फैसला पक्ष में न होने से ऐसी परिस्थिति एकदम से पल्स रेट को बढ़ा देती है। एंग्जाइटी या तनाव का स्तर बढ़ने से पेट में मरोड़ होने लगती है। अधिकतर नेताओं को चुनावी प्रक्रिया के दौरान मेडिटेशन या ध्यान आवश्यक रूप से अपनी दिनचर्या में शामिल करने को कहा जाता है। कुछ नेता ऐसे हैं जो चुनाव के दौरान केवल दलिया और खिचड़ी का ही सेवन कर रहे हैं।

सोशल मीडिया धैर्य की परीक्षा

मैदानी जंग से अलग सोशल मीडिया जैसे ट्विटर और फेसबुक पर छिड़ी आरोप-प्रत्यारोप की जंग भी सेहत पर असर डालती है। इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन विहैवियर एंड एलायड साइंस, दिल्ली के मनोचिकित्सक डॉ. ओम प्रकाश कहते हैं कि चुनाव आजकल आपके धैर्य की भी परीक्षा है, प्रतिपक्ष के आरोप-प्रत्यारोप के बीच बीपी और एंग्जाइटी को नियंत्रित रखते हुए स्थिर रहकर जवाब देना और अपना वोट बैंक मजबूत रखना बड़ी चुनौती है।

विषाक्त तत्वों को बाहर निकालें

आयुर्वेदाचार्य डॉ. आर.पी. पाराशर कहते हैं कि आयुर्वेद में तनावमुक्त होने का सबसे अच्छा तरीका है डिटॉक्सिफिकेशन, जिसे कई तरह की थेरेपी से किया जाता है। शरीर के अपशिष्ट पदार्थ जो पसीने से बाहर नहीं निकल पाते उनके लिए शिरोधारा, मडथेरेपी या स्पा दिया जाता है। पंद्रह से बीस दिन में एक बार का डिटॉक्सिफिकेशन तनावमुक्त और तरोताजा करने के लिए काफी है।

पैर सूज सकते हैं

ज्यादा पैदल चलने पर सूज सकते हैं पैर। जी हां, चुनाव प्रचार के दौरान दो से तीन घंटे चलने से पैर की नसें फूलना भी एक अहम समस्या है। चिकित्सक इसे ‘वैरीकोज वेन्स’ कहते हैं। हालांकि दो से तीन प्रतिशत मामलों में यह समस्या दिल से भी जुड़ी होती है, बावजूद इसके जिनको चलने की आदत नहीं होती, उन्हें लंबे समय तक खड़े रहने और चलने से सूजन हो जाती है। पैरों में सूजन किस वजह से हो रही है इसके लिए कलरडॉप्लर जांच की जाती है, जबकि सामान्य स्थिति में गरम पानी से पैरों की सिंकाई और तेल की मालिश करने से भी राहत मिल सकती है। नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए खुद को स्वस्थ व ऊर्जावान रखना है बड़ी चुनौती डाइटीशियन की सलाह पर कुछ नेता फॉलो कर रहे हैं दिनभर का डाइट चार्ट। यह रहा सैंपल...

ऐसे बचें अनिद्रा से

कई बार थकान से तुरंत नींद आ जाती है जबकि कुछ लोग तनाव और चिंता में बिल्कुल नहीं सो पाते। खासकर नेताओं की अनियमित दिनचर्या के कारण उन्हें नींद न आने की समस्या हो जाती है। नींद के लिए गोलियों का प्रयोग न करें। संभव हो तो सोने से एक घंटे पहले हल्दी वाला गर्म दूध लें। सोने से आधा घंटे पहले ही मोबाइल फोन को बंद कर दें। लाइट बंद होने के बाद मोबाइल की स्क्रीन बिल्कुल न देखें, इससे आई इरिटेशन होता है जो नींद से दूर कर सकता है।

डॉ. बलदेव राज, हृदयरोग विशेषज्ञ, सफदरजंग अस्पताल.

दिल्ली, डॉ. परमीत कौर, चीफ डाइटीशियन, एम्स, नई दिल्ली,

डॉ. ओम प्रकाश, मनोचिकित्सक, इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन

बिहेवियर एंड एलायड साइंस, दिल्ली और आयुर्वेदाचार्य

डॉ. आर.पी. पाराशर से बातचीत पर आधारित)

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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