नवीन नवाज, श्रीनगर। अलगाववाद की दरकती जमीन और ब्लैकमेल की सियासत पर ताला लगने का असर कश्मीर में साफ नजर आ रहा है। युवा पत्थरबाज की छवि से आजाद होकर रोजगार व विकास चाहता है। घाटी में बीते 21 दिनों में किसी तरह का कोई बड़ा हिंसक प्रदर्शन न होना इसका बड़ा सुबूत है। पत्थरबाजी की चंद घटनाएं हुई जो अब थम चुकी हैं। लालचौक से करीब 100 मीटर दूर महराजा बाजार में साथियों संग कैरम खेल रहे नियाज ने कहा कि हमें कभी स्वयत्तता तो कभी आजादी का नारा सुनाया गया। किसी ने हमसे हमारे मन की बात नहीं पूछी। सिर्फ गुमराह किया। आज यहां आराम से खेल रहा हूं अन्यथा पत्थर फेंक रहा होता। कभी किसी ने यह नहीं कहा कि नौजवान क्या चाहता है। हमें रोजगार और कश्मीर की तरक्की और खुशहाली चाहिए। यहां सिर्फ हड़ताल, बंद और हिंसा की सियासत खेली।

कश्मीरी नौजवान रोजगार चाहता है
अलगाववादियों का गढ़ कहे जाने वाले ईदगाह इलाके में दोस्तों संग क्रिकेट खेल रहे अरशद ने कहा आजादी, 370 से आगे भी बहुत कुछ है। अब कश्मीरियों को समझ आने लगा है। आपने पूरे शहर में कोई ढंग का मैदान देखा है। शाम होते ही हम लोग घरों में दुबक जाते हैं। यहां कोई सिनेमा हॉल नहीं है। निजी सेक्टर की बात छोड़ो, सरकारी नौकरियों का भी अकाल है। कश्मीर से बाहर नौकरी मिले या न मिले पत्थरबाज व आतंकी होने का ताना जरूर मिल जाता था। हमारा टूरिज्म तबाह होकर रह गया है। हम भी चाहते हैं कि यहां नौकरियां हों, इंडस्ट्री हो, यहां बड़े-बड़े स्टेडियम बनें।

गोगजीबाग में खुली दुकान पर ब्रेड खरीद रहे फैजान बट ने कहा कि पांच अगस्त का दिन वाकई ऐतिहासिक है। उस दिन यहां बदलाव शरू हुआ जो अपनी मंजिल तक जरूर पहुंचे। अगर यह लोगों को कुबूल न होता तो क्या यहां अमन होता। यहां दुकानें सुबह-शाम खुली नजर आती। मेरी मां को पूछो ,क्या वह मुझे जिहादी बनाने के लिए पाल रही थी,नहीं। वह तो चाहती है कि मैं पढ़ लिखकर अच्छा रोजगार कमाऊं। आपने जेके बैंक के बारे में सुना ही होगा, वहां सिर्फ उन्हीं लोगों के रिश्तेदारों को नौकरी मिली जो स्वायत्तता और सेल्फरूल का नारा देते हैं या आजादी। हमें नहीं। हमारे लिए अपनी मेहनत के दम पर नौकरी हासिल करने का रास्ता बना है। यहां कोई पथराव करने के लिए नहीं निकला।

आम कश्मीरी को फायदा
डल झील में नेहरु पार्क से कुछ ही दूरी पर मछली पकड़ रहे 34 वर्षीय असगर ने कहा कि यहां जो चल रहा था, उससे सब तंग थे। मैंने एमबीए किया और उसके बाद पीएचडी की। यहां नौकरी नहीं मिली। बाहर से भी यहां कोई बड़ी कंपनी निवेश के लिए राजी नहीं होती थी। कश्मीर में सिलिकान वैली बैंग्लुरु की तरह एक आइटी सिटी को विकसित करने की पूरी संभावना है। जम्मू कश्मीर विशेष प्रावधानों के फेर में वह शहर कभी नहीं बस पाया। यहां फिल्मों की शूटिंग होती है, और हम लोगों को सिनेमाहाल से महरूम रखा गया है। कश्मीर के लोग जब बाहर जाते हैं तो सिनेमाहॉल में भी फिल्म देखते हैं। पास बैठे वसीम ने कहा कि सियासत चाहे कैसी भी हो,लेकिन आम आदमी को एक युवा को रोजगार और सुकून चाहिए होता है। मैं डाउन-टाउन का हूं। विकास योजनाओं के नाम पर करोड़ों की निधि आई, लेकिन वरिष्ठ राजनेता के चहेते 15-16 ठेकेदारों को ठेका मिलता रहता है। अब यह सब बंद होगा,होना चाहिए, तभी नई दिल्ली ने जो कदम उठाया है, उससे आम कश्मीरी को फायदा होगा। इसी उम्मीद में लोग चुप बैठे हैं।

राष्ट्रविरोधियों के मंसूबे सफल नहीं हो रहे
कश्मीरी नौजवानों की मानसिकता में बदलाव की पुष्टि राज्य गृह विभाग द्वारा जमा आंकड़े भी करते हैं। राज्य सरकार के प्रवक्ता रोहित कंसल ने खुद माना है कि कश्मीर में राष्ट्रविरोधी तत्वों के भरसक प्रयास के बावजूद 17 अगस्त के बाद पथराव की घटनाएं थम गई हैं। 21 और 22 अगस्त को पूरी वादी में पथराव की तीन घटनाएं हुई हैं।

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Posted By: Sanjay Pokhriyal

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