नई दिल्ली: कर्नाटक में सात वर्षो के बाद सत्ता में आने के बाद कांग्रेस पार्टी के भीतर नेताओं के बीच मुख्यमंत्री बनने की होड़ शुरू हो गई है। हालांकि कांग्रेसी परंपरा के अनुसार अंतिम निर्णय आलाकमान का ही होगा लेकिन चार प्रमुख नाम मुख्यमंत्री की रेस में सबसे आगे चल रहे हैं:

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मल्लिकार्जुन खड़गे (71): केंद्रीय श्रम मंत्री हैं। कांग्रेस के प्रमुख दलित चेहरों में शामिल। 45 सालों से पार्टी में सक्रिय। आज तक कोई चुनाव नहीं हारे हैं। नौ बार विधायक रहने के बाद पहली बार गुलबर्ग से संसद सदस्य बने हैं। 2004 में राज्य का पहला दलित मुख्यमंत्री बनने से रह गए थे लेकिन गठबंधन की सहयोगी जद (एस) के दबाव पर पार्टी ने कमान धरम सिंह को सौंप दी थी। इस बार कुर्सी के प्रबल दावेदार हैं। क्योंकि राज्य की करीब 23 प्रतिशत अनुसूचित जाति की आबादी में से अभी तक कोई मुख्यमंत्री नहीं बना है।

सिद्दरमैया (55): पिछड़े वर्ग के कद्दावर नेता हैं। दो बार उपमुख्यमंत्री रह चुके हैं। जनता दल के टिकट से पहली बार विधायक बने। पार्टी के विभाजन के बाद एचडी देवगौड़ा की अगुआई वाली जद (एस) से नाता जोड़ा और राज्य इकाई के अध्यक्ष बने। उनसे मतभेद होने के कारण 2006 में कांग्रेस में शामिल हो गए। 2008 के चुनाव के बाद नेता प्रतिपक्ष बने। कांग्रेस में 'बाहरी' का तमगा लगा होने के कारण संभावनाओं को झटका लग सकता है क्योंकि उनके विरोधी मानते हैं कि अभी उनको कांग्रेस पार्टी के काम करने का तरीका सीखना है।

एम वीरप्पा मोइली (73): केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री राज्य के दिग्गज नेताओं में माने जाते हैं। 1972 में पहली बार विधायक बने। पिछड़े वर्ग से ताल्लुक रखने वाले मोइली छह बार विधायक रह चुके हैं। 1992-94 के दौरान राज्य की बागडोर संभाल चुके हैं। 2009 के आम चुनाव में पहली बार संसद सदस्य बने। कुछ समय से राज्य की सियासत से दूर हैं और यह बात इनके खिलाफ जा सकती है।

जी परमेश्वर (62): राजीव गांधी राजनीति में लाए थे। दलित नेता हैं। चार बार विधायक रह चुके हैं। राज्य कांग्रेस के प्रमुख हैं। मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा को कभी छिपाया नहीं लेकिन अब चुनाव हारने के बाद दावेदारी कमजोर हो गई है।

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