देहरादून [सुमन सेमवाल]। देश पर हंसकर न्यौछावर होने वाले जांबाजों की बदौलत ही आज हम अपने घरों में सुरक्षित हैं। सलाम है ऐसे रणबांकुरों को, जिनके लिए देश से बढ़कर कुछ भी नहीं। उत्तराखंड की धरा ने भी ऐसे वीर पैदा किए, जो वक्त आने पर देश की आन, बान और शान के खातिर अपना सर्वस्व न्यौछावर कराने से नहीं चूके। कारगिल युद्ध उत्तराखंड के सपूतों की वीरता का जीता जागता उदाहरण है। इतिहास गवाह है कि इस लड़ाई में पाकिस्तान को धूल चटाने में सूबे के 75 जवानों ने अपने प्राणों की कुर्बानी दे दी।

जब पाक सैनिकों ने पीठ में घोंपा छुरा

1999 में 60 दिन से अधिक समय तक चले कारगिल युद्ध में हमारे जवानों ने पाकिस्तान को मुंह तोड़ जवाब दिया था। 26 जुलाई 1999 को जीत की आधिकारिक घोषणा के साथ ही इसे 'ऑपरेशन विजय' का नाम दिया गया। इस विजय गाथा में देश के 527 जांबाजों ने अपने प्राणों की आहुति दी। इसमें उत्तराखंड के 75 सपूत भी शहीद हुए। यह आंकड़ा शहीदों की संख्या का करीब 15 फीसद है, जबकि राज्य की आबादी देश की 10 फीसद के करीब ही है। जिससे पता चलता है कि देश की रक्षा की खातिर प्राण गंवाने में प्रदेश के सपूत हरदम आगे रहते हैं।

भारतीय सेना के सामने पाक ने टेके थे घुटने

कारगिल की वीरगाथा को 14 साल का समय हो गया। एक बार फिर विजय दिवस के रूप में देश की खातिर कुर्बान हुए रणबांकुरों की शहादत को सलाम करने का समय है। लेकिन, सिर्फ विजय दिवस पर ही शहीदों को याद करने से काम नहीं चलेगा। प्रदेश के हर युवा को देश की रक्षा का संकल्प लेना होगा और वक्त आने पर अपना सर्वस्व न्यौछावर कर इसकी मिसाल भी पेश करनी होगी।

शहीद दिलवर के बच्चों ने हासिल किया मुकाम

देहरादून [जासं]। जिंदगी किसी के चले जाने पर नहीं रुकती। न कभी वक्त किसी के लिए ठहरता है। अपने हालात पर इंसान संघर्ष से ही विजय पाता है। जिंदगी के इसी संघर्ष की 'आग' में तपकर शहीद दिलवर सिंह का परिवार 'कुंदन' बना है। घर की बेटियां उस मुकाम पर हैं कि भाई भी उनसे करियर की सलाह लेते हैं।

17 गढ़वाल राइफल्स के नायक दिलवर सिंह 13 जुलाई 1999 को शहीद हुए। उस वक्त उनकी पत्‍‌नी गर्भवती थी। छोटा बेटा शूरबीर तब हुआ भी नहीं था। बड़ी बेटी किरण चौथी कक्षा में पढ़ती थी। पिता की कुछ यादें उसके जेहन में हैं। मगर बेटा रोशन व बेटी प्रियंका इतने छोटे थे कि उस वक्त का कुछ भी याद नहीं। पिता के बारे में ज्यादातर बातें मां से ही सुनी हैं।

शहीद की पत्‍‌नी कमला देवी कहती हैं कि तब लगा था कि अब सब खत्म हो चुका है। मगर बच्चों की कामयाबी ने इसे गलत साबित कर दिया। अब लगता है कि जीवन में बहुत कुछ देखना अभी बाकी है।

वर्ष 2000 में परिवार रिठोली, चमोली से आकर श्यामपुर में बस गया। मां ने पिता की कमी बच्चों को महसूस नहीं होने दी। उनका भविष्य संवारने की ख्वाहिश मन में लिए अच्छी शिक्षा दी। बड़ी बेटी किरण मुंबई के एक कॉलेज से एमबीए कर रही है। यह उसका फाइनल इयर है।

दूसरी बेटी प्रियंका भी ग्राफिक एरा यूनिवर्सिटी से बीबीए कर रही है। भाई रोशन व शूरबीर भी करियर की सलाह उन्हीं से लेते हैं। रोशन केंद्रीय विद्यालय में 12वीं का छात्र है और शूरबीर कारमन स्कूल में कक्षा नौ में पढ़ता है। प्रियंका बताती है कि रोशन सीए बनना चाहता है। मैं और दीदी हमेशा उसे गाइड करते हैं। जिंदगी में ऐसा कुछ करने की ख्वाहिश है कि पिता की रूह को सुकून मिले।

शहादत का कैसा सिला

देहरादून [जासं]। शहीदों की शहादत का ये कैसा सम्मान? कहीं शहीदों के नाम के स्मारक व सड़कें लावारिश हालत में हैं, तो कहीं सड़कें मरम्मत को तरस रही हैं। उनके स्मारकों पर पोस्टरों की भरमार भी शर्मिदगी का एहसास कराती है। और तो और कुछ स्थानों पर से शहीदों के नाम के शिलापट तक उखाड़ डाले गए हैं। राजधानी देहरादून में करीब एक दर्जन स्मारक उपेक्षा का शिकार हैं।

शहर में अधिकांश शहीद स्मारक का यही हाल है। दिलाराम चौक पर शिलापट के हाल सरकार की उदासीनता बयां करते हैं।

मेजर विवेक गुप्ता [महावीर चक्र]

देहरादून के वसंत विहार निवासी ले. कर्नल (रिटायर्ड) बृजमोहन गुप्ता के घर 1970 में मेजर विवेक गुप्ता का जन्म हुआ। आपरेशन विजय के दौरान 12 जून 1999 को मेजर विवेक गुप्ता ने तोतोलिंग चोटी को पाक घुसपैठियों से मुक्त करते हुए कई आतंकियों को मौत के घाट उतारा, मात्र 29 वर्ष की आयु में देश के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए।

देहरादून के वसंत विहार निवासी ले. कर्नल (रिटायर्ड) बृजमोहन गुप्ता के घर 1970 में मेजर विवेक गुप्ता का जन्म हुआ। आपरेशन विजय के दौरान 12 जून 1999 को मेजर विवेक गुप्ता ने तोतोलिंग चोटी को पाक घुसपैठियों से मुक्त करते हुए कई आतंकियों को मौत के घाट उतारा, मात्र 29 वर्ष की आयु में देश के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए।

स्क्वाड्रन लीडर राजीव पुंडीर

28 अप्रैल 1962 में ग्राम बाड़वाला में ठाकुर राजपाल सिंह व हेमवती पुंडीर के घर इस वीर सपूत का जन्म हुआ। आपरेशन विजय के दौरान शत्रुओं की गतिविधियों की जानकारी लेने को उन्होंने उड़ान भरी। वह शत्रुओं की गतिविधियों का जानकारी ले रहे थे कि घुसपैठियों ने मिसाइल से उनके हेलीकॉप्टर पर हमला कर दिया।

28 अप्रैल 1962 में ग्राम बाड़वाला में ठाकुर राजपाल सिंह व हेमवती पुंडीर के घर इस वीर सपूत का जन्म हुआ। आपरेशन विजय के दौरान शत्रुओं की गतिविधियों की जानकारी लेने को उन्होंने उड़ान भरी। वह शत्रुओं की गतिविधियों का जानकारी ले रहे थे कि घुसपैठियों ने मिसाइल से उनके हेलीकॉप्टर पर हमला कर दिया।

राइफलमैन जयदीप सिंह भंडारी

शहीद जयदीप सिंह भंडारी का जन्म 15 जनवरी 1978 को नेहरूग्राम निवासी बचन सिंह भंडारी के घर हुआ। इंटरमीडिएट की परीक्षा पास कर वह 17 गढ़वाल रायफल में भर्ती हुए। आपरेशन विजय के दौरान उन्हें बटालिक सेक्टर की जुबार हिल में तैनाती मिली। दुश्मनों से लोहा लेते हुए तीस जून को यह जांबाज वीरगति को प्राप्त हुआ।

शहीद जयदीप सिंह भंडारी का जन्म 15 जनवरी 1978 को नेहरूग्राम निवासी बचन सिंह भंडारी के घर हुआ। इंटरमीडिएट की परीक्षा पास कर वह 17 गढ़वाल रायफल में भर्ती हुए। आपरेशन विजय के दौरान उन्हें बटालिक सेक्टर की जुबार हिल में तैनाती मिली। दुश्मनों से लोहा लेते हुए तीस जून को यह जांबाज वीरगति को प्राप्त हुआ।

नायक बृहमोहन [वीर चक्र]

देहरादून के ग्राम तुनवाला में एक जून 1975 में माधो सिंह नेगी के घर इस वीर सपूत का जन्म हुआ। कारगिल युद्ध के दौरान उन्हें कश्मीर में तैनाती मिली। एक जुलाई को पाकिस्तानी घुसपैठियों को मुंहतोड़ जवाब देते हुए बृजमोहन मात्र 24 वर्ष की युवावस्था में देश के लिए शहीद हो गया। मरणोपरांत बृजमोहन को वीर चक्र से सम्मानित किया गया।

देहरादून के ग्राम तुनवाला में एक जून 1975 में माधो सिंह नेगी के घर इस वीर सपूत का जन्म हुआ। कारगिल युद्ध के दौरान उन्हें कश्मीर में तैनाती मिली। एक जुलाई को पाकिस्तानी घुसपैठियों को मुंहतोड़ जवाब देते हुए बृजमोहन मात्र 24 वर्ष की युवावस्था में देश के लिए शहीद हो गया। मरणोपरांत बृजमोहन को वीर चक्र से सम्मानित किया गया।

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