जम्मू, विवेक सिंह। देश के दुश्मनों ने जब भी आंख उठाकर देखने का साहस किया, लद्दाखी वीरों ने शौर्य और कुर्बानियों से उनके हर मंसूबों को विफल कर दिया। कारगिल युद्ध में बर्फ के लड़ाकों ने बिना तोपखाने के चोटियां फतह कर शौर्य की ऐसी इबारत लिखी कि सेना को भी उनके जज्बे को सलाम करना पड़ा। कारगिल के तुरंत बाद 1 जून 2000 को लद्दाख स्काउट्स को भारतीय सेना की नियमित इन्फैंटरी रेजीमेंट बनाने का फैसला कर दिया।

कारगिल युद्ध के दौरान शोरबत ला व डॉग हिल पर विजय की गाथा आज भी रोमांच से भर देती हैं। देश के लिए कुर्बानी की जब भी बात आई, लद्दाखी सैनिक उसमें आगे ही रहे। एक अशोक चक्र, 10 महावीर चक्र, दो कीर्ति चक्र समेत करीब 605 वीरता पदक जीत लद्दाख स्काउट्स मिसाल बन गई। आज लद्दाख स्काउट्स की एक बटालियन सियाचिन में भी दुश्मन के सामने सीना ताने खड़ी है।

कारगिल युद्ध के दौरान 24 लद्दाखी सैनिकों ने कुर्बानियां दी थी। 26 जुलाई को कारगिल युद्ध के बीस साल पूरे होने पर इन वीरों समेत तमाम शहीदों को देश श्रद्धांजलि दे रहा है। सेना के सेवानिवृत्त मेजर जनरल जीएस जम्वाल का कहना है कि लद्दाखी सैनिक कुदरती तौर पर दुर्गम, उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में लडऩे में सक्षम हैं। इसलिए उन्हें बर्फीले चीते कहा जाता है। लद्दाखी सैनिक वर्ष 1948 से बहादुरी का लोहा मनाते आ रहे हैं। लद्दाख स्काउट््स की पांच बटालियनें हैं, इनमें दो हमेशा लद्दाख के अत्यंत दुर्गम क्षेत्र में तैनात रहती हैं।

बिना तोपखाने के जीता कारगिल का पहला मोर्चा

कारगिल घुसपैठ की पहली खबर के साथ लद्दाखी चीते मोर्चे पर आ डटे थे। उसके बाद उन्होंने जो कर दिखाया वह इतिहास रच गया। दुश्मन 5500 फीट की ऊंचाई से गोले बरसा रहा था और चुनौती थी उनके सफाए की। शोरबत ला दर्रे के साथ लगती रिज लाइन से दुश्मन के सफाए की जिम्मेवारी लद्दाख स्काउट्स के मेजर सोनम वांगचुक के नेतृत्व वाली 30 जवानों की टुकड़ी को मिली। चार जवानों को बेस कैंप में छोड़ मेजर वांगचुक ने दो टुकडिय़ां बनाई और दोनों ओर से दुश्मन पर हमले का निर्णय किया। शून्य से छह डिग्री कम तापमान में पूरी रात रेंगकर दुश्मन की गोलाबारी के बीच वह आगे बढ़ते रहे और 30 मई की सुबह चोटी पर दुश्मन पर धावा बोल दिया गया। मौके से भारी मात्रा में गोला बारूद के साथ तीन पाकिस्तानी सैनिकों के शव भी मिले। चोटी पर फतेह भारतीय सेना के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी। इसके बाद कारगिल की विजय गाथा बढ़ती रही। इसी तरह लद्दाख स्काउट्स ने बटालिक सेक्टर में डॉग हिल को अपने कब्जे में लेने के लिए 5/6 जुलाई को धावा बोला। उन्होंने प्वायंट 5000 के पास चोटी पर बैठे दुश्मन के छह सैनिक मार गिराए। फिर जान की बाजी लगाते हुए जवानों ने तुरतुक के प्वायंट 5287 को भी कब्जे में ले लिया।

चीन को मानते हैं खतरा

लद्दाख के लोग चीन को क्षेत्र के लिए खतरा मानते हैं। ऐसे में क्षेत्र की सुरक्षा को लेकर बहुत गंभीर हैं। भले ही इस समय चीन अपना असली चेहरा न दिखा रहा हो लेकिन लद्दाखी मानते हैं कि चीन पीठ पीछे वार करता है। लेह के युवक छिवांग माटुप का कहना है कि लद्दाखी देशभक्ति में किसी से कम नही हैं। उन्होंने बताया कि क्षेत्र के युवा मानसिक व शारीरिक रूप में मजबूत होने के कारण भी देश के अच्छे सिपाही साबित होते हैं।

पहले जवान छिवांग रिनचिन ने दो बार जीता महावीर चक्र

बंटवारे के बाद वर्ष 1948 में कारगिल पर कब्जा करने की पाकिस्तान की साजिश को नाकाम बनाने के लिए नोबरा गार्ड का गठन हुआ था। चार साल बाद नोबरा गार्ड का विलय जम्मू कश्मीर मिलिशिया के साथ कर दिया गया। वर्ष 1948 में लद्दाख को बचाने के लिए क्षेत्र के लोगों से सहयोग मांगा गया तो सबसे पहले सामने आने वालों में सत्रह वर्षीय छात्र छिवांग रिनचिन शामिल थे। लद्दाख को बचाने के लिए हुई लड़ाई में असाधारण बहादुरी के लिए रिनचिन को पहला महावीर चक्र मिला। इस कारण उन्हें भारतीय सेना में जीसीओ बना दिया गया। सेना में कर्नल के रैंक तक पहुंचने वाले लद्दाख के इस पहले सैनिक ने वर्ष 1962 में भारत-चीन के युद्ध में बहादुरी के लिए सेना मेडल व भारत के 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में दूसरी बार महावीर चक्र जीता।

Posted By: Tilak Raj

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