मुंबई [ओमप्रकाश तिवारी]। पुणे में कांग्रेस के मजबूत स्तंभ रहे सुरेश कलमाड़ी इस बार कमजोर कड़ी बन सकते हैं। शायद यही कारण है कि टिकट न मिलने की दशा में निर्दलीय ही मैदान में उतरने की लगभग घोषणा कर चुके कलमाड़ी को पटाने की कवायद शुरू हो गई है।

करीब डेढ़ दशक से सुरेश कलमाड़ी पुणे में कांग्रेस का चेहरा रहे हैं। वह पहली बार 1996 में तब लोकसभा के लिए चुने गए थे, जब महाराष्ट्र में कांग्रेस की हालत बहुत पतली रही थी। उसके बाद 2004 और 2009 के लोकसभा चुनाव में भी कलमाड़ी ने ही पुणे से कांग्रेस की जीत दिलाई थी। राष्ट्रमंडल घोटाले में उनका नाम आने के बाद न सिर्फ उन्हें कांग्रेस से निलंबित कर दिया गया बल्कि कुछ माह उन्हें जेल में भी गुजारने पड़े। चुनाव की घोषणा होने के बाद अब पार्टी ने उनका टिकट भी काट दिया है। कलमाड़ी को अहसास था कि इस बार उनका टिकट कट सकता है। इसलिए महीनों पहले से वह कांग्रेस आलाकमान के सामने अपनी पच्ी का नाम आगे बढ़ाने की कोशिश में लगे रहे। लेकिन आलाकमान ने उनकी यह दलील भी ठुकराते हुए इस बार पुणे से महाराष्ट्र युवक कांग्रेस अध्यक्ष विश्वजीत कदम को टिकट दे दिया। कदम के पिता पतंगराव कदम महाराष्ट्र सरकार में वरिष्ठ मंद्दी हैं।

कांग्रेस नेताओं को अहसास है कि कलमाड़ी के बागी तेवर पार्टी को नुकसान कर सकते हैं। 1998 में कांग्रेस ने उनका टिकट काटकर विट्ठलराव तुपे को दिया था। उस समय किसी और दल ने भी अपना उम्मीदवार नहीं खड़ा किया था। तब कलमाड़ी निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में भी दूसरे स्थान पर रहते हुए साढ़े तीन लाख मत पाने में सफल रहे थे। टिकट पाने की रस्साकसी में कलमाड़ी ब्राह्मण कार्ड भी खेल रहे हैं। पुणे के लिए अब तक घोषित कांग्रेस एवं महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के उम्मीदवार मराठा हैं। जबकि पुणे ने अब तक 14 में से 11 बार ब्राह्मणों को लोकसभा में भेजा है। लिहाजा कांग्रेस ने उन्हें मनाने की जिम्मेदारी राज्य सरकार में वरिष्ठ मंद्दी हर्षव‌र्द्धन पाटिल को सौंपी है। बात नहीं बनी तो कांग्रेस के लिए इस बार पुणे जीतना मुश्किल होगा।

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