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नई दिल्ली [जागरण स्पेशल] अयोध्या राम जन्मभूमि मामले में सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान बीते दिनों एक अलग ही वाकया देखने को मिला। रामलला की तरफ से अपना पक्ष रखने के लिए जैसे ही वरिष्ठ वकील के परासरन अपनी सीट से खड़े हुए, मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने उनसे पूछा, ‘क्या आप बैठकर बहस करना चाहेंगे?’ इस पर उन्होंने कहा, ‘कोई बात नहीं। बार की परंपरा खड़े होकर ही बहस करने की है।’ वकालत की दुनिया में 92 वर्षीय परासरन का कद बताने के लिए यह वाकया काफी है।

2016 के बाद से कोर्ट में उनकी उपस्थिति भले ही कम रही हो, लेकिन दो बड़े मुकदमों ने उन्हें एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया। पहला-सबरीमाला और दूसरा अयोध्या राम जन्मभूमि मामला। इन दोनों मुकदमों के चलते दो बार देश के अटॉर्नी जनरल रह चुके परासन चेन्नई से दिल्ली वापस आए। हंिदूू धर्मग्रंथों के जानकार परासरन सवरेत्कृष्ट सरकारी वकील हैं। 1970 के बाद से वह हर सरकार के विश्वसनीय रहे। अदालत में अक्सर हंिदूू धर्मग्रंथों पर व्याख्यान देते हैं। अपने धर्म से समझौता किए बिना कानून में दिए गए इनके योगदान के लिए मद्रास के पूर्व मुख्य न्यायाधीश संजय किशन कौल ने इन्हें भारत में वकील समुदाय का पितामह कहा था।सबरीमाला मामले में परासरन 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं पर मंदिर में प्रवेश पर रोक का बचाव करने के लिए नायर सर्विस सोसाइटी की तरफ से पेश हुए। 

सही सवाल पूछने पर सही जवाब, गलत सवाल पूछने पर गलत जवाब 

उन्होंने तर्क दिया कि अदालत इस मामले में गलत सवाल पूछ रही है। उन्होंने न्यायाधीशों से कहा, ‘अगर कोई व्यक्ति यह पूछे कि क्या वह प्रार्थना के दौरान धूमपान कर सकता है तो उसे एक थप्पड़ पड़ेगा, जबकि अगर वह यह पूछता है कि क्या वह धूमपान करते हुए प्रार्थना कर सकता है तो उसकी सराहना होगी। इसी तरह सही सवाल पूछे जाने पर सही जवाब प्राप्त होगा, जबकि गलत सवाल पूछने पर गलत जवाब मिलेगा।’ जिरह के दौरान परासरन ने कोर्ट में भगवान अय्यप्पा की ब्रrाचारी प्रकृति को समझाने के लिए सुंदरकांड और रामायण के अंशों को पढ़ा। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की बेंच ने फैसला उनके खिलाफ दिया और महिलाओं को मंदिर में जाने की अनुमति दी।इससे पहले एक और मामले में वह सुर्खियों में रहे। राम सेतु केस में जब दोनों विरोधी पार्टियां परासरन के पास पहुंचीं तो उन्होंने सरकार के खिलाफ जाकर, सेतुसमुद्रम परियोजना से सेतु की रक्षा करने का निर्णय लिया।

ये सबसे कम है जो मैं भगवान राम के लिए कह रहा हूं

जब जजों ने परासरन से पूछा कि वह सरकार का विरोध क्यों कर रहे हैं तो उन्होंने स्कंद पुराण का जिक्र किया, जिसमें इस सेतु का वर्णन है। मामला अभी भी सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है। परासरन ने कहा था, ‘यह सबसे कम है, जो मैं राम के लिए कर सकता हूं।’के परासरन ने सुप्रीम कोर्ट में 1958 में प्रैक्टिस शुरू की। बीती सदी के सातवें दशक में बड़े मामलों में परासरन का सामना अक्सर नानी पालकीवाला से होता था।

आपातकाल के दौरान परासरन तमिलनाडु के एडवोकेट जनरल थे। 1980 में देश के सॉलिसिटर जनरल नियुक्त किए गए। 1983 से 1989 तक देश के अटॉर्नी जनरल के रूप में काम किया। 1992 में जब मुंबई निवासी मिलन बनर्जी को अटॉर्नी जनरल नियुक्त किया गया, तब परासरन को ‘सुपर एजी’ के रूप में संदर्भित किया गया। बनर्जी को मध्यस्थता और वाणिज्यिक कानूनों में महारत हासिल थी, लेकिन संवैधानिक मामलों में सरकार के पास परासन ही सबसे अच्छा विकल्प रहे।सरकारें बदलीं, लेकिन परासरन हमेशा सराहे गए।

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हें संविधान के कामकाज की समीक्षा के साथ प्रारूपण और संपादकीय समिति के सदस्य के रूप में नियुक्त किया। वाजपेयी के नेतृत्व वाली राजग सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया। वहीं, मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली संप्रग-1 सरकार ने उन्हें पद्म विभूषण से नवाजा और उन्हें संसद के उच्च सदन में मनोनीत किया।

चौथी पीढ़ी ने संभाली विरासत

के परासरन का जन्म 1927 में तमिलनाडु के श्रीरंगम में हुआ। परासरन के पिता केशव अयंगर वकील और वैदिक विद्वान थे। उन्होंने मद्रास हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में वकालत की। परासरन के तीनों पुत्र मोहन, सतीश और बालाजी भी वकील हैं। मोहन परासरन संप्रग-2 सरकार में कुछ समय के लिए सॉलिसिटर जनरल रहे। अब परिवार की चौथी पीढ़ी ने भी इस विरासत को आगे बढ़ाते हुए वकालत की दुनिया में कदम रखा है। 

Posted By: Vinay Tiwari

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