जजों की नियुक्ति में सरकार की अहम भूमिका', कॉलेजियम सिस्टम पर बोला सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपांकर दत्ता ने जजों की नियुक्ति में न्यायपालिका की भूमिका को कार्यपालिका के मुकाबले दूसरे नंबर ...और पढ़ें

जजों की नियुक्ति में न्यायपालिका की भूमिका कार्यपालिका से गौण (फोटो-ANI)
HighLights
जजों की नियुक्ति में न्यायपालिका की भूमिका कार्यपालिका से गौण।
नियुक्ति प्रक्रिया में केंद्र, राज्य सरकार और खुफिया एजेंसियों की जांच।
कॉलेजियम को दोष देना आजकल एक फैशन बन गया है।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपांकर दत्ता ने जज ही जज की नियुक्ति करते हैं वाली धारणा को खारिज कर दिया है। उन्होंने जजों की नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़े मामले पर टिप्पणी करते हुए कहा कि असल में जजों की नियुक्ति में न्यायपालिका की भूमिका कार्यपालिका के मुकाबले दूसरे नंबर पर होती है।
न्यूज एजेंसी PTI के अनुसार, जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कहा, 'यह कोर्ट सोचता है कि जजों की नियुक्ति के मामले में न्यायपालिका को कार्यपालिका के मुकाबले गौण भूमिका में रखे जाने के बाद भी सिलेक्शन के स्टेज पर किसी बाहरी व्यक्ति को शामिल करने की मांग क्यों की जा रही है।'
जज के मुताबिक कार्यपालिका की ओर से यह तर्क दिया गया कि अपनी लापरवाही और विफलता से ध्यान हटाने की एक कमजोर कोशिश थी। दीपांकर दत्ता ने सरकार के उस तर्क को खारिज कर दिया जिसमें जजों की नियुक्ति की कॉलेजियम सिस्टम में बाहरी व्यक्ति की अनुपस्थिति की तुलना की गई थी।
जज नियुक्ति प्रक्रिया में सरकार की अहम भूमिका
जस्टिस दत्ता ने कॉलेजियम को स्वतंत्र कानून की तरह काम करने के आरोपों का जवाब दिया और नियुक्ति की प्रक्रिया विस्तार से बताई। उन्होंने बताया कि सिफारिश से पहले केंद्र और राज्य सरकारों, खुफिया एजेंसियों और अन्य संबंधित निकायों द्वारा उम्मीदवारों की योग्यता और पृष्ठभूमि की गहन जांच-पड़ताल की जाती है। साथ ही उन्होंने ये भी बताया कि प्रत्येक जज की नियुक्ति में भारत के राष्ट्रपति की औपचारिक और अंतिम सहमति आवश्यक होती है।
कार्यपालिका के रवैये पर सवाल
जस्टिस दत्ता ने कहा कि कॉलेजियम द्वारा भेजे गए सुझावों में से सरकार अक्सर चुनिंदा तरीके से फैसलों को लागू करती है। उन्होंने कहा, ' हर बार कार्यपालिका कॉलेजियम के फैसले को चुनिंदा तरीके से लागू करती है लेकिन कम से कम एक नाम को रोक लेती है।'
उन्होंने कहा कि कार्यपालिका से सीधे टकराव से बचने और न्यायिक संस्थान को सुचारू रूप से चलाने के लिए कॉलेजियम ऐसे मामलों में आगे बढ़ने का फैसला लेता है, ताकि कोई संवैधानिक संकट पैदा न हो। सरकार द्वारा कॉलेजियम में बाहरी व्यक्ति की मौजूदगी की मांग पर जस्टिस दत्ता ने इसे कार्यपालिका द्वारा अपनी ही लापरवाही और विफलता से ध्यान हटाने की एक कमजोर कोशिश करार दिया।
कॉलेजियम को दोष देना एक फैशन
जस्टिस दत्ता ने कहा कि आजकल किसी भी गलत निर्णय के लिए कॉलेजियम सिस्टम को जिम्मेदार ठहराना एक फैशन बन चुका है। उन्होंने कहा, ' आजकल किसी भी गलत फैसले के लिए कॉलेजियम को दोष देना एक फैशन बन गया है।
लोग आसानी से भूल जाते हैं कि गलतियां अपवाद होती हैं, नियम नहीं और कोई भी सिस्टम इंसानी फैसलों के पूरी तरह सही होने की गारंटी नहीं दे सकता है।' उन्होंने कहा कि जनता में यह गलतफहमी फैला दी गई है कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के कॉलेजियम में जज ही होते हैं, जो जजों की नियुक्ति करते हैं।
