प्रदीप शुक्ला। भक्तों ने मां दुर्गा को अगले बरस फिर आने का वादा लेकर विदा कर दिया है। हर बरस की तरह इस बार भी दशानन को जला दिया गया है। राज्य भर में इस उत्सवी माहौल को भुनाने में भला राजनीतिक दल कहां पीछे रहने वाले थे। पूजा पंडालों से लेकर रामलीला मैदानों तक कार्यकर्ताओं की धमा-चौकड़ी बाखूबी दिखी। आसन्न चुनाव में टिकट के दावेदार भी पंडाल दर पंडाल घूमकर शीश नवा रहे थे। आशीष मांग रहे थे, मां का भी और भक्तों का भी, लेकिन उनका ध्यान शायद इस ओर नहीं गया होगा, मां क्या चाह रही हैं? आखिर हर जगह मुंह बाए खड़े दशाननों का अंत कब होगा?

पूजा खत्म हो गई है। राजनीतिक दल अब पंडालों से निकलकर फिर गली-चौराहों से लेकर गांव की पगडंडियों को नापेंगे। एक-दूसरे पर कीचड़ उछालेंगे, लेकिन पंडालों से निकले संदेशों पर चर्चा तो दूर चूं भी नहीं करेंगे, क्योंकि ऐसा करने से कहीं न कहीं उंगली उन्हीं पर उठेगी। हर कोई गाल बजाएगा, दुहाई देगा, वही राज्य और प्रजा के हितैषी हैं, लेकिन असल मुद्दों को छुएंगे तक नहीं। पूजा पंडालों में छिपे संदेशों पर बहस का उनमें साहस नहीं है, क्योंकि भ्रूण हत्या से लेकर प्रदूषण तक, नदियों की पीड़ा से लेकर महिला सुरक्षा तक.. कहीं न कहीं वह जिम्मेदार जो हैं। देश में औसत से ज्यादा बारिश हुई है, लेकिन झारखंड के तमाम जिलों में इस बार सामान्य से कम बारिश हुई है।

यहां के बांधों में पानी का उतना संचयन नहीं हुआ है जितना होना चाहिए था। इसके परिणाम अगले वर्ष गरमी में भयावह जलसंकट के रूप में दिखेगा। जनता नेताओं के घर दौड़ रही होगी, और नेताजी कह रहे होंगे, सड़क से लेकर विधानसभा तक मामला उठाऊंगा, लेकिन पानी आएगा कहां से? यह न वह तब बता पाएंगे और न ही अभी उन्हें इसकी चिंता है। यह तब है जब संकट पेयजल से आगे जा चुका है। औद्योगिक कारखानों के सामने भी पानी का संकट खड़ा होने लगा है। उत्पादन प्रभावित होने लगा है। राज्य के कई हिस्सों में पानी के संकट के चलते लोगों को पलायन तक करना पड़ रहा है।

बीती गरमी में जमशेदपुर के आदित्यपुर और रांची के ही टैगोर हिल इलाके में लोगों को अपने मकान बंद कर दूसरी जगह किराए पर रहने पर मजबूर होना पड़ा था। कृषि का हाल किसी से छुपा नहीं है। रबी सीजन में राज्य में लाखों हेक्टेयर भूमि पर पानी के अभाव में फसल बोई ही नहीं जाती है। इसी तरह प्रदूषण भी चुनावी मुद्दा नहीं है। लोग मर रहे हैं तो मरें, लेकिन अधिकांश राजनीतिक दलों को इसमें कोई रुचि नहीं होती है। जल-जंगल-जमीन की बात खूब होगी, लेकिन हकीकत में अधिकांश दलों को इसकी चिंता नहीं है, क्योंकि यह मतदाताओं को लुभाता नहीं है।

गठबंधन पर फंसता पेच 

उत्सवी माहौल के बीच सियासी गठबंधनों की खिचड़ी भी पकती रही। सभी ज्यादा से ज्यादा पाने की चाहत एक-दूसरे पर दबाव बना रहे हैं। राज्य में सत्तासीन भाजपानीत गठबंधन का सहयोगी दल आजसू लगभग डेढ़ दर्जन से ज्यादा विधानसभा सीटों पर दावेदारी कर रहा है। इसमें कुछ सीटों पर भाजपा के विधायक काबिज हैं। उधर, एनडीए का घटक दल लोजपा भी अपने लिए सीटों की मांग कर रहा है। पिछले विधानसभा चुनाव में लोजपा को गठबंधन के तहत एक सीट मिली थी। फिलहाल भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने गठबंधन के तहत मांगी जा रही सीटों पर चुप्पी साध रखी है। भाजपा के रुख को देखते हुए जदयू पहले ही किनारा कर चुका है। बिहार में भाजपा के साथ सरकार चला रही जदयू के नेताओं ने अधिकाधिक सीटों पर उम्मीदवार उतारने का एलान कर दिया। कयास लगाया जा रहा है कि चुनाव की अधिसूचना जारी होने के बाद भाजपा मित्र दलों के साथ सीट शेयरिंग पर रवैया स्पष्ट करेगी। हालांकि जदयू के साथ समझौते की गुंजाइश झारखंड में नहीं के बराबर है।

उधर, इससे बुरी स्थिति विपक्षी दलों की है। लोकसभा चुनाव में तालमेल में सफलता के बाद इसकी कम संभावना है कि हूबहू समझौता विधानसभा चुनाव में हो पाएगा। इसकी सबसे बड़ी वजह क्षेत्रीय दलों की महत्वाकांक्षा है। मुख्य विपक्षी दल झारखंड मुक्ति मोर्चा के अगुआ हेमंत सोरेन खुद को मुख्यमंत्री के चेहरे के तौर पर प्रोजेक्ट करना चाहते हैं। पहले कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने मौके की नजाकत को भांपते हुए उनकी शर्त को स्वीकार कर लिया था। इसके एवज में झारखंड मुक्ति मोर्चा ने कांग्रेस को एक राज्यसभा सीट पर जीत हासिल करने में मदद की और लोकसभा चुनाव में ज्यादा सीटों पर लड़ने का मौका दिया।

अब कांग्रेस के नेता पूर्व में किए गए अपने वादे से मुकरते नजर आ रहे हैं। विपक्षी गठबंधन के एक अहम दल झारखंड विकास मोर्चा की चाल अलग है। मोर्चा के प्रमुख बाबूलाल मरांडी हेमंत सोरेन की अगुवाई स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं। हालांकि मरांडी राजनीतिक मोर्चे पर फिलहाल हाशिये पर दिख रहे हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में आठ विधायक उनके दल के टिकट पर जीतकर आए थे, जिसमें से सात भाजपा में शामिल हो चुके हैं। खुद बाबूलाल मरांडी भी लोकसभा का चुनाव हार चुके हैं। वे किसी ठौर की तलाश में हैं और ज्यादा संभावना है कि वे अकेले विधानसभा चुनाव का सामना करें।

वामदलों समेत अन्य छोटे दलों का साथ उन्हें मिल सकता है। जदयू ने भी उनकी ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया है। भाजपा प्रचार अभियान के मोर्चे पर विपक्षी दलों से काफी आगे हैं। खुद मुख्यमंत्री रघुवर दास जन आशीर्वाद यात्र के माध्यम से पूरे प्रदेश में संपर्क अभियान चला रहे हैं।

(लेखक झारखंड में दैनिक जागरण के स्थानीय संपादक हैं)

Posted By: Kamal Verma

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