संजय मिश्र, नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक विपक्षी गठबंधन की कसरत में जुटी कांग्रेस गुजरात और राजस्थान सरीखे अपने सियासी प्रभाव वाले राज्यों में छोटे सहयोगी दलों को कोई तवज्जो नहीं दे रही। कांग्रेस का यह रुख सहयोगी दलों जनतादल यूनाइटेड (जदयू) और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) को नागवार लग रहा है। इसीलिए दोनों दलों ने कांग्रेस को दो टूक संदेश दिया है कि अगर पार्टी उन्हें विधानसभा चुनाव में साथ लेकर नहीं उतरेगी तो गुजरात के चुनाव में नीतीश कुमार और शरद पवार कांग्रेस के लिए प्रचार नहीं करेंगे।

जदयू और राकांपा से जुड़े सूत्रों के अनुसार कांग्रेस गुजरात में इन दोनों दलों के लिए विधानसभा की दो से पांच सीटें तक छोड़ने को भी तैयार होने का कोई संकेत नहीं दे रही। जबकि कांग्रेस की अगुआई में प्रस्तावित विपक्षी महागठबंधन में साथ आ रहे दलों का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा को रोकने के लिए हर चुनाव में समूचे विपक्ष के एकजुट होने का संदेश दिया जाना जरूरी है। खासतौर पर गुजरात में जो पीएम का गृह प्रदेश है, सभी विपक्षी दिग्गजों के एक साथ चुनावी मंच पर आने के अपने सियासी मायने होंगे।

सूत्र ने बताया कि प्रस्तावित महागठबंधन की रूपरेखा बनाने में अहम भूमिका निभा रहे जदयू अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सहयोगी दलों के इस रुख से कांग्रेस नेतृत्व को रूबरू कराते हुए समझाने की एक और कोशिश करेंगे।

बताया जाता है कि जदयू महासचिव केसी त्यागी और राकांपा महासचिव प्रफुल्ल पटेल ने गुजरात का दौरा करने के बाद संयुक्त रूप से कांग्रेस नेतृत्व को मिलकर चुनाव लड़ने का प्रस्ताव दिया था। दोनों दलों ने अपनी राजनीतिक हकीकत कबूल करते हुए कांग्रेस से केवल उन सीटों को छोड़ने के लिए कहा है जहां से इनके विधायक रहे हैं। लेकिन कांग्रेस ने गुजरात में इन दोनों दलों के सियासी अस्तित्व को लगभग नकारते हुए कोई सकारात्मक रुख नहीं दिखाया है।

कांग्रेस के इसी रुख की वजह से उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में रालोद के साथ गठबंधन नहीं हुआ और जदयू से भी बात नहीं बनी। इसके बावजूद गुलाम नबी आजाद ने नीतीश कुमार से उप्र चुनाव में कांग्रेस के पक्ष में प्रचार करने का अनुरोध किया था। लेकिन नीतीश ने गठबंधन नहीं होने का हवाला देते हुए इन्कार कर दिया।

राकांपा और जदयू दोनों का आकलन है कि गुजरात में विपक्षी दलों के नेताओं के एक मंच पर उतरने का लाभ कांग्रेस को मिल सकता है और इससे राष्ट्रीय स्तर पर भी विपक्षी गठबंधन को फायदा होगा। जदयू का तर्क है कि नीतीश यदि कांग्रेस का प्रचार करने जाते हैं तो गुजरात के सबसे प्रभावी पटेल समुदाय में पैठ बनाने में पार्टी को मदद मिलेगी। इसके समर्थन में जदयू का तर्क है कि पटेल समुदाय पाटीदार आंदोलन के दौरान अपने युवा नेता हार्दिक पटेल को नीतीश से मिले नैतिक समर्थन को भूला नहीं है। इसी तरह महाराष्ट्र का पड़ोसी राज्य होने के कारण शरद पवार की भी गुजरात की राजनीति में अपनी एक साख है।

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Posted By: Mohit Tanwar

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