जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। वैश्विक हालात को देखते हुए विकास दर के लक्ष्य करने में सरकार बहुत सोच-समझ कर कदम उठा रही है। आज इस बात के संकेत वित्त मंत्री अरुण जेटली ने स्वयं दिए, जब उन्होंने कहा कि भारत की आर्थिक विकास दर वर्ष 2017-18 में 7.7 फीसद ही रहेगी। इसका दूसरा मतलब यह भी है कि एनडीए के इस कार्यकाल में देश की विकास दर शायद ही आठ फीसद को छू पाये। यह स्थिति तब है जब आर्थिक सुधारों को सरकार लगातार बढ़ावा दे रही है।

वित्त मंत्री मानते हैं कि इसके लिए वैश्विक स्तर पर जिस तरह से संरक्षणवाद की नीतियों को बढ़ावा दिया जा रहा है और भू-राजनैतिक तनाव बढ़ रहे हैं, उसकी वजह से विकासशील देशों के लिए नई तरह की चुनौतियां भी पैदा हो सकती हैं।

शनिवार को न्यू डवलपमेंट बैंक (एनडीबी) की दूसरी सालाना बैठक को संबोधित करते हुए जेटली ने यह बात कही। एनडीबी का गठन भारत, चीन समेत पांच देशों के संगठन ब्रिक्स की अगुवाई में किया गया है। आने वाले दिनों में भारत एनडीबी से दो अरब डॉलर की मदद चाहता है ताकि ढांचागत क्षेत्रों को सुधारा जा सके। वैसे भारत ने एनडीबी के अलावा कई अन्य अंतरराष्ट्रीय वित्तीय एजेंसियों से भी वित्तीय मदद मांगी है।

जेटली ने बताया कि अगले पांच वर्षो में भारत को ढांचागत क्षेत्र के लिए 646 अरब डॉलर की जरूरत होगी। इसका 70 फीसद हिस्सा बिजली, सड़क और शहरी क्षेत्र में निवेश किया जाएगा। यह एनडीबी व अन्य वित्तीय एजेंसियों के लिए एक बड़ा अवसर है।

बताते चलें कि दो दिन पहले ही भारत और एनडीबी के बीच पहले वित्तीय सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर हुए हैं। यह समझौता मध्य प्रदेश में प्रमुख जिला स्तरीय सड़कों की स्थिति को सुधारने के लिए हुआ है। एनडीबी के अलावा भारत ने जापान सरकार की एजेंसी ओडीए से 21,590 करोड़ रुपये की मदद लेने का भी समझौता किया है। यूरोपियन इन्वेस्टमेंट बैंक (यूआइबी) के साथ भी भारत ने 3,150 करोड़ रुपये कर्ज लेने का समझौता किया है। यूआइबी के प्रसिडेंट वर्नर होवर ने पीएम नरेंद्र मोदी से भी मुलाकात की है।

एनडीबी के सदस्य देशों की संख्या बढ़ाने पर विचार

एनडीबी के चेयरमैन के. वी. कामथ ने संवाददाता सम्मेलन में बताया कि एनडीबी की सदस्यों की संख्या बढ़ाने पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है। नए सदस्यों के नियम अगले तीन महीनों के भीतर जारी किए जाएंगे। अभी सिर्फ ब्रिक्स देशों के पांचों देश ही इसके सदस्य हैं। नए सदस्यों में लातिनी अमेरिकी देशों के साथ ही एशिया व अफ्रीका के अन्य विकासशील देश भी इच्छुक हैं।

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Posted By: Mohit Tanwar

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