नई दिल्ली [स्पेशल डेस्क] । भारत की पहचान ऋषि और मुनियों की रही है। इसमें शक नहीं कि आज हम की तरफ ज्यादा उन्मुख हो रहे हैं। सामान्य तौर पर जिंदगी का मकसद शानोशौकत के साथ रहना हो गया है। लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं जो नजीर बन जाते हैं। उनमें  से एक हैं गुजरात के वर्शील शाह। आम तौर पर छात्र शानदार अंकों से कामायाबी हासिल करने के बाद इंजीनियर और डॉक्टर बनने का सपना देखते हैं। लेकिन वर्शील शाह की सोच और भावना बिल्कुल जुदा थी। गुजरात बोर्ड के 12वीं का परिणाम आने के बाद वर्शील ने कहा कि वो अधायत्म के रास्ते पर चलकर स्वयं के साथ लोककल्याण के लिए काम करेंगे। 

12वीं की परीक्षा में 99.99 फीसद अंक पाने वाले गुजरात के वर्शील शाह जैन संत बन गए हैं। अब वह सादा जीवन बिताएंगे और जैन । वर्शील की दीक्षा तापी नदी के किनारे । ब्रह्ममुहूर्त में ढोल नगाड़ों के साथ उनकी शाही सवारी निकाली गई। सवारी दीक्षा मंच तक पहुंची। दीक्षा मंच पर कई जैन संतों की उपस्थिति में वर्शील की दीक्षा की प्रक्रिया पूरी हुई। वर्शील की मां अमीबेन और पिता जिगरभाई शाह बेटे के फैसले से खुश हैं। जिगर शाह अहमदाबाद में आयकर विभाग में पदस्थ हैं। मां गृहिणी हैं। वे ऐसे परिवार में पले-बढ़े हैं, जहां टीवी या रेफ्रिजरेटर नहीं है। बहुत जरूरी होने पर ही बिजली का उपयोग होता है, क्योंकि शाह परिवार का मानना है कि बिजली उत्पादन के दौरान कई जलीय जीव-जंतु मारे जाते हैं।

जानकार की राय

अहिंसा विश्वभारती के संस्थापक जैन आचार्य मुनि लोकेश मुनि ने Jagran.com से खास बातचीत में बताया कि मुनि बनना अंधकार से प्रकाश की ओर जाना है। संन्यास लेना साहस का काम होता है। शरीर में सिर्फ बीमारी को डॉक्टर ठीक करता है। इंजीनियर सड़क और पुल को बनाने या मरम्मत का काम करता है। लेकिन अधायात्म से किसी भी शख्स का संपूर्ण विकास होता है। 

दीक्षा लेने से पहले वर्शील ने कहा था कि उनका लक्ष्य भौतिकवादी दुनिया की चीजों के पीछे भागना नहीं, अविनाशी शांति को पाना है। यह तभी संभव होगा जब वह अपने पीछे हर चीज को छोड़ जैन संत बनें। वह बचपन से ही वास्तविक खुशी के बारे में सोचा करते थे। 

 जानकार की राय

Jagran.com से खास बातचीत में दीपांकर ध्यान फाउंडेशन के संस्थापक और आठ वर्ष की उम्र में संन्यास लेने वाले स्वामी दीपांकर ने बताया कि आप धार्मिक दिखना चाहते हैं या धार्मिक होना चाहते हैं। धार्मिक दिखना दूसरों के लिए होता है जबकि धार्मिक होना स्वयं के लिए होता है। वर्शील शाह का फैसला दूसरों के लिए नहीं है बल्कि उसने आतंरिक खुशी के लिए अध्‍यात्‍म के रास्ते पर चलने का फैसला किया। स्वामी दीपांकर ने कहा कि ज्यादातर लोग पूरा सुख भोगने के बाद अध्‍यात्‍म की तरफ जाते हैं। लेकिन जो शुरुआत में ही अध्‍यात्‍म की तरफ उन्मुख होता है वो आंतरिक सुख चाहता है। धर्म हमारी निजता की खोज है और इसके लिए हमें अध्‍यात्‍म की तरफ जाना ही होगा। जीवन की सार्थकता के लिए परमतत्व में विलीन होना होगा जिसका रास्ता हमें अध्‍यात्‍म में मिलता है।

इसी क्रम में उनकी गुरु कल्याण रतन विजयजी महाराज से भेंट हुई। उन्होंने अर्थपूर्ण खुशहाल जिंदगी का मतलब समझाया और जैन धर्म की खूबियों के बारे में बताया। लालच तो बढ़ती ही जाती है। जिसके पास हजार है, वह लाखों कमाना चाहता है और लाखों वाला करोड़ों। इसका कोई अंत नहीं है। लेकिन, जिन जैन संन्यासियों के पास अंदर की शांति और ज्ञान के सिवा कुछ नहीं है, वे ज्यादा प्रसन्न हैं।

जानकार की राय

Jagran.com से खास बातचीत में मुनिश्री तरुण सागर जी ने कहा कि जैन धर्म तो खुद में जबरदस्त है। लेकिन वह किसी के साथ जबरदस्ती नहीं करता। वर्शील शाह ने जैन संन्यास लेकर एक आदर्श स्थापित किया है। जैन दीक्षा साधारण से असाधारण बनने की प्रक्रिया है।

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Posted By: Lalit Rai