नई दिल्ली [स्पेशल डेस्क] । उत्तर प्रदेश के शिया वक्फ बोर्ड ने 71 साल बाद बुधवार को विवादित ढांचा पर मालिकाना हक के लिए सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल की। निचली अदालत ने 30 मार्च 1946 को ढांचे को सुन्नी वक्फ बोर्ड की संपत्ति करार दिया था। सुप्रीम कोर्ट 11 अगस्त 2017 से सुनवाई करेगा। अदालत में शिया बोर्ड की ओर से अपील दायर की गई है। बोर्ड की दलील है कि ट्रायल कोर्ट ने विवादित ढांचे को सुन्नी वक्फ बोर्ड की संपत्ति घोषित कर बड़ी गलती की थी। क्योंकि वह एक शिया मुस्लिम द्वारा बनवाई गई थी। शिया वक्फ बोर्ड का कहना है कि विवादित ढांचे का निर्माण मीरबाकी ने कराया था और वो शिया मुस्लिम था। बोर्ड ने कहा कि बाबर महज पांच-छह दिन अयोध्या में रुका था, जबकि इसका निर्माण होने में समय लगा था। मंदिर तोड़कर मस्जिद का निर्माण कराया गया।

शिया बनाम सुन्नी वक्फ बोर्ड

बोर्ड ने कहा कि शिया समुदाय द्वारा मस्जिद निर्माण के बाद उसकी देखरेख की गई, लेकिन अंग्रेजी हुकूमत ने गलती से 1944 में इसमें सुन्नी वक्फ को शामिल कर दिया। फैजाबाद सिविल कोर्ट में 1945 में उसने याचिका दायर कर मस्जिद पर मालिकाना हक का दावा किया। दावे को निचली अदालत ने गलती से खारिज कर दिया, जबकि हकीकत में विवादित ढांचे पर मालिकाना हक शिया वक्फ का है।

हलफनामे में शिया वक्फ बोर्ड ने यह भी कहा कि सुन्नी वक्फ बोर्ड शांतिपूर्ण तरीके से इस विवाद का हल नहीं चाहता। हालांकि इस मसले को सभी पक्ष आपस में बैठकर सुलझा सकते हैं और इसके लिए सुप्रीम कोर्ट उन्हें समय दे। इसके लिए एक उच्चस्तरीय कमेटी बनाई जाए जिसमें सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज की अगुआई में हाई कोर्ट के दो सेवानिवृत जज, प्रधानमंत्री कार्यालय, मुख्यमंत्री कार्यालय के अधिकारी के अलावा और सभी पक्षकार भी शामिल हों।


यह था इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने 2010 में जन्मभूमि विवाद में फैसला सुनाते हुए 2.77 एकड़ जमीन को तीनों पक्षों में बांटने का आदेश दिया था। उसने जमीन को रामलला विराजमान, निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी वक्फ बोर्ड में समान रूप से बांटने का आदेश दिया था। इस फैसले के खिलाफ सभी पक्षों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की, जिस पर शीर्ष अदालत ने हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी थी।
 

 Jagran.Com से खास बातचीत में हरिशंकर जैन ने कहा कि ये शिया और सुन्नी वक्फ बोर्ड दोनों आपस में मिले हुए हैं। जानबूझकर मामले को लटकाने की कोशिश की जा रही है। दोनों बोर्ड आपस में मिलकर एक अलग तरह की राजनीति कर रहे हैं।


 क्या है अयोध्या में राम मंदिर विवाद

राम मंदिर के लिए होने वाले आंदोलन के दौरान 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद के ढांचे को गिरा दिया गया था। इस मामले में आपराधिक केस के साथ-साथ दीवानी मुकदमा भी चला। टाइटल विवाद से संबंधित मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 30 सितंबर 2010 को अयोध्या टाइटल विवाद में फैसला दिया था। फैसले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा था कि विवादित जमीन को 3 बराबर हिस्सों में बांटा जाए। जिस जगह रामलला की मूर्ति है उसे रामलला विराजमान को दिया जाए। सीता रसोई और राम चबूतरा निर्मोही अखाड़े को दिया जाए, जबकि बाकी का एक तिहाई लैंड सुन्नी वक्फ बोर्ड को दी जाए।

इसके बाद ये मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने आया। अयोध्या की विवादित जमीन पर रामलला विराजमान और हिंदू महासभा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। वहीं, दूसरी तरफ सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने भी सुप्रीम कोर्ट में हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ अर्जी दाखिल कर दी। इसके बाद इस मामले में कई और पक्षकारों ने याचिकाएं लगाई। सुप्रीम कोर्ट ने 9 मई 2011 को इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाते हुए मामले की सुनवाई करने की बात कही थी। सुप्रीम कोर्ट ने पूरे मामले पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था। सुप्रीम कोर्ट में उसके बाद से ये मामला लंबित है।

 अयोध्या विवाद : कब-कब क्या हुआ?

1528: अयोध्या में एक ऐसे स्थल पर मस्जिद का निर्माण किया गया, जिसे हिंदू भगवान राम का जन्म स्थान मानते हैं।

1853:  इस मुद्दे पर हिंदुओं और मुसलमानों के बीच पहली हिंसा हुई।

1859: ब्रिटिश सरकार ने तारों की बाड़ खड़ी करके विवादित भूमि के आंतरिक और बाहरी परिसर में मुस्लिमों और हिंदुओं को अलग-अलग प्रार्थनाओं की इजाजत दे दी।

1885: मामला पहली बार अदालत में पहुंचा। महंत रघुबर दास ने फैजाबाद अदालत में बाबरी मस्जिद से लगे एक राम मंदिर के निर्माण की इजाजत के लिए अपील दायर की।

1949 दिसंबर, 23: कुछ हिंदुओं ने मस्जिद में कथित तौर पर भगवान राम की मूर्ति रख दी। इसके बाद उस स्थान पर हिंदू पूजा करने लगे। मुसलमानों ने नमाज पढ़ना बंद कर दिया।

1950 जनवरी, 16 : गोपाल सिंह विशारद ने फैजाबाद अदालत में एक अपील दायर कर रामलला की पूजा-अर्चना की विशेष इजाजत मांगी।

1950 दिसंबर, 5 : महंत परमहंस रामचंद्र दास ने हिंदू प्रार्थनाएं जारी रखने और बाबरी मस्जिद में राममूर्ति को रखने के लिए मुकदमा दायर किया।

1959 दिसंबर, 17 : निर्मोही अखाड़ा ने विवादित स्थल हस्तांतरित करने को मुकदमा किया।

1961 दिसंबर,18 : उत्तर प्रदेश सुन्नी वक्फ बोर्ड ने बाबरी मस्जिद के मालिकाना हक के लिए मुकदमा दायर किया।

1984: विश्व हिंदू परिषद ने राम जन्मस्थान को स्वतंत्र कराने के लिए अभियान शुरू किया। एक समिति का गठन किया गया।

1986 फरवरी, 1: फैजाबाद जिला न्यायाधीश ने विवादित स्थल पर हिदुओं को पूजा की इजाजत दी। ताले दोबारा खोले गए। मुस्लिमों ने बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी का गठन किया।

1989 जून: भारतीय जनता पार्टी ने विहिप को औपचारिक समर्थन देना शुरू करके मंदिर आंदोलन को नया जीवन दे दिया।

1989 जुलाई, 1: भगवान रामलला विराजमान नाम से पांचवां मुकदमा दायर किया गया।

1989 नवंबर, 9: राजीव गांधी की सरकार ने बाबरी मस्जिद के नजदीक शिलान्यास की इजाजत दी।

1990 सितंबर, 25: भाजपा अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने गुजरात के सोमनाथ से उत्तर प्रदेश के अयोध्या तक रथयात्र निकाली।

1990 नवंबर: आडवाणी को बिहार के समस्तीपुर में गिरफ्तार कर लिया गया। भाजपा ने वीपी सिंह की सरकार से समर्थन वापस ले लिया। सिंह ने बाद में इस्तीफा दे दिया।

1992 दिसंबर, 6: हजारों की संख्या में कार सेवकों ने अयोध्या पहुंचकर विवादित ढांचे को गिरा दिया। इसके बाद सांप्रदायिक दंगे हुए। जल्दबाजी में एक अस्थाई राम मंदिर बनाया गया।

2002 जनवरी : प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अयोध्या विभाग शुरू किया। इसका काम विवाद सुलझाने के लिए हिंदुओं और मुसलमानों से बातचीत करना था।

2003 मार्च-अगस्त: इलाहबाद उच्च न्यायालय के निर्देशों पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने अयोध्या में उत्खनन किया। पुरातत्व सर्वेक्षण ने कहा कि मस्जिद के नीचे मंदिर के अवशेष मिले हैं।

2010 सितंबर, 30: इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए राम जन्मभूमि को तीन बराबर हिस्सों में बांटने का आदेश दिया।

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Posted By: Lalit Rai

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