नई दिल्ली, [डॉ. आरके मनी/ डॉ. पीके कोहली]। भारी विरोध के चलते प्रस्तावित राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) विधेयक को संसद की स्थायी समिति के पास भेज दिया गया है। सरकारों ने स्वास्थ्य क्षेत्र की लगातार उपेक्षा की है। जीडीपी में सेहत के लिए जो आवंटन किया जाता है, वह मुश्किल से देश की तीस फीसद आबादी को ही मिल पाता है, बाकी हिस्से को निजी क्षेत्र के भरोसे छोड़ दिया जाता है। भारत का ग्रामीण इलाका चिकित्सा संसाधनों, बुनियादी ढांचे और प्रशिक्षित पेशेवरों की भारी कमी से जूझ रहा है। निगरानी की खातिर उचित इंतजाम न होने की वजह से चिकित्सा सेवा क्षेत्र अपनी खामियों को लेकर लगातार सुर्खियों में रहता है। हालांकि इस क्षेत्र के लिए नियामकीय तंत्र मौजूद है, लेकिन उसका क्रियान्वयन ढीला-ढाला है, लेकिन अब हम ऐसी हालत में हैं जहां आधी-अधूरी नीतियां, अतिरंजित नियमन और अत्यधिक हस्तक्षेप से उन अच्छी चीजों के भी नष्ट होने का खतरा बना हुआ है, जिसे तमाम अनदेखी के बावजूद दशकों में तैयार किया गया है।

इलाज बीमारी से बदतर

डॉ. रॉय चौधरी के नेतृत्व वाली पूर्व की एक स्थायी समिति ने निष्क्रिय भारतीय चिकित्सा परिषद (एमसीआइ) में सुधार की सिफारिश की थी, न कि इसे पूरी तरह से खत्म करने को कहा था। चूंकि विधेयक को कथित रूप से भ्रष्ट एमसीआइ में सुधार के मकसद से तैयार किया गया है, लेकिन बिल का मसौदा बताता है कि इलाज बीमारी से भी बदतर साबित हो सकता है।

विधेयक के उद्देश्यों में चिकित्सा शिक्षा प्रणाली में सुधार, मेडिकल पेशे में गुणवत्ता एवं नैतिक मानदंडों को सुनिश्चित करने, शोध को बढ़ावा देने, बदलती जरूरतों को अपनाने और प्रभावी शिकायत निवारण तंत्र मुहैया कराने की बात कही गई है। मगर इसमें कई खामियां मौजूद हैं। मेडिसिन और इसके सभी शाखाओं, सर्जरी एवं प्रसूति विज्ञान को आधुनिक वैज्ञानिक मेडिसिन के तौर पर परिभाषित किया गया है, लेकिन इसमें वेटेनरी मेडिसिन और सर्जरी शामिल नहीं है।

विधेयक पर उठते सवाल

विधेयक में कई मसलों को गोलमोल कर दिया गया है। आयोग की टीम में गैर-पेशेवर लोगों मसलन कैबिनेट सचिव, नीति आयोग के सीईओ, कानून, अर्थशास्त्र एवं विज्ञान के विशेषज्ञों के साथ केवल दो मेडिकल विशेषज्ञों को शामिल करने की बात कही गई है। यह वाकई अप्रत्याशित है। विधेयक के क्लॉज 11 के मुताबिक आयोग में सरकार द्वारा नामित लोगों का वर्चस्व बना रहेगा। प्रस्तावना में बताए गए उद्देश्यों के लिए यूजीसी, आइआइटी, आइआइएम और आइआइएस के लोगों को जगह देने का तर्क समझ से परे है। इसके अलावा निजी हेल्थकेयर को पूरी तरह से नजरअंदाज किया गया, जबकि भारतीय स्वास्थ्य क्षेत्र को वैश्विक पटल पर जगह दिलाने में निजी क्षेत्र की अहम भूमिका रही है।

यह स्वीकार्य नहीं है कि 12 पदेन सदस्यों में से 11 सरकारी क्षेत्र के होंगे। एकमात्र नाम ट्रस्ट हॉस्पिटल का है, जैसे टाटा मेमोरियल अस्पताल। वैसे इसका भी नियंत्रण सरकार द्वारा किया जाता है। तीन अंशकालिक सदस्यों की नियुक्ति प्रबंधन, कानून, मेडिकल एथिक्स, हेल्थ रिसर्च, कंज्यूमर और मरीजों के अधिकारों की वकालत करने वाले, विज्ञान, टेक्नोलॉजी और अर्थशास्त्र जैसे क्षेत्रों से किया जाना है। सोचिए मेडिकल शिक्षा, प्रशिक्षण एवं संचालन में इनकी क्या प्रासंगिकता हो सकती है? शिक्षा और शोध संबंधी मसलों पर हेल्थकेयर नीति एवं नियमन में काफी झोल है।

हेल्थकेयर नीति में संघीय ढांचे की अनदेखी करते हुए किसी भी समय केवल 5 राज्यों को ही प्रतिनिधित्व दिया जाएगा, जो असंवैधानिक है। एक अन्य प्रावधान के मुताबिक ग्रेजुएशन के बाद डॉक्टरों को एक परीक्षा देनी होगी जिसके बाद उन्हें प्रैक्टिस के लिए लाइसेंस दिया जाएगा। पहले से ही अधिक बोझ वाले मेडिकल ग्रेजुएट प्रोग्राम में एक अतिरिक्त परीक्षा थोपना हैरान करने वाला है। पीजी की प्रवेश परीक्षा को खत्म करने का कोई फायदा नहीं होगा। इससे मेडिकल के छात्र आगे की पढ़ाई का विकल्प छोड़ सकते हैं। जो इस परीक्षा को पास नहीं कर पाएंगे उन्हें मेडिकल स्कूल में 5 साल बिताने के बाद भी बेरोजगारी झेलनी पड़ेगी और इससे प्रतिभावान उम्मीदवार हतोत्साहित होंगे।

एलोपैथी का इजाजत क्यों

आयुष डॉक्टरों को ‘ब्रिज कोर्स’ के बाद एलोपैथी दवाई लिखने की अनुमति देना कितना उचित होगा। विधेयक का क्लॉज 63(3) बताता कि सरकार संवैधानिक या अन्य निकाय से किसी भी श्रेणी में चिकित्सा योग्यता के लिए क्वालीफिकेशन सूची जोड़ सकती है। इसे आयुष को आधुनिक मेडिसिन या एलोपैथी के बराबर करने के कदम के तौर पर देखा जा रहा है, जो पूरी तरह से देश में आधुनिक चिकित्सा प्रणाली को कमजोर करने वाला है। स्वदेशी और आधुनिक प्रणाली को एक करने के लिए ‘ब्रिज कोर्स’ सेब और संतरे को एक समान करने की तरह है। ब्रिज कोर्स से सभी आयुष डॉक्टरों को आधुनिक मेडिसिन के लिए भी पात्र मानना अनैतिक और खतरनाक है। अगर आप किसी को आयुर्वेद के बाद एलोपैथी की इजाजत देंगे तो वह आयुर्वेद क्यों करेगा। आयुर्वेद और होम्योपैथी के डॉक्टरों को ब्रिज कोर्स करा कर एलोपैथी की इजाजत क्यों दी जा रही है।

जिन लोगों ने चार साल लगाकर अपनी होम्योपैथी और आयुर्वेद की पढ़ाई की है, आप उन्हेंनौकरियां क्यों नहीं मुहैया करा पा रहे हैं। वे आगे अपना रिसर्च क्यों न करें, आप उन्हें एलोपैथी का डॉक्टर क्यों बना रहे हैं। जहां एक तरफ मेडिकल नेगलिजेंस की घटनाएं डॉक्टरों से हो रही हैं, ऐसे में कुछ महीने या एक साल का कोर्स करके वे क्या सेवा दे पाएंगे? जो लोग इतनी मुश्किल परिक्षाएं पास करके डिग्री लेंगे, उनके लाइसेंस के लिए आप परीक्षा रख रहे हैं, लेकिन वहीं ब्रिज कोर्स लाकर आप किसी को एलोपैथी प्रेक्टिस करने की इजाजत दे रहे हैं। यह स्वास्थ्य क्षेत्र में सुरक्षा और गुणवत्ता को लेकर एक तरह का समझौता है, जो लाखों अनभिज्ञ मरीजों के जीवन को जोखिम में डाल सकता है। यह अनियंत्रित झोला छाप डॉक्टरों को संस्थागत बनाने के अलावा और कुछ नहीं है।

(डॉ. आरके मनी नयति हेल्थकेयर के सीईओ हैं और डॉ. पीके कोहली मेडिकल एजुकेशन, नयति हेल्थकेयर के डीन हैं)

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Posted By: Abhishek Pratap Singh