मोदी सरकार - 2.0 के 100 दिन

नई दिल्ली, [दिगपाल सिंह]। चिंता को तलवार की नोक पर रखे वो राजपूत... रेत की नाव लेके समुद्र से शर्त लगाए वो राजपूत... और जिसका सर कटे फिर भी धड़ दुश्मन से लड़ता रहे वो राजपूत...

करणी सेना के 'वीर सैनिकों' एक राजपूत होने के नाते आपसे बात करने की चाहत कई दिनों से दिल में थी, लेकिन सोच रहा था कब कैसे और कहां आपसे बात करूं। आखिरकार मुझे लगा कि अब आप लोगों से बात करने का यह बिल्कुल सही वक्त है। फिल्म पद्मावती को लेकर आपका गुस्सा पिछले करीब चार-पांच महीने से बना हुआ है, आपके इसी गुस्से की वजह से फिल्म की रिलीज को भी टालना पड़ा और आखिरकार फिल्म का नाम भी बदल कर पद्मावती से पद्मावत कर दिया गया।

मुझे यह कहने में बिल्कुल भी गुरेज नहीं है कि आपकी जिद के चलते ही फिल्म निर्माता संजय लीला भंसाली ने अखबारों में बड़े-बड़े विज्ञापन दिए।

इन विज्ञापनों में बताया गया कि उनकी यह फिल्म मलिक मोहम्मद जायसी की रचना पद्मावत पर आधारित है, फिल्म में राजपूतों के इतिहास से किसी तरह की कोई छेड़छाड़ नहीं की गई है और यह राजपूतों की वीरता का पूरा सम्मान करती है।

करणी सेना के 'वीर सैनिकों' देश के सुप्रीम कोर्ट ने आगामी 25 जनवरी को फिल्म को देशभर में रिलीज करने की अनुमति दे दी है, लेकिन आप लोगों की गुंडई से डरी हुई कई सरकारों ने और सिनेमाघरों में फिल्म प्रदर्शित नहीं करने का मन बनाया है। हालांकि जिस स्तर की फिल्म को बताया जा रहा है, यह फैसला उन्होंने बेमन ही लिया है यह बात किसी से छिपी नहीं है। यह सब आपके डर की वजह से है। यह बात तो स्पष्ट है कि आप लोगों के द्वारा फैलाए जा रहे डर और उपद्रव की वजह से इन लोगों ने फिल्म से किनारा करने का मन बनाया है। उनका यह डर जायज भी है। कितना जायज है इसका नजारा आपने मंगलवार को अहमदाबाद में दिखा भी दिया।

इससे पहले आपने बिहार के मुजफ्फरपुर में भी सिनेमाघरों में तोड़-फोड़ करके अपनी गुंडई का परिचय आप लोग दे ही चुके हैं। दिल्ली से सटे गुड़गांव में भी आप लोगों ने जमकर गुंडई की और सिनेमाघरों में तोड़फोड़ मचाई। मध्यप्रदेश, राजस्थान, उत्तरप्रदेश हर जगह आपकी सेना की 'वीर सैनिक' उपद्रव मचा रहे हैं।

‌पता नहीं आप लोग किस वजह से फिल्म का विरोध कर रहे हैं। मैं तो यह भी नहीं जानता कि आप लोगों ने फिल्म देखी भी है या नहीं। वैसे बता दूं कि जिस किसी ने भी यह फिल्म देखी है वह यही कहता सुनाई दे रहा है कि इस फिल्म को देखने के बाद आपके दिल में अलाउद्दीन खिलजी के खिलाफ नफरत और बढ़ जाएगी। यही नहीं राजा रतन सिंह और रानी पद्मावती को इतने बेहतरीन अंदाज से फिल्म में दर्शाया गया है कि इन दोनों की वीरता की कहानी जैसी आपको इतिहास में दिखाई और पढ़ाई गई थी, वैसा ही कुछ फिल्म में भी दर्शाया गया है।

चाहे गोरा-बादल हों, चाहे राजा रतन सिंह या फिर रानी पद्मावती किसी के भी सम्मान के साथ फिल्म में कोई समझौता नहीं किया गया है। हां आपका एक दर्द था कि इस फिल्म में अलाउद्दीन खिलजी को हीरो की तरह दर्शाया गया है, माफ कीजिए ऐसा कुछ नहीं है। अलाउद्दीन खिलजी के किरदार को बड़ा जरूर दिखाया गया है, लेकिन फिल्म के हर एक सीन में उसकी क्रूरता और धूर्तता नजर आती है। उस किरदार को रणवीर सिंह ने इस तरह से पर्दे पर उतारा है कि आपको अलाउद्दीन खिलजी से नफरत... बेहद नफरत हो जाएगी। इसके लिए आपको फिल्म का या फिल्म के किसी व्यक्ति के खिलाफ विरोध करने की जरूरत नहीं है, बल्कि अलाउद्दीन खिलजी के प्रति नफरत पैदा करने के लिए आपको रणवीर सिंह की तारीफ करनी चाहिए, क्योंकि उन्होंने उस किरदार को ऐसे जिया है जैसे वह स्वयं अलाउद्दीन खिलजी हो। वैसे भी कहा जाता है कि किसी फिल्म का विलेन उसके लिए आपके दिल में नफरत पैदा कर दे तो समझिए कि उस एक्टर ने अपनी एक्टिंग के साथ न्याय किया है। इस मामले मैं भी आपकी कोई दलील काम नहीं आएगी और आप जो यह उपद्रव फैला रहे हैं वह बेजा है।

अब बात मंगलवार शाम आप लोगों ने अहमदाबाद में जो किया उसको लेकर। मैं नहीं जानता यह बात कहां तक सच है कि अहमदाबाद में आप लोगों ने उपद्रव मचाया हो सकता है, हो सकता है करणी सेना के नाम पर कुछ दूसरे उपद्रवी तत्वों ने यह सब किया हो, लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि अगर ऐसा है तो वह भी आपकी वजह से ही हुआ है। अगर आप इस तरह के उग्र प्रदर्शन और धमकी नहीं देते तो शायद कोई और आपके विरोध का इस तरह से फायदा नहीं उठाता। अगर यह आप लोगों ने किया है तो यह आप लोगों के लिए शर्मनाक है। फिल्म के विरोध का यह कौन सा तरीका है कि आप लोगों ने वहां खड़ी बीसियों गाड़ियों को आग लगा दी। कई शोरूम में तोड़फोड़ की और खबरें तो यहां तक हैं कि कई दुकानों से सामान भी चोरी किया गया। क्या यही आपका विरोध है। क्या फिल्म के विरोध के नाम पर आप इसी तरह की लूटपाट करना चाहते हैं। क्या यह सब करने की आपको छूट होनी चाहिए।

अगर अब भी आप नहीं समझे तो समझ जाएं, हो सकता है आपके इस विरोध का कोई अन्य फायदा उठा रहा हो। आपको जरूरत है एक बार फिल्म को रिलीज होने दें, आर उसे देखें। उसके बावजूद अगर आपको फिल्म की कहानी उसके किरदारों आदि को लेकर कोई भी दिक्कत है, परेशानी है तो आप अपनी आवाज बुलंद कर सकते हैं। लेकिन बिना देखे सुनी-सुनाई कहानियों पर कुछ भी कहना, कुछ भी करना, विरोध करना, तोड़फोड़ मचाना... लोकतंत्र नहीं, अभिव्यक्ति की आजादी नहीं है। ऐसा करके आप न सिर्फ अपने और राजपूतों की वीरता का बल्कि देश के लोकतंत्र का सुप्रीम कोर्ट का भी अपमान कर रहे हैं।

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Posted By: Abhishek Pratap Singh

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