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नई दिल्ली (जेएनएन)। दुनिया के 184 देशों के पंद्रह हजार से ज्यादा वैज्ञानिकों ने बढ़ती आबादी और प्रदूषण के चलते बदलते वातावरण को मानव अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया है। इन वैज्ञानिकों ने सोमवार को एक पत्र जारी करके लोगों को चेतावनी दी है कि अगर वे अभी भी नहीं संभले तो दुनिया को बचाना बहुत मुश्किल हो जाएगा। 25 साल पहले भी 1700 वैज्ञानिकों ने लोगों को सजग रहने की चेतावनी दी थी। लेकिन इन वर्षों में हालात और बिगड़े हैं। वैज्ञानिकों की यह चेतावनी बायोसाइंस जर्नल में प्रकाशित हुई है।

खतरे की घंटी
1992 में यूनियन ऑफ कंसन्र्ड साइंटिस्ट्स के 1,700 वैज्ञानिकों ने चेतावनी देते हुए पहला पत्र जारी किया था। तब से अब तक पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले सभी प्रमुख कारण गंभीर रूप से बढ़े हैं। वैज्ञानिकों ने इस पत्र में लिखा है कि समय तेजी से बीता जा रहा है। हमें तत्काल चेत जाना चाहिए, कहीं ऐसा न हो कि देरी हो जाए।

धरती को उजाड़ रही ग्लोबल वार्मिंग

कार्बन उत्सर्जन बढ़ने से ग्लोबल वार्मिंग की समस्या विकराल होती जा रही है। इसकी प्रमुख वजहें हैं- जीवाश्म ईंधन का प्रयोग, गैर पर्यावरणीय खेती और जंगलों की कटाई। इसका नतीजा यह है कि लोगों को पीने को साफ पानी नहीं मिल रहा है, समुद्री जीव-जंतु खत्म हो रहे हैं और समुद्र में जीवन रहित क्षेत्र बढ़ रहा है।

सामूहिक विलुप्ति की ओर दुनिया
ग्रीनहाउस गैसों के प्रयोग से जलवायु में खतरनाक बदलाव दर्ज किया जा रहा है। पर्यावरण पर मानव के बढ़ते हस्तक्षेप से जीव-जंतु अभूतपूर्व गति से खत्म हो रहे हैं। दुनिया का छठा विनाश काल शुरू हो चुका है। इस सदी के अंत तक ढेरों जीव-जंतु इसमें समा जाएंगे।

इकलौती उपलब्धि
एक-चौथाई सदी में दुनिया ने सिर्फ यह उपलब्धि हासिल की है कि ऐरोसोल स्प्रे और प्रदूषकों का प्रयोग कम करके ओजोन परत के छेद को बंद कर दिया गया।

बढ़ती आबादी करेगी नुकसान
दुनिया की आबादी में विस्फोटक रुप से इजाफा हुआ है। 25 वर्षों में जनसंख्या 35 फीसद (दो अरब) बढ़ी है। वैज्ञानिकों के मुताबिक बढ़ती आबादी पर्यावरण और जीवन के लिए अच्छा संकेत नहीं है। इसके चलते जनसंख्या और खाद्यान्न में असंतुलन बढ़ेगा। सामाजिक और पारस्थितिकीय ताना-बाना छिन्न-भिन्न होने का खतरा पैदा होगा।

उम्मीद अभी भी बाकी है
वैज्ञानिकों ने कुछ उपाय सुझाए हैं, जिनसे अभी भी पर्यावरण और जीवन को सहेजा जा सकता है।

-जनसंख्या वृद्धि रोकने के उपाय किए जाएं।
-शाकाहार को बढ़ावा दिया जाए।
-नवीकरणीय ऊर्जा पर जोर हो और जीवाश्म ईंधन का प्रयोग घटाया जाए।
-आर्थिक असमानता से निपटने के उपाय हों।
-मूल्य निर्धारण, करारोपण व अनुदान पर्यावरण पर पड़ने वाले भार के उपयुक्त हों।
-प्रकृति व पर्यावरण संरक्षण के लिए एक निश्चित भूभाग हो।

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Posted By: Srishti Verma

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