नई दिल्ली, [स्पेशल डेस्क]। अंतरिक्ष विज्ञान यानी खगोल शास्त्र दिनों दिन प्रगति कर रहा है। लगातार नए ग्रह, नए तारामंडल, नई गैलेक्सियां और नए-नए ग्रह ढूंढे जा रहे हैं। कई ग्रह तो धरती से इतने मिलते-जुलते हैं कि वैज्ञानिकों को उन पर किसी न किसी रूप में जीवन के होने की उम्मीद है। अंतरिक्ष विज्ञान में भारत का भी खासा महत्व है। धरती की कक्षा में उपग्रह स्थापित करने से लेकर चंद्रयान और मंगलयान इसरो की उपलब्धियों को बताता हैं। लेकिन आधुनिक भारत में इसरो के गठन से भी काफी पहले सन 5वीं-6ठी सदी में भारत का खगोल शास्त्र दुनिया को अंतरिक्ष के बारे में गूढ़ ज्ञान दे रहा था।

 

आर्यभट्ट की चमक थी चहूं ओर

सन् 476 से 550 भारत के महान गणितज्ञ और खगोल विज्ञानी आर्यभट्ट ने खगोल शास्त्र को एक नया आयाम दिया। जब वे सिर्फ 23 साल के थे तब उन्होंने सन् 499 में आर्यभट्टीय की रचना की और बाद में आर्य-सिद्धांत भी रचा। आर्यभट्ट ने अपने जन्मस्थान के बारे में लिखा है कि वह कुसुमपुरा (पाटलीपुत्र) यानी मौजूदा पटना, बिहार में पैदा हुए थे। आर्यभट्ट ने ही पाई का मान निकाला था जो आज 1500 साल बाद भी ज्यो का त्यों मान्य है। आर्यभट्ट ने खगोलीय गणनाओं के लिए पटना में एक वेदशाला भी बनाई थी। बल्कि जिस स्थान पर आर्यभट्ट खगोलीय गणनाओं को अंजाम देते थे उस जगह को ही लोगों ने खगोल कहना शुरू कर दिया था जो कालांतर में अपभ्रंश होकर खगौल बन गया।

 

कहां है खगौल?

बिहार की राजधानी पटना के पास दानापुर रेलवे स्टेशन के चारों तरफ का क्षेत्र खगौल के नाम से प्रसिद्ध है। दानापुर रेलवे स्टेशन से सटे दक्षिण चक्रदाहा क्षेत्र में आर्यभट्ट की खगोलीय वेधशाला (एस्ट्रोनोमिकल ऑब्जर्वेटरी) स्थित थी। इस कारण क्षेत्र का नामकरण खगोल हुआ, जो वर्तमान में अपभ्रंश ‘खगौल’ के नाम से प्रसिद्ध है। खगौल का खगोल शास्त्र से काफी गहरा संबंध है। आर्यभट्ट ने यहीं पर अपने विश्व प्रसिद्ध ग्रंथ 'आर्यभट्टीय' की रचना की थी। खगौल पटना शहर से करीब 13 किलोमीटर दूर स्थित है। यहां जाने के लिए पटना जंक्शन से बस और ऑटो की सुविधा है। इसके अलावा दानापुर स्टेशन से ऑटो व रिक्शे से भी आप यहां पहुंच सकते हैं।

 

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शून्य भी आर्यभट्ट ने ही खोजा

आर्यभट्ट एक महान गणितज्ञ और खगोल विज्ञानी थे। उन्होंने ही शून्य के सिद्धांत का आविष्कार किया था। आज जिस क्षेत्र को खगौल नाम से जाना जाता है यहीं पर आर्यभट्ट ने बीजगणित (अलजेबरा), रेखागणित (ज्योमेट्री) और त्रिकोणमिति (ट्रिगोनोमेट्री) के मूल सिद्धांतों की रचना की थी। उन्होंने ही पांचवीं शताब्दी में सबसे पहले पाई का मान निकाला था जो आज भी मान्य है।

 

 

भारत ने जब 1975 में अपना पहला उपग्रह धरती की कक्षा में छोड़ा उसका नाम महान गणितज्ञ आर्यभट्ट के सम्मान में उनके ही नाम पर रखा। पटना के आम लोगों और पटना घूमने-फिरने या किसी काम से भी आने वाले लोगों के बीच इस जगह के बारे में जानने की उत्सुकता देखी जाती है। खास तौर पर शोध से जुड़े छात्र इसमें गहरी रुचि लेते हैं। 

 

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Posted By: Digpal Singh