नई दिल्ली [स्पेशल डेस्क] । करीब दो महीने से ज्यादा चली तनातनी के बाद डोकलाम के मुद्दे पर भारत को चीन पर जबरदस्त कूटनीतिक जीत हासिल हुई। चीन पहली बार डोकलाम के मुद्दे पर झुकने को मजबूर हुआ है। दोनों देशों ने अपनी सेनाओं को धीरे-धीरे हटाने का फैसला किया है। आप को कुछ बिंदुओं के जरिए बताने की कोशिश करेंगे कि भारत ने किस तरह से कूटनीतिक प्रयासों के जरिए चीन पर बढ़त हासिल की।  

- ब्रिक्स सम्मेलन से पहले दोनों देशों के बीच विवाद सुलझा

- विदेश मंत्रालय ने प्रेस रिलीज के जरिए दी जानकारी

- चीन से कूटनीतिक बातचीत जारी - भारतीय विदेश मंत्रालय

- धीरे धीरे डोकलाम से हटेगी भारतीय सेना

- 3-5 सितंबर तक चीन में होने वाले ब्रिक्स सम्मेलन में पीएम मोदी होंगे शामिल

- दोनों देशों के बीच कूटनीतिक स्तर पर चल रही थी बातचीत

- डोकलाम पर भारत की जबरदस्त जीत, पीछे हटने को तैयार चीन

- आप को याद होगा कि जून के महीने में जब इस तरह की खबर आई कि भारत, भूटान, और चीन ट्राइ जंक्शन यानि डोकलाम में चीनी सेना भूटान के विरोध के बाद सड़क बना रही है तो भूटान की तरफ से कड़ी प्रतिक्रिया आई। भूटान सरकार की मांग पर भारत ने अपने कुछ सैनिकों को भेजा जिनकी चीनी सैनिकों के साथ धक्कामुक्की हुई। चीन को अंदाजा नहीं था कि भारत इस तरह से अपनी प्रतिक्रिया देगा।

- डोकलाम के मुद्दे पर चीनी सरपरस्ती में ग्लोबल टाइम्स जहर उगलने लगा। भारत को नसीहत के साथ साथ 1962 की लड़ाई की याद दिलाई जाने लगी। चीन स्पष्ट रूप से ये कहने लगा कि भारत को बचकाना हरकतों से बचना चाहिए। लेकिन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि चीन को भी याद रखना चाहिए कि अाज का भारत 2017 का भारत है। चीन को 1962 की यादों से बाहर निकलना चाहिए। 

- दोनों देशों के बीच तनातनी के बीच चीनी सैनिकों ने न केवल उत्तराखंड के बाड़ाहोती में घुसपैठ की कोशिश की बल्कि लेह लद्दाख के पैंगोंग झील के तटवर्ती इलाकों में भी घुसपैठ की। लेकिन भारतीय फौज ने चीनी मंसूबों को नाकाम कर दिया। 

- अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चीन पर दबाव बनने लगा कि वो हठधर्मिता छोड़कर भारत के साथ शांतिपूर्ण ढंग से मामले को सुलझाए। इस बीच भूटान ने साफ कर दिया था कि चीन ने अवैध ढंग से भूटानी जमीन पर कब्जा कर रहा है। चूंकि भूटान एक संप्रभु देश है लिहाजा वो अपनी सुरक्षा के मद्देनजर फैसले लेने के लिए स्वतंत्र है। 

डोकलाम के मुद्दे पर चीन और भारत के बीच पिछले दो महीने से तनातनी चल रही थी। लेकिन भारत के कूटनीतिक प्रयासों के जरिए चीन के रुख में नरमी आती नजर दिखी। चीन ने पहली बार यह स्वीकार किया कि डोकलाम को लेकर उसका भूटान के साथ विवाद है। साथ ही उसने भारत को सलाह दी थी कि वह इस मामले में तीसरे पक्ष के तौर न कूदे। चीन ने भारत से बिना शर्त डोकलाम से अपनी सेना हटाने को कहा। इन सबके बीच ये बड़ा सवाल था कि चीन के रुख में नरमी क्यों आई ? क्या भारतीय एनएसए अजीत डोभाल के बीजिंग दौरे के बाद चीनी रुख में ये बदलाव आया है या चीन को अपने व्यवसायिक हितों की चिंता है? या चीन को लगने लगा है कि अब मौजूदा भारत 1962 का भारत नहीं है। लेकिन एक बात तो साफ है कि डोकलाम के मुद्दे पर चीन जिस तरह से भारत पर दबाव बना रहा था, उसके पीछे कोई ठोस आधार नहीं था। चीन एक तरफ भारत के साथ शाश्वत मित्रता की बात करता रहा है, साथ ही भारत को धमकी भी देता रहता है।

चीन अब तक डोकलाम को अपना क्षेत्र बताता था और इस विवाद के संदर्भ में भूटान का जिक्र करने से भी बचता था। चीन के विदेश मंत्रालय ने दस्तावेज जारी कर कहा था कि चीन और भूटान का सीमा विवाद है। दोनों देश इस मुद्दे पर बातचीत कर रहे हैं। भारत को तीसरे पक्ष के रूप में चीन-भूटान के बीच सीमा बातचीत में दखल नहीं देना चाहिए। डोकलाम में सड़क निर्माण को लेकर उसने भारत को पहले ही बता दिया था। चीन ने कहा है कि संबंधों को सामान्य बनाने की ठोस कार्रवाई के तौर पर भारत डोकलाम से सेना हटाए। सीमा पर व्याप्त गतिरोध को खत्म करने के लिए कोई शर्त न जोड़ी जाए। भारत के चार सौ सैनिक बुलडोजर लेकर घुसे बावजूद इसके चीन संयम दिखा रहा है।

 

एनएसए डोभाल की कोशिश लाई रंग

चीनी विदेश मंत्रालय ने 28 जुलाई को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की अपने चीनी समकक्ष यांग जिएची से बीजिंग में हुई बातचीत की थी। चीनी विदेश मंत्रालय का कहना था कि दोनों देशों के बीच वार्ता में जिएची ने चीन के क्षेत्र से भारतीय सेना के हटने की स्पष्ट अपेक्षा जता दी थी। वार्ता में जिएची ने अनुरोध किया कि भारत-चीन की संप्रभुता का सम्मान करे और अंतरराष्ट्रीय कानून को मानते हुए तत्काल वहां से सेना हटाए। भारत की स्थिति विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने संसद में बहस के दौरान साफ कर दी थी कि भारत की सेना तभी वापस आएगी, जब चीन की भी पूर्व स्थिति में लौटेगी। इसके बाद डोकलाम की स्थिति पर दोनों देश वार्ता करेंगे।

जानकार की राय

Jagran.Com से खास बातचीत में रक्षा मामलों के जानकार राज कादयान ने कहा कि चीन की बेजा दबाव बनाने की आदत शुरू से रही है। उत्तेजक बयानों के जरिए चीन अपने पड़ोसियों को भड़काने की कोशिश करता है। लेकिन डोकलाम का मुद्दा हो या सीपेक का मामला भारत ने पहले दिन ही साफ कर दिया कि वो अपनी संप्रभुता के साथ किसी तरह की चाल को बर्दाश्त नहीं करेगा। इसके अलावा वो अपने मित्र देशों की संप्रभुता का ख्याल करते हुए उन्हें मुश्किल हालात में मदद भी करता रहेगा।

चीन के लिए फांस बन चुका था डोकलाम

डोकलाम का मामला अब चीन के राजनैतिक नेतृत्व के लिए मुश्किल होता जा रहा था। ईस्ट और साउथ चाइना सी में चीन लगातार अंतरराष्ट्रीय दबाव को खारिज कर अपनी मनमर्जी चलाता है। लेकिन भारत पर वो अपना दबाव नहीं बना पा रहा था । डोकलाम इलाके से भारत एक इंच भी पीछे हटने को तैयार नहीं था। इस साल के अंत तक चीन की सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी का एक अहम सम्मेलन भी होने वाला है। चीनी विश्लेषकों का कहना है कि पार्टी में एक धड़ा ऐसा है, जो सैन्य हस्तक्षेप के जरिए डोकलाम मुद्दे का हल निकालने की मांग कर रहा है। इस वजह से चिनफिंग पर दबाव बढ़ गया।
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Posted By: Lalit Rai