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सिर्फ एक संकल्प लें और यहां हर तरह की बीमारी का मुफ्त इलाज पाएं

Publish Date:Fri, 07 Jul 2017 03:10 PM (IST) | Updated Date:Fri, 07 Jul 2017 06:22 PM (IST)
सिर्फ एक संकल्प लें और यहां हर तरह की बीमारी का मुफ्त इलाज पाएंसिर्फ एक संकल्प लें और यहां हर तरह की बीमारी का मुफ्त इलाज पाएं
इलाहाबाद स्थित मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज की अनूठी पहल, देहदान करने वाले की हर बीमारी का होगा मुफ्त इलाज।

नई दिल्ली, [स्पेशल डेस्क]। 'रक्त दान, जीवन दान' तो आपने सुना ही होगा। देश और दुनियाभर में तमाम सरकारें लोगों को रक्तदान के लिए प्रेरित करती रहती हैं। इसी तरह से अंगदान करने के लिए भी समय-समय पर नागरिकों को प्रेरित किया जाता है। जैसे आई डोनेशन (आंख दान) करने की मुहिम के लिए ऐश्वर्या राय के चेहरे का इस्तेमाल किया गया। इसी तरह से शरीर के अन्य अंग भी दान किए जा सकते हैं, जिनमें दिल, गुर्दे, फेफड़े आदि भी शामिल हैं। इसके अलावा कई लोग देहदान भी करते हैं। हालांकि इसके लिए प्रचार-प्रसार उस स्तर पर नहीं होता है।

देहदान व नेत्रदान को बढ़ावा देने और इसके प्रति समाज को जागरुक करने के मकसद से इलाहाबाद स्थित मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज एक अनूठी पहल करने जा रहा है। यह है नेत्रदान व देहदान की घोषणा करने वालों का मुफ्त इलाज। देशहित और जनहित में यह अनूठी पहल उस दिन होगी, जिस दिन भारत ने आजाद हवा में सांस ली थी, यानि 15 अगस्त से। इस तरह का संकल्प लेने वाले का एक पहचान पत्र बनाया जाएगा। भविष्य में अगर वह कभी बीमार पड़ता है तो अपना पहचान पत्र दिखाकर मेडिकल कॉलेज से संबद्ध अस्पतालों में हर बीमारी का मुफ्त इलाज करा सकेगा। इसमें दवा से लेकर खाने-पीने की व्यवस्था मेडिकल कॉलेज प्रशासन सुलभ कराएगा।

इलाहाबाद में देहदान व नेत्रदान का संकल्प लेने वालों को मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज से जुड़े स्वरूपरानी नेहरू चिकित्सालय, मनोहरदास नेत्र चिकित्सालय में सुविधाएं मिलेंगी। यदि एसजीपीजीआइ लखनऊ अथवा अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में इलाज की जरूरत पड़ेगी तो मेडिकल कॉलेज प्रशासन इसके लिए संपर्क कर उचित इलाज की गुजारिश करेगा। मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य एसपी सिंह कहते हैं कि इस पर आने वाले खर्च का बंदोबस्त चंदा के जरिए जुटाया जाएगा। अगर मरीज संपन्न है और वह स्वयं खर्च वहन करना चाहता है, तभी उसे इसकी छूट दी जाएगी।



सिर्फ 45 पार्थिव शरीर मिले
मेडिकल कॉलेजों में देहदान की प्रक्रिया की शुरुआत कानपुर निवासी मनोज सेंगर ने अपनी पत्नी माधवी सेंगर व परिवार के साथ 15 नवंबर 2003 से की थी। युग दधीचि देहदान अभियान के बैनर तले तत्कालीन राज्यपाल विष्णुकांत शास्त्री ने 24 व्यक्तियों को शपथ दिलाकर इसकी शुरुआत कराई थी। कानपुर मेडिकल कॉलेज को 20 अगस्त 2006 को पहली देह डेरापुर कानपुर देहात के 22 वर्षीय बउआ दीक्षित की दी गई। अब तक लगभग दो हजार लोग देहदान कर चुके हैं। मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज के एनाटॉमी डिपार्टमेंट में गुजरे 14 सालों में मात्र 45 पार्थिव शरीर ही प्राप्त हुए हैं। करीब पांच सौ लोगों ने संकल्प पत्र भरे हैं।

मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. एसपी सिंह कहते हैं नेत्र व देह का दान करने का संकल्प लेने वाले हमारे लिए वीआइपी मरीज होंगे। उनकी विशेष देखरेख की जाएगी। मैं अपनी निगरानी में उनका इलाज कराऊंगा। किसी को बाहर इलाज की जरूरत पड़ेगी तो वहां के अस्पताल प्रशासन से संपर्क करूंगा।

जानकार की राय

अंगदान के मामले पर Jagran.Com ने नोएडा स्थित प्रकाश अस्पताल के डॉक्टर वीएस चौहान (एमबीबीएस, एमएस-ऑर्थो) से बात की। डॉ. चौहान ने बताया कि हमारे देश में संस्कृति और धर्म जैसी चीजें देहदान के मामले में आड़े आती हैं। उन्होंने बताया कि संस्कृति में ऐसी चीजें नहीं होने के कारण आप किसी पर अंगदान या देहदान के लिए दबाव भी नहीं डाल सकते। क्योंकि हमारे यहां पुनर्जन्म की भी बात होती है। डॉ. चौहान ने कहा कि मरीज के ब्रेन डेड होने पर भी परिजन अंगदान के लिए तैयार नहीं होते।

लावारिश लाशों के भरोसे मेडिकल की पढ़ाई
डॉ. चौहान ने बताया कि हमारे देश में बहुत कम ही लोग हैं जो स्वेच्छा से अंगदान या देहदान करते हैं। अपनों को ही अंगदान के मामले में भी लोग पीछे हट जाते हैं। हाल के दिनों में कुछ जागरुकता आयी है, जिसके चलते लोग अब अंगदान तो कुछ हद तक करने लगे हैं, लेकिन अब भी देहदान के मामले न के बराबर हैं। मेडिकल कॉलेजों की प्रयोगशालाओं में छात्रों को प्रैक्टिकल जानकारी देने के लिए लावारिश लाशों से ही काम चलाया जाता है। लावारिश लाश के मामले में भी एक बड़ी पेचीदा कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है।

ब्लड डोनेशन तक से डरते हैं लोग
डॉ. चौहान ने कहा कि हमारे देश में तो लोग ब्लड डोनेशन तक से डरते हैं। यहां लोग आई डोनेशन भी नहीं करते। उन्होंने बताया कि हर मामले में सरकार ही कुछ करे यह जरूरी नहीं। सरकार के पास और भी ढेरों काम हैं। समाज को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए। मीडिया और एनजीओ को भी देश में ब्लड डोनेशन, अंग दान और देहदान को बढ़ावा देने के लिए लोगों को प्रेरित करना चाहिए। ताकि भविष्य में अच्छे डॉक्टर मिल सकें।

क्यों जरूरी है देहदान
चिकित्सा शिक्षा में पार्थिव शरीर आवश्यक है। छात्रों को इससे शरीर की संरचना का सही पता चलता है। किस अंग में कहां हड्डी है, नसें कहां-कहां हैं, उनका काम क्या है, इसकी जानकारी भी मिलती है। हाल के दिनों में देहदान व नेत्रदान करने वालों में इजाफा हुआ है, लेकिन यह संख्या अब भी अपेक्षा से काफी कम है।

- साथ में शरद द्विवेदी, इलाहाबाद

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Web Title:Jagran Special on Body donation and free Medical Facilities(Hindi news from Dainik Jagran, newsnational Desk)

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