शौकत अली खान

वैश्विक उद्यमशीलता शिखर सम्मेलन में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बेटी इवांका ट्रंप ने व्यवसाय में महिला भागीदारी बढ़ाने का आह्वान कर भारत के आर्थिक जगत को नया संदेश दिया है। नि:संदेह यह भारतीय महिलाओं को प्रोत्साहित करने वाली बात है, लेकिन देश में अब भी ऐसी स्थिति बनी हुई है जिससे महिलाएं सार्वजनिक जीवन से दूर रह जाती हैं। बहरहाल भारत के उद्योग जगत में कई महिलाएं शीर्ष स्थान पर काबिज हैं और समय के साथ यह सूची निरंतर बढ़ती ही जा रही है।

अपने देश में महिला उद्यमिता विकास का काफी महत्व है और यह समय की जरूरत है। महिला उद्यमिता विकास से मानव संसाधन का सशक्तीकरण, सामाजिक प्रतिष्ठा, गरीबी में कमी, रोजगार की उपलब्धता, महिला बेरोजगारी की समस्या में कमी, राष्ट्रीय उत्पादकता में वृद्धि, जीवन स्तर में सुधार की संभावना बढ़ेगी। ढांचा के स्तर पर तमाम खामियों के चलते महिलाएं कारोबारी दुनिया की मुख्यधारा में आने से वंचित रह जाती है। इसमें एक बड़ा सवाल उनकी सुरक्षा का भी है। यह जरूरी है कि समाज के सभी तबकों की हिस्सेदारी इस दिशा में हो और सभी क्षेत्रों में समान महिला पुरुष अनुपात दर्ज हो, तभी देश तरक्की की नई कहानी लिख सकेगा। सर्वविदित है कि महिलाएं व्यवसाय संचालन में पूरी तरह सक्षम हैं, लेकिन समाज का ढांचा उन्हें आगे बढ़ने से रोकता है।

इनमें सबसे प्रमुख न सिर्फ भारत में बल्कि पूरे विश्व में पुरुष आधिपत्य वाले कॉरपोरेट परिदृश्य का परंपरागत विचारधारा का होना है। यह सही है कि भारत में अब उच्च तकनीकी शिक्षा और प्रबंधन की डिग्री के साथ हर साल पहले के मुकाबले ज्यादा महिलाएं कारोबार के क्षेत्र में कदम रख रही हैं। मगर यह भी सही है कि समानता के तमाम दावों के बावजूद उन्हें इस क्षेत्र में पुरुषों के मुकाबले ज्यादा परेशानियों का सामना करना पड़ता है। भेदभाव के अलावा महिलाओं की काबिलियत पर सवाल उठाए जाते हैं। इसकी वजह से महिला उद्यमिता सूचकांक की 2015 की सूची में शामिल 77 देशों में से भारत 70वें स्थान पर रहा। पश्चिम बंगाल समेत देश के कई राज्यों में तो हालात और बदतर हैं।

महिला मुख्यमंत्री के सत्ता में होने के बावजूद इस मामले में बंगाल की हालत बाकी राज्यों से खराब है। यहां महिलाओं की कौन कहे, पुरुषों को भी कारोबार के क्षेत्र में भारी मुसीबतों से जूझना पड़ता है। इस अध्ययन में उद्योग के क्षेत्र में महिलाओं के पिछड़ने की प्रमुख वजहों में मजदूरों की उपलब्धता और कारोबार के लिए पूंजी जुटाने में होने वाली दिक्कतें शामिल हैं। वाशिंगटन स्थित ग्लोबल आंत्रप्रेन्योरशिप एंड डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट (जीईडीआइ) की ओर से 2014 में जारी ऐसे सूचकांक में 30 देश शामिल थे और उनमें भारत 26वें स्थान पर था। इससे साफ है कि देश में महिला उद्यमियों के स्थिति सुधरने की बजाय और बदतर हो रही है।

हालांकि संस्था का कहना है कि पिछले साल के मुकाबले भारत की रैंकिंग दरअसल कुछ सुधरी है। सही है कि भारत में अब उच्च तकनीकी शिक्षा और प्रबंधन की डिग्री के साथ हर साल पहले के मुकाबले ज्यादा महिलाएं कारोबार के क्षेत्र में कदम रख रही हैं, लेकिन यह भी सही है कि समानता के तमाम दावों के बावजूद उनको इस क्षेत्र में पुरुषों के मुकाबले ज्यादा परेशानियों का सामना करना पड़ता है। समाजशास्त्री प्रोफेसर धीरेंद्र पटनायक मानते हैं कि महिलाओं के प्रति हमारे समाज का नजरिया इसकी एक प्रमुख वजह है। बैंकों और वित्तीय संस्थानों को भी उनकी काबिलियत पर संदेह होता है। इसलिए महिला उद्यमियों को जरूरी पूंजी जुटाने में काफी मशक्कत करनी पड़ती है। पटनायक का कहना है कि महिला उद्यमियों की राह में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिए पहले समाज का नजरिया बदलना जरूरी है।
(लेखक राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर में अध्येता हैं)

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Posted By: Kamal Verma

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