अरविंद जयतिलक

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की एक जांच में शीतल पेय पदार्थो में जहरीले तत्वों की मौजूदगी रेखांकित की गई है। इससे पता चलता है कि शीतल पेय कंपनियां लाभ कमाने के लिए किस हद तक लोगों की सेहत के साथ खिलवाड़ कर रही हैं। जांच में पाया गया है कि इन जहरीले तत्वों में एंटीमनी, लेड, कैडमियम, क्रोमियम और डीएचईपी शामिल है जो सेहत के लिए बेहद ही खतरनाक हैं। उल्लेखनीय है कि स्वास्थ्य मंत्रालय के दिशा-निर्देश पर डीटीएबी ने फरवरी-मार्च 2016 में सॉफ्ट डिंक्स के सैंपल लिए थे। इनमें अधिकांश शीतल पेयों में जहरीले पदार्थ मिलने की पुष्टि हुई।

जांच में यह भी पाया गया कि इन जहरीले तत्वों का प्रभाव कमरे का तामपान बढ़ने के साथ बढ़ भी जाता है। कहना मुश्किल है कि इस खुलासे के बाद सॉफ्ट डिंक्स की कंपनियों के खिलाफ कोई कार्रवाई होगी भी। यह इसलिए कि इस तरह के खुलासे पहले भी हो चुके हैं लेकिन शीतल पेय कंपनियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई नहीं हुई और वे आमजन की स्वास्थ्य की चिंता किए बिना अपने जहरीले उत्पादों को धड़ल्ले से बेच रही हैं। 1 जुलाई 2006 में सेंटर फार साइंस एंड एनवायरमेंट की रिपोर्ट में भी कोकाकोला और पेप्सी के पेयों में कीटनाशकों की अधिक मात्र में मौजूदगी की बात सामने आई थी।

सीएसइ द्वारा जारी रिपोर्ट में कोकाकोला और पेप्सी के 11 विभिन्न ब्रैंडों में कीटनाशकों की उपस्थिति 2003 में पाए गए कीटनाशकों से भी ज्यादा थी। रिपोर्ट के मुताबिक देश के विभिन्न भागों में खरीदे गए 57 विभिन्न नमूनों में 3 से 5 कीटनाशकों की मात्र बीआइएस द्वारा तय मानकों से औसतन 24 गुना अधिक थी। कोकाकोला के कोलकाता संयत्र द्वारा उत्पादित एक पेय में कैंसर कारक लिडैंन की मात्र बीआइएस मानकों की तुलना में तकरीबन 140 गुना अधिक थी। सीएसई की इस रिपोर्ट के बाद शीतल पेय कंपनियों के उत्पादों की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठने लगे और दबाव बढ़ने पर गुजरात, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की राज्य सरकारों ने सरकारी कार्यालयों में इन पेयों को सर्व करने पर प्रतिबंध लगा दिया।

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फिक्की ने पेय कंपनियों का पक्ष लेते हुए सरकार से अपील किया कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उत्पादों पर इस तरह के प्रतिबंध लगाए जाने से देश में विदेशी निवेश पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। इस दलील से सरकार को कंपनियों के पक्ष में खड़े होने का मौका मिल गया। फिर सरकार ने ही संसद में बयान दे दिया कि स्वास्थ्य मंत्रलय द्वारा गठित विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट को प्रमाणिक नहीं पाया गया। फरवरी 2004 में शरद पवार की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में स्वीकार किया कि शीतल पेयों में कीटनाशक अवशेष पाए जाने की सीएसई की रिपोर्ट सही थी। उचित रहा होता कि कंपनियां कोई सवाल उठाने के बजाए अपने उत्पादों की गुणवत्ता सुधारने पर जोर देतीं।

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शीतल पेय कोकाकोला की गुणवत्ता पर पहले भी सवाल उठ चुके हैं जिसके कारण उसे 1977 में भारत छोड़ना पड़ा। उसके बाद देशी कंपनियां बाजार में छा गईं लेकिन विदेशी कंपनियों की लामबंदी ने देशी कंपनियों को बाजार से उखाड़ फेंका। 1987 में पेप्सी और 1993 में कोकाकोला के आगमन के बाद देशी कंपनियां प्रतियोगिता से बाहर हो गई। आज सॉफ्ट डिंक के एक बड़े बाजार पर इन्हीं दोनों कंपनियों का कब्जा है। उनका मकसद सिर्फ भारी मुनाफा कमाना है।1सवाल तो कंपनियों द्वारा किसानों के पानी हड़पने का भी है। एक अरसे से किसान आरोप लगा रहे हैं कि कंपनियां अपने उत्पादों के निमित्त तय मानकों से अधिक जल का दोहन कर रही हैं।

केरल के प्लाचीमाड़ा स्थित कोकाकोला के सबसे बड़े संयत्र पर अधिकाधिक भू-जल अवशोषण और प्रदुषण का आरोप लग चुका है। प्लाचीमाड़ा में कंपनियों के कारण जमीन का पानी खत्म होने की खबर उजागर हो चुकी है। आज की तारीख में देश में कोक-पेप्सी के अलावा अनगिनत शीतल पेय कंपनियां भारत में कारोबार कर रही हैं और उनके सैकड़ों प्लांट भू-जल का बेहिसाब अवशोषण कर रहे हैं लेकिन त्रसदी यह कि केंद्र व राज्यों की सरकारें इसे लेकर तनिक भी गंभीर नहीं हैं। वे मूकदर्शक बनी हुई हैं। उनकी चुप्पी बताती है कि वे उन शीतल पेय कंपनियों के साथ है। अब देखना दिलचस्प होगा कि स्वास्थ्य मंत्रलय इन जहरीले सॉफ्ट डिंक्स की कारोबार करने वाली कंपनियों के खिलाफ कोई कार्रवाई करती है अथवा नहीं।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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Posted By: Kamal Verma

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