राहुल लाल


भारत-चीन के बीच डोकलाम विवाद सुलझ गया है। दोनों देशों की सेना ने डोकलाम से पीछे हटने का फैसला किया है। गत सोमवार को भारतीय विदेश मंत्रलय ने बयान जारी करके बताया है कि भारत और चीन के बीच डोकलाम के मद्देनजर कूटनीतिक स्तर पर वार्ताएं चल रही थीं। इस बातचीत में हमने अपने हित और चिंताओं पर बात की। यह सहमति बनी है कि डोकलाम से सेनाएं हटाई जाएंगी और यह प्रक्रिया शुरू हो गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ब्रिक्स सम्मेलन के लिए प्रस्तावित तीन सितंबर से चीन दौरे के पहले इसे भारत की कूटनीतिक विजय के तौर पर देखा जा रहा है।

डोकलाम में चीन द्वारा सड़क निर्माण के काम में लगाए गए बुलडोजर, टेंट व अन्य निर्माण सामग्री हटा ली गई है। डोकलाम मुद्दे पर भारत अपनी बात पर कायम था और पीछे हटने को तैयार नहीं था। मगर लंबी कसमकश के बाद आखिरकार दोनों देश समझौते तक पहुंच गए। इसे कूटनीतिक मोर्चे पर भारत की बड़ी जीत बताया जा रहा है। ब्रिक्स के अन्य देशों का भी दबाव दोनों देशों पर जल्द विवाद निपटाने को लेकर बना हुआ था। विशेषज्ञों का कहना है कि यह निश्चित रूप से भारत की कूटनीतिक जीत है। इस विवाद के निपटारे से क्षेत्रीय सुरक्षा और शांति की स्थापना में मदद मिलेगी। चीन की ओर से जिस तरह से लगातार युद्ध की धमकी दी जा रही थी उससे माहौल काफी तनावपूर्ण हो गया था। मगर भारत ने लगातार अपनी ओर से संयम बनाए रखा। चीन से युद्ध की धमकियों के बावजूद कारोबारी कारणों से भारत आश्वस्त था कि चीन अतिवादी कदम नहीं उठाएगा। भारत की ओर से चीन को जितना निर्यात किया जाता है, उसके मुकाबले भारत को चीन का निर्यात पांच गुना है। बहरहाल चीन ने कहा कि वह सीमा पर गश्त करता रहेगा। गौरतलब है कि भारत-चीन सीमा पर दोनों देशों के सैनिक नन कॉम्बैटिव मोड में गश्त करते रहते हैं। चीनी सैनिक पहले भी वहां गश्ती करते रहे हैं, जिसे लेकर भारत को कोई आपत्ति नहीं रही है। इस तरह डोकलाम मामले का 71 दिन के बाद कूटनीतिक समाधान हो गया। चीन ने इस साल 16 जून को विस्तारवादी नीति के जरिये वर्चस्व स्थापित करने के लिए डोकलाम को चुना, जो भूटान का हिस्सा है और उस स्थान से दक्षिण में 40 किलोमीटर की दूरी पर सिलिगुड़ी कॉरीडोर स्थित है। इस सिलिगुड़ी कॉरीडोर को चिकेन नेक भी कहा जाता है जिसके जरिये भारत पूवरेत्तर से जुड़ता है। अगर इस पर चीनी वर्चस्व कायम हो जाता तो पूवरेत्तर भारत पर संकट के बादल गहरा जाते। इस लिहाज से आज डोकलाम गतिरोध के सुलझने के महत्व को समझा जा सकता है। मनोवैज्ञानिक युद्ध के महारथी चीन को थोड़ा भी अंदाजा नहीं था कि उसके भारत पर दबाव डालने की रणनीति पूरी तरह बेअसर साबित होगी। चीन ने निश्चित रूप से यह उम्मीद नहीं की होगी कि डोकलाम में भूटान के पक्ष में भारत खड़ा होगा। बात दें कि भूटान के भारत के साथ खास रिश्ते हैं। 1949 और 2007 की एक संधि के मुताबिक भूटान के भूभाग के मामलों को देखना भारत की जिम्मेदारी है। ऐसे में अगर चीन, भूटान के किसी हिस्से पर दावा करता है या उसकी संप्रभुता में दखल देता है तो भारत के लिए विरोध करना जरूरी है। भारत ने चीनी अपेक्षाओं के विपरीत डोकलाम में कूटनीतिक रूप से गतिरोध को सुलझाने का प्रयास किया, वहीं इस संपूर्ण प्रकरण में चीन की ओर से बेजा बयानबाजी की गई। इसके चलते विभिन्न मोर्चो पर चीन की छवि को काफी नुकसान हुआ जबकि भारतीय कूटनीति को अंतराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक समर्थन मिला।

अब सवाल है कि लगातार अड़ियल रुख अपनाने वाला चीन आखिर कूटनीतिक समाधान के लिए तैयार कैसे हुआ? दरअसल चीन में 3-5 सितंबर को ब्रिक्स सम्मेलन होने वाला है। इस कारण इस सम्मेलन से पूर्व भारत और चीन के ऊपर डोकलाम विवाद को खत्म करने का भारी दबाव था। ब्रिक्स का महत्वपूर्ण सदस्य रूस, ने चीन के ऊपर दबाव डाला कि वह भारत के साथ विवाद जल्द से जल्द सुलझाए। इसके पूर्व जब शंघाई सहयोग संगठन की बैठक हुई थी तो उस समय डोकलाम विवाद शुरुआती चरण में था, लेकिन अब अगर डोकलाम मामला नहीं सुलझता तो ब्रिक्स बैठक की सफलता संदिग्ध रहती।

चीन घरेलू स्तर पर बिखरता हुआ दिखा। डोकलाम मामले को गर्म कर चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग अपनी आंतरिक कमजोरियों को छुपाकर नवंबर में कम्युनिस्ट पार्टी के कांग्रेस में फिर से राष्ट्रपति पद पर काबिज होना चाहते थे। मगर भारतीय कूटनीति के चलते उनकी योजना ध्वस्त हो गई। अगर यह मामला और लंबा खींचता तो इससे चीन की छवि और धूमिल ही होती। चीन ने इस संपूर्ण प्रकरण में कई बार भूटान और नेपाल जैसे छोटे पड़ोसी देशों को अपने पक्ष में करने का प्रयास किया, लेकिन वह इसमें विफल रहा। चीनी विदेश मंत्रलय ने तो एक बार भूटान के हवाले से बयान जारी कर दिया कि भूटान ने ही मान लिया है कि डोकलाम, भूटान का हिस्सा नहीं है। परंतु भूटान ने बाद में स्पष्ट कर दिया कि उसने इस तरह का कोई बयान नहीं दिया है। इसी तरह इस संपूर्ण मामले में नेपाल ने तटस्थ रहने की नीति अपनाई। जापान ने तो डोकलाम मामले को लेकर भारत को स्पष्ट समर्थन की घोषणा ही कर दी थी। भारत से पांच अरब डॉलर का कारोबार करने वाला चीन इतने बड़े बाजार को भी जोखिम में नहीं डाल सकता था। भले ही तनाव के मध्य चीनी विदेश मंत्रलय ने अपनी कंपनियों को भारत में निवेश न करने की सलाह दी हो, लेकिन वास्तविक स्थिति बिल्कुल भिन्न है। चीन ने पिछले वर्षो में जितना निवेश किया है, उसका 77 फीसद निवेश हाल के कुछ वर्षो में हुआ है। सरकार ने कुछ ऐसी नीतियां बनाई है, जिससे चीन भारत में निवेश बढ़ाने के लिए मजबूर हुआ। भारत-चीन व्यापार पूर्णत: चीन के पक्ष में झुका हुआ है। यही कारण है कि भारी तनाव के बीच नाथूला से चीन ने भारत के मानसरोवर तीर्थयात्रियों का रास्ता तो बंद किया था, लेकिन व्यापार नहीं।

पूरे मामले में चीन की अंतरराष्ट्रीय छवि धूमिल हुई। साथ ही दक्षिण एशिया में चीन को प्रति संतुलित करने वाले घटक के रूप में भारत की छवि में निखार आई है। इस मामले में भारत पीछे जाता तो न केवल पूवरेत्तर भारत गंभीर सुरक्षा संकट से जूझता, बल्कि दक्षिण एशिया विशेषकर पड़ोसी देशों में भारत की छवि धूमिल होती। मगर इस घटनाक्रम ने चीन को भारत ने सम्मानित ढंग से बाहर जाने का मौका देकर एक संतुलित रास्ते की ओर कदम बढ़ाया है।

(लेखक अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार हैं)
 

Posted By: Lalit Rai

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