प्रोफेसर लल्लन प्रसाद

भारतीय बैंकों की कुल संपत्ति, जो डूबने के कगार पर है, वह 10 लाख करोड़ रुपये के ऊपर जा चुकी है। इसमें 8.50 लाख करोड़ रुपये सरकारी बैंकों का है। यह वह संपत्ति है जिसे बैंकों ने औद्योगिक कंपनियों और खाताधारकों को कर्ज के रूप में दी है। इतनी बड़ी रकम के फंस जाने से बैंकों की कर्ज देने की क्षमता कम होती जा रही है। मुनाफा घट रहा है और उनका वित्तीय स्वास्थ्य कमजोर हो रहा है। इस फंसी हुई रकम को दो भागों में बांटकर देखा जाता है। पहला, गैर निष्पादित अस्तियां (एनपीए) है जो कर्ज और उसका ब्याज समय पर चुकता नहीं किया जाता और जिसके मिलने की संभावना नहीं के बराबर होती है। दूसरा, स्ट्रेस्ड अस्सेट्स होती है जिसमें एनपीए के अतिरिक्त वह रकम भी शामिल होती है जिसके भुगतान की अवधि बीतने पर मोहलत दी जा चुकी होती है, लेकिन इसके बावजूद भुगतान नहीं हो रहा है। लगभग 80 प्रतिशत कर्ज बड़ी कंपनियों ने लिया है जिसका भुगतान नहीं हुआ है। रेटिंग एजेंसी मैकेंजी की रिपोर्ट के अनुसार फंसे हुए कर्ज से बैंकों का नेटवर्थ (संपत्ति-देनदारी) घटता जा रहा है यानी लगभग आधा रह गया है। ऐसे में बैंकों की पूंजी में वृद्धि नहीं की गई तो उनके लिए संकट की स्थिति आ जाएगी।

वित्त मंत्री ने मार्च 2019 तक बैंकों की पूंजी बढ़ाने के लिए 70,000 करोड़ रुपये देने को कहा है, किन्तु विशेषज्ञों का मानना है कि यह रकम आवश्यकता से बहुत कम है। अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष ने कहा है कि भारतीय बैंकों को अपने तीन वर्ष के मुनाफे के बराबर रकम का प्रावधान करना चाहिए ताकि वे इस तरह की स्थिति से निपटने में सक्षम हों। डूबते कर्ज की वापसी के लिए रिजर्व बैंक ने एक आंतरिक सलाहकार समिति बनाई है जो स्थिति पर पूरी नजर रख रही है। वित्त मंत्रलय और रिजर्व बैंक मिलकर समस्या के निदान के लिए प्रयास कर रहे हैं। भारत सरकार ने हाल ही में अध्यादेश के द्वारा बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट के अंतर्गत रिजर्व बैंक को पहले से अधिक अधिकार दिए हैं जिससे रिजर्व बैंक संबंधित बैंकों को डिफाल्टर्स के खिलाफ कार्यवाही के लिए निर्देश दे सकता है, स्वयं भी कार्यवाही कर सकता है। 40-50 कर्जदार ऐसे हैं जिन्होंने 80 प्रतिशत से अधिक कर्ज लिया है और देने में अपनी असमर्थता जता चुके हैं।

जिन बैंकों की संपत्ति सबसे अधिक फंसी है उनमें भारतीय स्टेट बैंक का 93,000 करोड़ रुपये, पंजाब नेशनल बैंक का 55,000 करोड़ रुपये और बैंक ऑफ इंडिया का 44,000 करोड़ रुपये शामिल है। पिछले कुछ वर्षो से फंसे कर्ज का आकार सुरसा की तरह बढ़ा है। 2012 में यह राशि 1.3 लाख करोड़ रुपये थी जो 2015 में तीन लाख करोड़ पर पहुंच गई। 2016 में यह छह लाख करोड़ रुपये के लगभग आ गई। पिछले वित्त वर्ष के नौ महीनों में एक लाख करोड़ की एनपीए बढ़ी कंपनियों के डिफाल्टर होने के कई कारण हैं। अधिकांश फंसा हुआ ऋण बड़ी-बड़ी परियोजनाओं के लिए दिया गया है। यदि परियोजनाएं अनुमानित लागत और निश्चित समय में पूरी नहीं हो पाते हैं तो लेनदार के लिए कर्ज वापसी मुश्किल हो जाता है।

कच्चे माल की कीमतों में वृद्धि, निर्माण कार्य के लिए भूमि अधिग्रहण में देरी या लागत में वृद्धि, उत्पादित वस्तु की मांग में कमी, कमजोर प्रबंधन आदि कारणों से कर्ज का भुगतान समय पर नहीं हो पाता है। बैंक भी इसके लिए जिम्मेदार हैं। किसी भी परियोजना के लिए कर्ज देने के पहले कुछ मापदंड पूरे करने होते हैं। विशेषज्ञों की राय लेनी होती है। छानबीन करनी पड़ती है, बैंक अधिकारी की लापरवाही बैंक के लिए नुकसानदायक हो जाती है।1कंपनियों के खिलाफ जब इनसाल्वेंसी एंड बैंक्रप्सी कोड के अंतर्गत नेशनल कंपनी लॉ टिब्यूनल में केस दाखिल किए जाते हैं तो बैकों को कर्ज के बारे में सारी जानकारी देनी होती है। बैंक अधिकारियों में इसको लेकर चिंता देखी जा रही है क्योंकि तथ्यों को देने में चूक कर्जदारों के पक्ष में जा सकती है, इसका फायदा उन्हें मिल सकता है।

रिवर्ज बैंक ने कुल 12 डिफाल्टर्स को चिन्हित किया है जिनके नाम कुल दो लाख करोड़ रुपये के कर्ज हैं। बैंकों को निर्देश दिया जा रहा है कि इन देनदारों के खिलाफ एक माह के अंदर नेशनल कंपनी लॉ टिब्यूनल के आगे केस दायर कर दिया जाए। बाकी कर्जदार कंपनियों के खिलाफ केस दायर करने के लिए बैंकों को छह महीने के अंदर कार्यवाही करने को कहा जा रहा है। टिब्यूनल रिकवरी प्रोसीडिंग में दोनों पक्षं लेनदार बैंकों और कर्जदारों के बीच समझौता का प्रयास कराने का अधिकार रखती है। इसमें कुछ कर्ज की माफी ब्याज और मूल की रीशेड्यूलिंग, देनदार की परिसंपत्तियों को जब्त करने के प्रावधान शामिल हैं। बड़ी रकम की रिकवरी के केसों में समझौता कराने के लिए टिब्यूनल को 180 दिन का समय दिया जाता है, जो आवश्यकता पड़ने पर 90 दिनों तक के लिए बढ़ाया जा सकता है। छोटी रकम के केसों का निपटारा 90 दिनों में अपेक्षित है।

कानून की पेचीदियों को देखते आशंका जताई जा रही है कि कंपनियां कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकती हैं जो प्रोसीडिंग्स को लंबा खींच सकती हैं और अंतिम फैसले में निर्धारित समय सीमा का कोई मूल्य नहीं रह जाएगा। इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि कंपनियों ने फंड का दुरुपयोग किया हो, प्रोजेक्ट्स के लिए लिया हुआ कर्ज आंशिक रूप से किसी और व्यवसाय में लगाया हो। इन सबका खुलासा तभी होगा जब केस टिब्यूनल के सामने आएंगे। कंपनियां केस उलझाने का प्रयास करेंगी जिन अधिकारियों के समय में ये कर्ज दिए गए थे वे भी पूछताछ के दायरे में आएंगे, वर्तमान अधिकारी अभी से सतर्क दिख रहे हैं, नए कर्ज देने की प्रक्रिया में रुकावट आ रही है। उद्योगों को जितनी राशि जितने समय में चाहिए नहीं मिल पा रही है। जिसका आंतरिक निवेश पर बुरा असर पड़ रहा है।

बैंक के शेयर धारकों को नुकसान हो रहा है, क्योंकि बैंकों का मुनाफा घटता जा रहा है। बैंकिंग व्यवसाय शिथिल हो रहा है जिसका असर आर्थिक विकास दर पर आगे भी पड़ेगा, जो पहले ही पिछली तिमाही से एक प्रतिशत कम हो गया है। सरकार बैंकों की पूंजी के लिए बजट से जो राशि देने जा रही है उससे विकास एवं लोक कल्याण के प्रोजेक्ट्स के लिए धनराशि में कटौती हो सकती है। टिब्यूनल द्वारा समझौते होने पर जो कर्ज माफ किए जाएंगे या ब्याज दर में कमी की जाएगी वह भी देश के लिए घाटे का सौदा साबित होगा।1फंसे कर्ज की समस्या का समाधान नेशनल कंपनी लॉ टिब्यूनल में मामलों के जल्दी निपटारे से ही संभव है। बैंकों को और पेशेवर बनाने की जरूरत है। नेताओं और अधिकारियों के हस्तक्षेप बंद करने और बैंकों को और स्वायत्तता देने पर सरकार को विचार करना चाहिए।

(लेखक बिजनेस इकोनॉमिक्स विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रमुख हैं)

Posted By: Kamal Verma

डाउनलोड करें जागरण एप और न्यूज़ जगत की सभी खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस