नई दिल्‍ली [कृष्ण प्रताप सिंह]। सरकारें समस्याओं की जटिलताओं में जाकर उनके समाधान के समुचित प्रयासों का रास्ता छोड़कर कहीं न ले जाने वाले सरलीकरणों के बेहिस जुमलों में उलझने और उलझाने लग जाएं तो वही होता है, जो हम इन दिनों प्राय: रोज देख रहे हैं। इनमें ताजा मामला चुनावों से जुड़ा है, जिनकी अरसे से रुकी पड़ी सुधार-प्रक्रिया को किंचित सार्थक ढंग से आगे बढ़ाने के बजाय ‘एक देश, एक चुनाव’ के जुमले को इस तरह आगे किया जा रहा है, जैसे वक्त की सबसे बड़ी जरूरत वही हो। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तो जब भी मन होता है, इस जुमले का जाप करने ही लग जाते हैं, अब उन्होंने अपने इस जाप में राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द को भी शामिल कर लिया है। सो, संसद के बजट सत्र के शुरू में अपने अभिभाषण में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव साथ-साथ कराने को लेकर राष्ट्रपति ने भी दोहरा डाला कि सरकारी मशीनरी के बार-बार चुनावों में व्यस्त होने से विकास कार्यो में बाधा आती है।

यों इस जाप के पीछे छिपी नीयत समझने के लिए बहुत बारीकी में जाने की भी जरूरत नहीं और कुछ मोटी-मोटी बातों से ही इसका पता चल जाता है। इनमें पहली बात यह कि अभी तक न देश में एक शिक्षा प्रणाली है, न ही सारे नागरिकों को एक जैसी चिकित्सा सुविधा मिल रही है। सरकार के सबसे बड़े उपक्रम रेलवे में भी एक देश, एक यात्री, एक कोच व्यवस्था का विलोम ही लागू है। सुख और समृद्धि के एक जैसे बंटवारे या वितरण की तो बात ही मत कीजिए, उलटे एक प्रतिशत अमीर 73 प्रतिशत संपत्ति पर काबिज हो गए हैं। जीएसटी से जुड़े ‘एक देश, एक बाजार, एक कर’ के नारे को सरकार के ‘एक देश, एक चुनाव’ के जुमले की प्रेरणा मानें तो अभी वह ‘एक देश, एक बाजार’ के अपने सपने को भी पूरी तरह जमीन पर नहीं उतार पाई है।

मगर इन सारी स्थितियों से उसे कोई असुविधा नहीं महसूस हो रही और वह इस सवाल से भी नहीं जूझना चाहती कि अगर चुनावों की बुरी तरह प्रदूषित प्रक्रिया में सुधार नहीं होता और उनमें धन व बाहुबल, जाति-धर्म, संप्रदाय और क्षेत्र आदि का बढ़ता दखल नहीं रोका जाता तो वे एक बार में निपटा लिए जाएं या बार-बार हों, उनसे जुड़ी समस्याएं तो बढ़ने ही वाली हैं। वह इस तथ्य को भी नहीं स्वीकारती कि मूल समस्या चुनावों के दिनों दिन खर्चीले और इस कारण विषम मुकाबले में बदलते जाने की है। ऐसे में बार-बार के चुनावों से छुटकारे की बिना पर अगर वह यह कहना चाहती है कि लोग एक बार जिस सरकार को चुन लें, छाती पर मूंग दलने लग जाने पर भी पांच साल तक उसे ढोने को मजबूर रहें तो इसे लोकतांत्रिक कैसे कहा या कैसे सहा जा सकता है? आखिर हमने लोकतांत्रिक शासन प्रणाली को सर्वश्रेष्ठ मानकर अंगीकार किया हुआ है या सस्ती होने के कारण? इसे सस्ती करने का तर्क तो कम से कम वर्तमान परिस्थितियों में, अधिकारों के ऐसे केंद्रीकरण तक ले जा सकता है, जिससे हमारा निस्तार ही संभव न हो।

आज चुनावों के विकास में बाधक होने का तर्क स्वीकार कर लिया गया तो क्या कल समूचे लोकतंत्र को ही विकासविरोधी ठहराने वाले आगे नहीं आ जाएंगे? किसे नहीं मालूम कि विकास हमेशा ही शासक दलों का हथियार रहा है और सरकारों को असुविधा तभी होती है जब उसके लाभों के न्यायोचित वितरण की बात कही जाए। चूंकि सरकार अपने जाप के आगे किसी की और कुछ भी सुनने को तैयार नहीं है, स्वाभाविक ही उसके इस संबंधी इरादों को लेकर संदेह घने हो रहे हैं। संवैधानिक ढांचे में सरकारें पांच साल के लिए चुनी जाती हैं। हां, उनसे जनता का भरोसा उठता है और वे गिरती हैं तो मध्यावधि चुनाव होते हैं, जिनमें जनता को फिर से अपने विकल्प बताने का मौका मिलता है। ‘एक देश, एक चुनाव’ के नाम पर उसके इस विकल्प को खत्म करने की वकालत कैसे की जा सकती है?

By Kamal Verma