नई दिल्ली [स्पेशल डेस्क]। क्या चीन भारत का बेहतर पड़ोसी हो सकता है? क्या चीन कभी भी उभरती भारतीय अर्थव्यवस्था को तवज्जो देगा? क्या चीन 1962 की यादों से बाहर निकल सकेगा? ये सभी ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब आसान नहीं है। जून के महीने में जब गरमी अपने चरम पर थी ठीक उसी वक्त चीन की तरफ से ऐसी कार्रवाई हुई, जिसके बाद दोनों देशों के संबंध खट्टे हो गए। भारत-भूटान-चीन ट्राईजंक्शन डोकलाम में चीनी सेना के सड़क बनाने पर भूटान ने आपत्ति जताई। लेकिन चीनी सरकार ने बृहत्तर चीन का हवाला देते हुए भूटान की चिंता को नजरंदाज कर दिया। भूटान सरकार ने भारत सरकार से मदद की अपील की। भारतीय सेना के कुछ जवान डोकलाम पहुंचे जहां चीनी सैनिकों से झड़प हो गई।

चीन तमाम संधियों और अपनी ताकत का प्रदर्शन करते हुए भारत को जबरदस्त नुकसान की धमकी देने लगा। चीन को पंचशील का सिद्धांत याद आने लगा, ये बात दीगर थी कि वो भूल गया कि अपने 14 पड़ोसियों के साथ उसका व्यवहार कैसा रहा। करीब ढाई महीने की तनातनी के बाद 28 अगस्त को ऐसी खबर ने दस्तक दी, जिससे साफ हो गया कि चीन की गीदड़भभकी नाकाम हो चुकी है। 3 सितंबर से 5 सितंबर तक चीन में होने वाले ब्रिक्स सम्मेलन के करीब एक हफ्ते पहले भारत को कूटनीतिक जीत हासिल हुई। भारत की कूटनीतिक जीत के मायनों को समझने से पहले ये जानना जरूरी है कि डोकलाम में क्या कुछ हुआ था। 

तनाव और बयानबाजी

16 जून 2017

भूटान ने डोकलाम में चीनी सैनिकों को सड़क निर्माण करने से रोका। भूटानी रॉयल आर्मी को मदद करने के लिए भारतीय सैनिक डोकलाम इलाके में पहुंचे।

27 जून 2017

चीन ने भारतीय सेना पर डोकलाम में सड़क निर्माण में बाधा डालने का आरोप लगाया।

29 जून 2017

चीन ने भारत को 1962 की लड़ाई की याद दिलाई और भारत से मामले में दखल नहीं देने की अपील की।

30 जून 2017

रक्षा मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि चीन को हल्की बात नहीं करनी चाहिए। चीन को भी ये याद रखना चाहिए कि अब भारत बदल चुका है। 1962 की यादों से चीन को निकलने की जरूरत है। भारत वैश्विक समीकरणों को समझता है। 2017 का भारत सभी मायनों में शक्तिशाली है।

6 जुलाई 2017

चीन ने भारत पर आरोप लगाया कि वो पंचशील के सिद्धांतों से पीछे हट रहा है। इसके साथ ही भारत 1890 की संधि से भी पीछे हट रहा है।

7 जुलाई 2017

जर्मनी के हैंबर्ग शहर में जी-20 समिट में पीएम मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग के बीच अनौपचारिक भेंट हुई।

19 जुलाई 2017

चीनी विदेश मंत्रालय ने डोकलाम की तुलना लेह-लद्दाख से की और ये बयान आया कि अगर चीनी सेना कश्मीर या लद्दाख में घुसी तो भारत क्या करेगा।

जानकार की राय

Jagran.Com से खास बातचीत में रक्षा मामलों के जानकार पीके सहगल ने कहा कि डोकलाम के मुद्दे पर भारत की जीत को आप ऐतिहासिक मान सकते हैं। 1962 की लड़ाई में मनोवैज्ञानिक क्षति को कम करने का मौका मिला। चीन को अब ये अहसास हो चुका है कि भारत के साथ वो जबरदस्ती नहीं कर सकता है। उन्होंने कहा कि डोकलाम के मुद्दे पर चीनी रुख में नरमी को आप तीन बिंदुओं से समझ सकते हैं।

ब्रिक्स सम्मेलन का दबाव

पीके सहगल ने बताया कि पिछले ढ़ाई महीनों की तनातनी से 3 से पांच सितंबर के बीच चीन में ब्रिक्स सम्मेलन पर खतरा मंडरा रहा था। भारत की तरफ से ये संकेत देने की कोशिश की गई कि अगर चीन अपने रुख में बदलाव नहीं करेगा तो भारत ब्रिक्स सम्मेलन में हिस्सा नहीं लेगा। इसके अलावा चीन के लिए ये दिक्कत थी कि अगर ब्रिक्स सम्मेलन में भारत हिस्सा नहीं लेता है तो अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में ये संदेश जाएगा कि चीन अपने फायदे के लिए बहुदेशीय सम्मेलन को नाकाम करने में जुटा हुआ है। इसके अलावा रूस भी पर्दे के पीछे चीन पर दबाव बना रहा था कि वो हठधर्मिता छोड़कर व्यवहारिक रास्ते पर चले।

चीन की अंदरुनी राजनीति

हाल के दिनों में चीन ने विदेशी सीमा से लगने वाले इलाकों में आधारभूत विकास पर ज्यादा ध्यान दिया है। चीन की इस नीति से उसके आंतरिक राज्यों में विकास की उपेक्षा हुई है जिसकी वजह से लोगों में रोष है। चीनी थिंक टैंक का मानना है कि नवंबर में होने वाले चुनाव के मद्देनजर सरकार किसी तरह से लोगों के असंतोष का सामना नहीं कर सकती है। ऐसे में चीनी सरकार के लिए ये बेहतर था कि वो डोकलाम इलाके में किसी भी तरह से भारत के साथ विवाद को सुलझाए।

सीपेक का मुद्दा

ओबोर के जरिए चीन दुनिया में अपने दबदबे को बढ़ाना चाहता है। सीपेक, वन बेल्ट वन रोड का हिस्सा है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट से चीन को जोड़ता है, जिसके जरिए वो यूरोप के देशों तक पहुंच बनाना चाहता है। लेकिन सबसे बड़ी बात ये है कि सीपेक पर भारत अपने विरोध को दर्ज करा चुका है। चीनी थिंक टैंक का मानना है कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में सरकार भले ही बड़े पैमाने पर निवेश क्यों न कर ले, भारत के साथ बिना सहयोग के आगे बढ़ पाना मुमकिन नहीं होगा।

 

चीनी सेना की गतिविधियां

1 अगस्त 2017

उत्तराखंड के बाड़ाहोती में चीनी सैनिकों ने घुसपैठ की। चरवाहों को चीनी सैनिकों ने धमकाया। लेकिन भारतीय सैनिकों ने चीनी सेना के कुछ जवानों को खदेड़ दिया।

10 अगस्त 2017

चीनी सेना के करीब 700 जवान डोकलाम इलाके में पहुंचे और सीमावर्ती गांवों को खाली कराने की कोशिश की। लेकिन भूटानी आर्मी ने चीन के प्रयास को नाकाम कर दिया।

17 अगस्त 2017

लद्दाख की पैंगोंग झील के सीमावर्ती इलाकों में चीनी सैनिकों ने घुसपैठ की। लेकिन भारतीय सैनिकों ने घुसपैठ की कोशिश को नाकाम कर दिया।

21 अगस्त 2017

भारतीय सीमा के करीब आकर टैंकों और हेलीकॉप्टरों के जरिए चीनी सेना ने युद्धाभ्यास किया।

चीन का क्या है कहना

चीन पहले तो ये मानने से इंकार करता रहा कि डोकलाम विवादित इलाका है। चीनी सरकार की तरफ से ये बयान आया कि डोकलाम बृहत्तर चीन का हिस्सा है। लेकिन भारत की कूटनीतिक कोशिशों और भूटान के विरोध के बाद ये माना कि डोकलाम विवादित क्षेत्र है। ये बात अलग थी कि चीन डोकलाम में सड़क बनाने की गति को और तेज कर रहा था। भारत ने जब अपने पड़ोसी देश भूटान के आग्रह पर दखल दिया तो चीन कहने लगा कि ये तो उसकी संप्रभुता पर हमला है।

क्या कहना था भारत का

भारत ने कहा कि उसका इतिहास कभी किसी दूसरे देश में दखल देने का रहा ही नहीं है। डोकलाम में चीनी सैनिकों ने जब सड़क बनाने का कार्य शुरू किया तो भूटान ने ऐतराज किया। भूटान सरकार के अनुरोध पर भारत ने मदद की।

भूटान की क्या थी भूमिका

डोकलाम के मुद्दे पर चीन ने प्रचार करना शुरू किया कि भूटान को किसी तरह की आपत्ति नहीं है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में भूटान ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि चीन सरासर झूठ बोल रहा है। चीन ने संधियों का उल्लंघन करते हुए भूटान के हिस्से पर अवैध तरीके से कब्जा कर रहा है।

नेपाल का क्या था कहना

नेपाल के उप प्रधानमंत्री ने कहा कि डोकलाम के मुद्दे पर उनका देश न तो चीन के पक्ष में है न ही भारत के उठाए कदम पर प्रतिक्रिया व्यक्त करेगा। ये बात अलग थी कि चीन ने नेपाल को अपने पाले में लाने की हरसंभव कोशिश की।

पाक का नापाक बयान

18 जुलाई 2017 को पाक मीडिया ने वहां की सरकार की तरफ से दावा किया कि डोकलाम इलाके में आक्रमण कर चीनी सेना ने भारतीय फौज के 158 जवानों को मारने का दावा किया था। हालांकि इस दावे के पीछे कोई आधार नहीं था और पाकिस्तान की किरकिरी हुई।


भारत को बड़े देशों का मिला साथ

दो महीने से ज्यादा चले इस तनाव में भारत ने कूटनीतिक स्तर दुनिया के बड़े देशों को ये समझाने की कोशिश की भारत किसी देश के आंतरिक मामलों में दखल नहीं दे रहा है। भारत सिर्फ भूटान सरकार के अनुरोध पर उनके सैनिकों को मदद कर रहा है। भारत के इस तर्क से अमेरिकी सरकार में ये नजरिया बना कि चीन मनोवैज्ञानिक लड़ाई के जरिए अनावश्यक तौर पर तनाव पैदा कर रहा है। अमेरिका ने माना कि चीन को डोकलाम इलाके में यथास्थिति बहाल करना चाहिए। इसका अर्थ ये था कि अमेरिका ने माना कि चीन को डोकलाम में सड़क निर्माण से बचना चाहिए था।

जापान इस मामले में खुलकर भारत के साथ खड़ा हुआ। चीन की धमकियों पर चीनी राजदूत ने कहा था कि किसी को भी बलप्रयोग के जरिए यथास्थिति को नहीं बदलना चाहिए।


डोकलाम विवाद का असर

- रेशम के आयात पर असर से सिल्क कारोबारियों और श्रमिकों को दिक्कतें हुईं।


- कैलाश मानसरोवर यात्रा पर असर पड़ा। नाथू ला से होने वाली यात्रा बीच में रोक दी गई।


- एनएसजी सदस्यता और मसूद अजहर के मुद्दे पर बातचीत अटकी।

नहीं बदला ट्राइ जंक्शन

भारत चाहता था कि चीन इस इलाके में सड़क न बनाए क्योंकि इससे उसके रणनीतिक हितों को खतरा है। विशेषज्ञों का कहना है कि डोकलाम इलाके में अगर चीन गश्त करेगा तो भूटान भी इस इलाके में गश्त करेगा। इस पर कोई विवाद नहीं है। लेकिन डोकलाम में एक पक्षीय तरीके से सड़क बनाकर ट्राई जंक्शन को बदलने की चीन की चाल नाकाम हुई।
 

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Posted By: Lalit Rai

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