नई दिल्‍ली (स्‍पेशल डेस्‍क)। दिल्‍ली-एनसीआर के अधिकतकर इलाकों में मंगलवार सुबह लोगों का सामना घने कोहरे के साथ हुआ। इससे वाहन चलाने वालों को भी कुछ परेशानी का सामना करना पडा। हालांकि सर्दियों के आने के साथ इस तरह की बातें बेहद आम हुआ करती हैं। इसकी वजह हवा में मौजूद नमी का होना और हवा की रफ्तार का कम होना होता है। लेकिन यदि हवा की रफ्तार बेहद कम हो जाए तो स्थिति खराब हो जाती है। सीपीसीबी के मुताबिक इसको एयरलॉक कहा जाता है। ऐसे में इंसानी शरीर को नुकसान देने वाले वो कण जो हवा में लगातार तैरते रहते हैं एक जगह स्थिर हो जाते हैं, जिससे लोगों को सांस लेने में परेशानी जैसी दिक्‍कतों का सामना करना पड़ता है। सीपीसीबी ने पहले मंगलवार को दिल्‍ली में एयरलॉक की स्थिति बनने का अनुमान लगाया था, लेकिन अब इसको बुधवार के लिए कहा गया है।

इस स्थिति को आपातकालीन नहीं मानता CPCB

लेकिन केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) एक-दो दिन की इस स्थिति को आपातकालीन नहीं मानता। दैनिक जागरण से बातचीत में सीपीसीबी के सदस्य सचिव ए सुधाकर बताते हैं कि अगर वायु प्रदूषण का औसत इंडेक्स लगातार 48 घंटे तक 400 से ऊपर रहता है और मौसम विभाग अगले कई दिन तक मौसम की स्थिति नहीं सुधरने की चेतावनी भी देता है, तभी उस स्थिति को आपातकालीन करार दिया जाएगा। यही नहीं, उस स्थिति में आवश्यक वस्तुओं की डिलीवरी करने वाले ट्रकों को छोड़कर अन्य सभी ट्रकों का भी दिल्ली में प्रवेश बंद हो जाएगा। उनके मुताबिक ऐसी स्थिति होने पर टास्क फोर्स की इमरजेंसी बैठक बुलाकर आपातकालीन प्रावधान अमल में लाने के निर्देश जारी कर दिए जाएंगे। आपातकालीन प्रावधानों के मद्देनजर दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश सरकार को एनसीआर में शामिल सभी जिलों में स्कूल भी बंद करने होंगे और ऑड-इवेन भी लागू करना होगा।

दिल्‍ली एनसीआर में ये है सबसे प्रदूषित तीन जगह :

दिल्ली-एनसीआर के सर्वाधिक प्रदूषित तीन हिस्सों में आनंद विहार, गाजियाबाद और भिवाड़ी आते हैं। इनके लिए एक्‍शन प्‍लान भी बनाया जा रहा है। भिवाड़ी के लिए राजस्थान सरकार ने जहां आइआइटी कानपुर की सेवाएं ली हैं, वहीं दिल्ली सरकार को आनंद विहार के लिए एक सप्ताह का समय दिया गया है। इसी तरह का गाजियाबाद का एक अंतरिम प्रस्ताव सोमवार को उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने सीपीसीबी को सौंपा है। इस प्रस्ताव में हफ्ते भर तक पेटकॉक, फर्नेस ऑयल, जनरेटर और भवन निर्माण संबंधी गतिविधियों से फैलने वाले वायु प्रदूषण पर रिपोर्ट तैयार कर उसी के अनुरूप रणनीति बनाने की बात कही गई है।

प्रदूषण की वजह :

राजधानी में सड़कों व निर्माण स्थलों के आसपास उड़ने वाली धूल भी प्रदूषण के लिए कम जिम्मेदार नहीं है। दिल्ली सरकार के पर्यावरण एवं वन विभाग द्वारा इसे रोकने के लिए कोई ठोस उपाय नहीं है। इसका ही नतीजा था कि बीते शुक्रवार को इसकी रोकथाम को लेकर उपराज्यपाल अनिल बैजल ने संबंधित एजेंसियों को जिम्मेदारी सौंपी। क्योंकि जल्द इन धूल को कम करने के उपाय नहीं किए गए तो दिल्ली-एनसीआर में चल रहे निर्माण कार्यों के कारण बढ़ी हुई धूल और सड़क पर यह वाहनों से निकलने वाले हानिकारक पार्टिकल के साथ मिलकर और भी अधिक खतरनाक साबित होगी।

बंद फाइलों तक सिमट कर रह गई है योजना :

आइआइटी कानुपर की रिपोर्ट बताती है कि राजधानी में पार्टिकुलेट मैटर पीएम 2.5 में धूल के माध्यम से होने वाले प्रदूषण का प्रतिशत 35 फीसद है, जबकि पीएम 10 का प्रतिशत 45 फीसद है। जहां तक सरकार की तैयारी का सवाल है तो सरकार इसके समाधान के लिए सड़कों को पानी से धोने और वैक्यूम क्लीनिंग मशीनों के प्रयोग होने का दावा कर रही है। हालांकि यह बात और है कि अभी तक सरकार मात्र दो मशीनें ही सड़कों पर उतार पाई है। एक वर्ष पहले ऐसी मशीनें लाई गई हैं और 16 और खरीदने की योजना अभी तक फाइलों से बाहर नहीं आ पाई है।

क्‍या हैं नियम व कानून :

दिल्‍ली सरकार खुद मानती है कि राजधानी में 61 ऐसी निर्माणाधीन साइट्स हैं, जिनके माध्यम से 90 फीसद डस्ट पाल्यूशन पैदा होता है। ऐसी साइटों पर आर्थिक जुर्माने का प्रावधान है और ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई करते हुए राजस्व विभाग ने चालान भी काटा है। बावजूद इसके विशेषज्ञ मानते हैं कि इस विषय में और अधिक सख्ती की जरूरत है।

कूड़े को जलाने की प्रवृति :

खुले में कूड़ा व पत्तियों को जलाने की प्रवृति दिल्ली में प्रदूषण का अहम कारण है। हाल ही में टैरी की ओर से जारी एक रिपोर्ट में बताया गया है कि किस तरह से कूड़ा जलाना यहां होने वाले प्रदूषण के लिए 60 फीसद तक जिम्मेदार है। इस प्रदूषण के प्रमुख कारकों में कूड़ा जलाया जाना भी अहम है। आइआइटी, कानपुर की रिपोर्ट के अनुसार राजधानी में होने वाले प्रदूषण में पीएम 10 के स्तर पर 17 फीसद प्रदूषण कचरा जलाने से होता है। एक ओर जहां दिल्ली में विभिन्न मुहानों पर बनी गाजीपुर, ओखला व भलस्वा की लैंडफिल साइटों पर सालभर कूड़े में आग लगी रहती है, वहीं दूसरी ओर दिल्ली के विभिन्न इलाकों में कूड़ा जलाने की प्रक्रिया भी लगातार जारी है। प्रशासन अब ऐसी गतिविधि में जुटे लोगों से निबटने के आर्थिक जुर्माना कर रही है।

दिल्‍ली की लैंडफिल साइट्स :

दिल्ली की आबोहवा खराब करने में लैंडफिल साइट्स का बहुत बड़ा योगदान हैं। अवैज्ञानिक तरीके से निर्मित इन कचरा निस्तारण केंद्रों के कारण दिल्ली के तीन छोरों पर कूड़े के पहाड़ खड़े हो गए हैं, जिनके कारण आसपास रहने वाले लोगों का जीना मुहाल हो गया है। इनसे फैलने वाले प्रदूषण और बदबू से लोगों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर ख़तरा पैदा हो गया है। इन साइटों को हटाने तथा कचरे का वैज्ञानिक ढंग से निस्तारण करने के लिए स्वयंसेवी संगठनों ने एनजीटी और सुप्रीमकोर्ट तक का दरवाजा खटखटा चुके हैं, जिन्होंने समय-समय पर सख्त आदेश भी जारी किए हैं। लेकिन कोई तरकीब काम नहीं आई है।

तीन लैंडफिल साइटें :

दिल्ली में तीन लैंडफिल साइट्स हैं- गाजीपुर, भलस्वा तथा ओखला। एनजीटी ने तीनों साइट्स की स्थिति के बारे में दिल्ली सरकार से रिपोर्ट मांगी है। तीनों जगहों पर कूड़े के ढेरों की बढ़ती ऊंचाई को देखकर एनजीटी अध्यक्ष जस्टिस स्वतंत्र कुमार की पीठ ने दिल्ली सरकार को इस ऊंचाई में कमी लाने के लिए उठाए गए कदमों पर इसी साल जुलाई में यह कहते हुए जानकारी मांगी थी कि साइटें वायु एवं जल प्रदूषण का स्रोत हैं।

रोजाना 14 हजार टन कचरा :

ट्रिब्यूनल ने कहा था कि दिल्ली में रोजाना 14,100 टन कूड़ा पैदा होता है, जिसके उचित ढंग से निस्तारण की अभी तक कोई तकनीकी व्यवस्था नहीं की गई है। इससे पहले एनजीटी ने पिछले साल एक समिति का गठन कर उससे एनसीआर में कचरे से बिजली पैदा करने वाले संयंत्र लगाने की संभावना तलाशने को कहा था। ट्रिब्यूनल ने दिल्ली सरकार, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) तथा दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) से ठोस कचरा प्रबंधन नियम-2016 के अनुसार राजधानी में और लैंडफिल साइटों की पहचान करने को कहा था।

जब ढह गया कचरे का पहाड़ :

गौरतलब है कि अक्टूबर में गाजीपुर में कूड़े के पहाड़ के अचानक भरभरा कर ढह जाने से दो लोगों की जान चली गई और इसके कुछ दिनों बाद इस पहाड़ में आग लग गई। इसके बाद एनजीटी ने दिल्ली सरकार समेत संबंधित एजेंसियों को आड़े हाथों लिया था। एनजीटी ने दिल्‍ली में लैंडफिल साइट की नई जगह तलाशने को भी कहा है। यहां पर यह बात बता देनी जरूरी है कि दिल्ली में कोई भी नई लैंडफिल साइट बनाने से पहले एनजीटी की अनुमति लेना अनिवार्य है। गाजीपुर की घटना के बाद तो ईडीएमसी की तरफ से नई लैंडफिल साइट की तलाश भी जोरों से हो रही है। यहां पर यह भी जान लेना जरूरी है कि वर्ष 1984 में शुरू हुई गाजीपुर लैंडसाइट की क्षमता 2002 में ही पूरी हो गई थी। इसके बाद भी वहां पर कूड़ा डालना जारी रहा था। तीस हेक्टेयर में फैली इस साइट में फिलहाल लगभग 130 लाख टन कचरा जमा है। नियमानुसार गाजीपुर लैंडफिल पहाड़ की ऊंचाई 20 मीटर से अधिक नहीं होना चाहिए। यही वजह है कि हादसे के बाद एनजीटी ने गाजीपुर पहाड़ की ऊंचाई को कम से कम दस मीटर कम किए जाने को कहा था।

लैंडफिल साइटों को खटखटाया लेकर कानून का दरवाजा

दिल्ली की लैंडफिल साइटों को लेकर 2014 में ही एनजीटी का दरवाजा चुके पर्यावरणीय मामलों के प्रमुख वकील गौरव बंसल का कहना है कि दिल्ली के तीन ओर कचरे के पहाड़ों को लैंडफिल साइट कहना लैंडफिल साइट्स का अपमान है। क्योंकि ये साइटें लैंडफिल साइट नहीं बल्कि वेस्ट डंपिंग साइट्स हैं। लैंडफिल साइट एक वैज्ञानिक संरचना होती है जिसका विशेष डिजाइन और कायदे-कानून होते हैं। इनमें कचरा डालने से पहले उसे खास तरीके से एकत्र किया जाता है तथा उसकी छंटाई की जाती है। मिट्टी, प्लास्टिक, जैव और बायो-मेडिकल कचरे को निकालकर उसका अलग ढंग से निस्तारण किया जाता है। लेकिन दिल्ली में इनमें से कुछ भी नहीं होता। यहां प्लास्टिक के साथ जैव कचरा और यहां तक कि पशु अवशिष्ट और यहां तक कि मानव अंग तक एक साथ डाल दिए जाते हैं।

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By Kamal Verma